#गांधी150 : हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के मामले में नहीं मानी गई थी गांधी की राय

महात्मा गांधी ने आजादी से तुरंत पहले इस बारे में एक लेख लिखा था, जिसका जिक्र संविधान सभा में 14 सितंबर, 1949 की बहस में भी हुआ था.

Avinash Dwivedi | News18Hindi
Updated: September 14, 2018, 7:15 PM IST
#गांधी150 : हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के मामले में नहीं मानी गई थी गांधी की राय
लंदन पार्लियामेंट के बाहर लगी महात्मा गांधी की मूर्ति
Avinash Dwivedi | News18Hindi
Updated: September 14, 2018, 7:15 PM IST
(20वीं शताब्दी के सबसे निर्मम और हिंसक दौर में, जब विश्व दो-दो विश्वयुद्ध की त्रासदियों से गुजर रहा था. भारत में एक महात्मा ने सत्य और अहिंसा को लोगों के मन में पुन:स्थापित किया. इस महात्मा को आगे चलकर भारत ने अपना राष्ट्रपिता माना और दुनिया ने उसकी तुलना ईसा मसीह और महात्मा बुद्ध से की. इस साल 2 अक्टूबर को महात्मा गांधी को इस दुनिया में आए 150वां साल होने को है. इस मौके पर हम आपको गांधी से जुड़ी तमाम जानकारियां '#गांधी150' सीरीज में दे रहे हैं. पिछली सारी कहानियों के लिए यहां क्लिक करें.)

भारत की आजादी से पहले यह एक बड़ा मुद्दा था कि आज़ाद भारत की राष्ट्रीय भाषा क्या होगी? मुस्लिमों और हिंदुओं के बीच बढ़ती दरार का एक बड़ा कारण भाषा भी था. उत्तर भारत में लोगों की यह धारणा बन रही थी कि हिंदी, हिंदुओं की और उर्दू, मुस्लिमों की भाषा है. हालांकि बड़ी संख्या तब तक उर्दू लिपि जानने वालों की ही थी. लोग उर्दू में ही लिखा करते थे.

इस बीच हिंदी की देवनागरी लिपि का प्रचार और चलन दोनों ही बढ़ रहा था. ऐसी हालत में महात्मा गांधी के सामने भी यह सवाल बार-बार आता था कि आजाद भारत की भाषा क्या होगी? भारत वापस आने से लेकर देश की आजादी के वक्त तक महात्मा गांधी ने राष्ट्रीय भाषा के सवाल पर जो कुछ कहा हम आपको बता रहे हैं.

इंदौर में गांधी ने की थी हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाए जाने की मांग

भारत लौटने के कुछ ही वक्त बाद 1918 में महात्मा गांधी ने इंदौर के हिंदी साहित्य सम्मेलन में कहा था, "जैसे ब्रिटिश अंग्रेजी में बोलते हैं और सारे कामों में अंग्रेजी का ही प्रयोग करते हैं. वैसे ही मैं सभी से प्रार्थना करता हूं कि हिंदी को राष्ट्रीय भाषा का सम्मान अदा करें. इसे राष्ट्रीय भाषा बनाकर हमें अपने कर्तव्य को निभाना चाहिए."

महात्मा गांधी ने इसके बाद पांच 'हिंदी दूत' उन राज्यों में भेजे, जहां पर इस भाषा का ज्यादा प्रचलन नहीं था. इन पांच दूतों में महात्मा गांधी के सबसे छोटे बेटे देवदास गांधी भी एक थे. ये पांच हिंदी दूत हिंदी के प्रचार के लिए सबसे पहले तत्कालीन मद्रास स्टेट पहुंचे. जो आज का तमिलनाडु है.

कोर्ट की सुनवाई में भी गांधी चाहते थे हिंदी का प्रयोग
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महात्मा गांधी से जब प्रश्न किया गया कि आधिकारिक रूप से अंग्रेजी का प्रयोग किया जा रहा है और इसे बदलने की बजाए ऐसे ही जारी रखा जाये क्योंकि लोग इस भाषा को भी भारत में समझने लगे हैं. इस सवाल पर महात्मा गांधी का कहना था कि अंग्रेजी से बेहतर होगा कि हिन्दुस्तानी को भारत की राष्ट्रीय भाषा बनाया जाए क्योंकि यह हिंदू- मुसलमान, उत्तर-दक्षिण को जोड़ती है. महात्मा गांधी का यह भी मानना था कि हिंदी का प्रयोग केवल बोलचाल और देश की आधिकारिक भाषा के तौर पर ही नहीं बल्कि न्यायालयों में सुनवाई के लिए भी किया जाना चाहिए.

