क्या है शीत युद्ध और दोबारा क्यों इसके हालात बन रहे हैं?

अमेरिकी प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप के साथ रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन
अमेरिकी प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप के साथ रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन

शीत युद्ध (Cold War) के दौरान अमेरिका (America) और तत्कालीन सोवियत संघ (Soviet Union) में सीधी लड़ाई नहीं हुई बल्कि वे दूसरे देशों की आड़ में लड़ते रहे.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 21, 2020, 4:56 PM IST
  • Share this:
कोरोना के बीच चीन गुंडागर्डी पर उतर आया है. वो दक्षिण चीन सागर पर कब्जा चाहता है, ताइवान को घेर रहा है और भारत में भी लद्दाख पार जमा हुआ है. अमेरिका अलग भड़का हुआ है. वैक्सीन न आने के कारण दूसरे देशों के साथ उसकी भी अर्थव्यवस्था चरचरा गई है. इस बीच रूस और अमेरिका के बीच दोबारा तनाव बढ़ (America and Russia tensions intensify) रहा है. यहां तक कि सीरिया में तैनात दोनों देशों के सैनिकों के बीच भिड़ंत भी होने लगी है. इस बीच बार-बार आशंका जताई जा रही है कि कहीं भू-राजनीतिक तनाव के बीच दोबारा शीत-युद्ध (cold war) न छिड़ जाए. जानिए, क्या है शीत युद्ध और इसके नतीजे कितने भयावह हो सकते हैं.

लेखक ने दिया नाम
शीत युद्ध, जिसे कोल्ड वार भी कहा जाता है, ये दूसरे विश्व युद्ध के बाद के समय में हुआ राजनैतिक बदलाव था. इस शब्द का पहली बार इस्तेमाल ब्रिटिश लेखक जॉर्ज ऑरवेल (George Orwell) ने 1945 में किया था, जिसके बाद ये चलन में आया.

cold war
राजनैतिक विचारधारा के नाम पर दुनिया दो ध्रुवों में बंट गई- सांकेतिक फोटो

क्यों शुरू हुआ ये युद्ध


शीत युद्ध के शुरू और खत्म होने की कोई नियत तारीख नहीं थी लेकिन ये 1945 से 1989 के बीच का दौर था. असल में तब तत्कालीन सोवियत संघ और अमेरिका के बीच तनाव बहुत बढ़ गया था. इसके पीछे राजनैतिक विचारधारा को दोष दिया जाता है. जैसे अमेरिका में पूंजीवाद को माना जाता रहा, वहीं रूस में कम्युनिज्म को. दोनों ही ये मानते थे कि उनका सिस्टम ज्यादा बेहतर है. साथ ही वे आरोप लगाने लगे थे कि दूसरा देश अपने सिस्टम को हर जगह लागू करने की फिराक में है. यही बात तनाव का कारण बनी.

ये भी पढ़ें: भारतीय ब्रेन चीनियों की तुलना में हल्का और छोटा है, जानिए, क्या हैं इसके मायने

दो खेमों में बंटी दुनिया
इसकी शुरुआत दूसरे विश्न युद्ध के बाद हुई. अमेरिका और सोवियत संघ तब सबसे ताकतवर देश थे और उनके कहने का असर दूसरे देशों पर पड़ना ही पड़ना था. दोनों देश अपने तरीके से दूसरे देशों को चलाने की सोचने लगे. यूरोप को लेकर उनके बीच मतभेद था कि इसे कैसे बांटा जाए. विचारधारा की इस लड़ाई में अमेरिका के साथ ब्रिटेन और कई यूरोपियन देश आ गए. उन्होंने नाटो का गठन किया. वहीं सोवियत संघ ने पूर्वी यूरोप के देशों के साथ मिलकर वॉरसा समझौता कर लिया.