इस बारे में वे कहते थे, "कोर्ट की सुनवाई के दौरान राष्ट्रीय भाषा का प्रयोग किया जाना चाहिए. अगर ऐसा नहीं होता है, लोगों को राजनीतिक प्रक्रिया पूरी तरह से समझ नहीं आएगी. राष्ट्रीय और क्षेत्रीय भाषाओं को कोर्ट में जरूर आगे बढ़ाना चाहिए. अपने भाषण की समाप्ति पर महात्मा गांधी ने कहा था, मेरा विनम्र लेकिन दृढ़ विचार है कि जब तक हम हिंदी को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा नहीं दिला देते और दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं को उनका जरूरी महत्व नहीं दिला देते, तब तक स्वराज्य की सारी बातें अर्थहीन रहेंगी."

गांधी नहीं चाहते थे कि जिस 'हिंदी' को हम आज जानते हैं वह राष्ट्रभाषा बने
10 अगस्त, 1947 को प्रकाशित अपने एक लेख में महात्मा गांधी ने राष्ट्रीय भाषा के बारे में लिखा था, "दिल्ली में मैं रोज ही हिंदुओं और मुस्लिमों से मिलता हूं. जिनमें हिंदुओं की संख्या ज्यादा है. इनमें से ज्यादातर एक ही भाषा बोलते हैं जिसमें संस्कृत के शब्द कम होते हैं, फारसी और अरबी के भी (शब्द) ज्यादा नहीं होते. इनकी बड़ी संख्या को देवनागरी लिपि नहीं आती है. वे मुझे अलग सी अंग्रेजी में (चिट्ठी) लिखते हैं. और जब मैं उन्हें विदेशी भाषा में न लिखने को कहता हूं, वे उर्दू लिपि में लिखते हैं. तो अगर ऐसे में यह अनेक भाषाओं की खिचड़ी 'हिंदी' हो और इसकी लिपि केवल देवनागरी हो, इन हिंदुओं की क्या दुर्दशा होगी?"

इसी लेख में महात्मा गांधी ने यह भी लिखा था, "लाखों भारतीय जो गांवों में रहते हैं, उन्हें किताबों से कोई लेना-देना नहीं है. वे हिंदुस्तानी बोलते हैं, जिसे मुस्लिम उर्दू लिपि में लिखते हैं और हिंदू उर्दू या नागरी लिपि में लिखते हैं. इसलिए हमारा और आपका यह कर्तव्य है कि हम दोनों ही लिपियां सीखें."

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संविधान सभा में भी हिंदी पर गांधी के विचारों का हुआ था कई बार जिक्र
महात्मा गांधी के इसी लेख का जिक्र करते हुए संविधान सभा के सदस्य मोहम्मद इस्माइल ने 14 सितंबर, 1949 को भाषा के सवाल पर बहस के दौरान यह प्रस्ताव रखा था कि संविधान सभा को हिंदी को राजभाषा के तौर पर स्वीकार करते हुए उसकी उर्दू और देवनागरी दोनों ही लिपियों में राज्य की आधिकारिक भाषा के तौर पर स्वीकार करना चाहिए. हालांकि ऐसा हो न सका और संविधान ने देवनागरी में ही हिंदी को आधिकारिक भाषा माना.

हिंदी के राजभाषा बनने के बाद राजेंद्र प्रसाद ने किया था महात्मा गांधी को याद
संविधान सभा में 14 सितंबर, 1949 को जब हिंदी को राजभाषा का दर्जा मिला, राजेंद्र प्रसाद ने संविधान सभा के सदस्य के तौर पर हिंदी के लिए किए गए महात्मा गांधी के प्रयासों को याद किया. उन्होंने कहा, "मैं दक्षिण भारत के लिए एक शब्द कहना चाहूंगा. 1917 में जब महात्मा गांधी चंपारण गये थे, मुझे उनके साथ काम करने का अवसर मिला. और जब उन्होंने दक्षिण भारत में हिंदी का प्रचार करने के बारे में सोचा और तय किया कि स्वामी सत्यदेव और अपने प्रिय बेटे देवदास गांधी को इस काम को शुरू करने को कहा.

राजेंद्र प्रसाद ने 1918 में इंदौर में हुए हिंदी साहित्य सम्मेलन में इस हिंदी प्रचार कार्यक्रम को एक प्रमुख कार्यक्रम बताया था. उन्होंने कहा था, "मैं यह दावा नहीं कर सकता कि मैं इस कार्यक्रम से पिछले 32 सालों में अच्छे से जुड़ा रहा हूं लेकिन मैं दक्षिण भारत में एक कोने से दूसरे कोने तक गया हूं और वहां पर जैसे लोगों की महात्मा गांधी के इस आह्वान के प्रति प्रतिक्रिया रही है, उसे देखकर मेरे दिल को बहुत खुशी होती है."

नोट : उर्दू भाषा की लिपि को 'नस्तलिक' कहा जाता है. लेकिन महात्मा गांधी ने अपने लेखों में 'उर्दू लिपि' शब्द ही लिखा है. इसलिए इस लेख में भी बार-बार 'उर्दू लिपि' शब्द का ही प्रयोग हुआ है.

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