ये भी पढ़ें: वो बेखौफ हिंदुस्तानी रानी, जो दुनिया की पहली वैक्सीन के लिए बनी मॉडल  

उनके बीच तनाव के इस वक्त को शीत युद्ध कहा जाता है. शीत इसलिए कहते हैं कि तनाव काफी ज्यादा होने के बाद भी सीधे-सीधे युद्ध नहीं हुआ. बल्कि ये विरोधी देश तकनीक और आर्थिक तौर पर एक-दूसरे को पछाड़ने की कोशिश करने लगे.

अमेरिका और रूस के बीच स्पेस में सैटेलाइट भेजने की होड़ लग गई- (Photo-pixabay)


तकनीकी तौर पर पछाड़ने की लगी होड़ 
स्पेस में सैटेलाइट भेजने की होड़ लग गई. परमाणु हथियारों की भी होड़ लग गई, जो अमेरिका और रूस में आज तक चली आ रही है. लड़ाई इसलिए नहीं हो सकी क्योंकि दोनों ही अगुआ देश परमाणु शक्ति से लैस थे. ऐसे में जंग छिड़ना काफी भयावह हो सकता था. यही वजह है कि दोनों ध्रुव सीधे युद्ध में नहीं उलझे.

गरीब देशों के कंधे पर चली बंदूक
इसी बजाय वे दूसरे गरीब देशों की आड़ लेते रहे. कांगो, कोरिया, इथियोपिया, सोमालिया जैसे देशों में तब लगातार गृह युद्ध के हालात थे. अमेरिका और रूस दोनों ने ही अपनी सेनाएं यहां हालात काबू रखने के नाम पर भेजीं. हालांकि हुआ उल्टा ही. वे सेनाएं आपस में लड़ने लगीं. इसके साथ ही वे एक-दूसरे के यहां जासूस भेजते और गोपनीय सूचनाएं निकालने की कोशिश करते ताकि नीचा दिखा सके.

ये भी पढ़ें: क्या मालदीव का 'इंडिया आउट कैंपेन' China की कोई चाल है?    

ऐसे लेते थे बदला
रूस भी विदेशी जमीन पर अमेरिकी जासूसों या लोगों का कत्ल करने लगा. मारने का उसका तरीका अनोखा था. वो जहर देता था. अमेरिका समझ जाता कि ये रूस का काम है लेकिन कभी भी कुछ साबित नहीं हो सका. बीच-बीच में दोनों देश एक-दूसरे के राजदूतों को अपने देश से निकालते भी रहे. ताजा मामला देखें तो कुछ महीने पहले ही चीन और अमेरिका ने एक-दूसरे के लिए अपने दूतावास बंद कर दिए.

चीन पूरे दक्षिण एशिया में अपना दबदबा कायम करने की फिराक में है (Photo-pixabay)


इस तरह हुआ खत्म
सत्तर के दशक के आखिर में दोनों देशों के बीच तनाव कम होने लगे. कई तरह की संधियां हुई. अमेरिका ने रूस की विचारधारा वाले कम्युनिस्ट देश को संयुक्त राष्ट्र में शामिल किया. लेकिन शीत युद्ध के बंद होने की सबसे बड़ी वजह थी सोवियत संघ का टूटना और अफगानिस्तान में उसकी हार. आखिरकार नब्बे की शुरुआत में युद्ध खत्म हुआ माना जाने लगा.

अब क्या हैं हालात
इस साल महामारी से चरमराती इकनॉमी के बीच भू-राजनीतिक समीकरण बदलते दिख रहे हैं. चीन पूरे दक्षिण एशिया में अपना दबदबा कायम करने की फिराक में है. वहीं रूस पूरे एशिया और यूरोप में खुद को साबित करना चाहता था. रूसी एकेडमी ऑफ साइंसेज के साथ काम करने वाली संस्था IMEMO के मुताबिक रूस दक्षिण एशिया में अपनी वापसी करना चाहता है ताकि वो सोवियत संघ के दौरान रहा अपना प्रभाव दोबारा हासिल कर सके. साथ ही मिडिल ईस्ट में भी रूस अब आगे आना चाहता है. कुल मिलाकर उसकी कोशिश अमेरिका से आगे निकलने की है, जो पहले से ही भड़के अमेरिका को और भड़का सकती है.
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज