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अमेरिका-तालिबान शांति समझौते का क्या होगा भारत पर असर

News18Hindi
Updated: February 29, 2020, 2:42 PM IST
अमेरिका-तालिबान शांति समझौते का क्या होगा भारत पर असर
अमेरिका तालिबान के साथ अहम शांति समझौता कर रहा है.

भारतीय प्रतिनिधि अमेरिका-तालिबान शांति समझौते (America Taliban Peace Deal) में शामिल हो रहे हैं. लेकिन भारत इस दिशा में लगातार चिंता जताता आया है. अफगानिस्तान में तालिबान के मजबूत होने का विपरित असर भारत पर पड़ सकता है.

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  • Last Updated: February 29, 2020, 2:42 PM IST
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अमेरिका (America) अफगानिस्तान (Afghanistan) में तालिबान (Taliban) के साथ बेहद अहम शांति समझौता (Peace Deal) करने जा रहा है. इस समझौते पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हैं. कतर के दोहा में होने वाले इस शांति समझौते के 30 देश गवाह बनेंगे, इसमें भारत भी शामिल होगा. पहली बार तालिबान के साथ किसी तरह के समझौते में भारतीय प्रतिनिधि भी मौजूद होंगे. इस समझौते के बाद अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी का रास्ता साफ हो जाएगा. लेकिन सवाल है कि इस समझौते से क्या हासिल होगा? अमेरिका किस आधार पर तालिबान के साथ समझौता कर रहा है और इसका भारत पर क्या असर पड़ने वाला है.

तालिबान के साथ डील को लेकर उठते रहे हैं सवाल
तालिबान के साथ अमेरिकी शांति समझौता यूएस प्रेसीडेंट डोनाल्ड ट्रंप की स्ट्रैटजी का हिस्सा है. उन्होंने अमेरिकी चुनावों में वादा किया था कि अगर वो सरकार में आते हैं तो वार जोन में लगे अमेरिकी सैनिकों को वापस बुलाया जाएगा. ये शांति समझौता उसी वादे का हिस्सा है. हालांकि इस शांति समझौते को लेकर अमेरिका में विवाद रहा है.

इस शांति समझौते की मुखालफत खुद अमेरिका के रक्षामंत्री रह चुके जेम्स मैट्टिस ने की थी. डोनाल्ड ट्रंप के तालिबान से डील की बात पर अड़े रहने की वजह से विरोध स्वरूप उन्होंने रक्षामंत्री पद से इस्तीफा दे दिया. जेम्स मैट्टिस के साथ-साथ कई अमेरिकी विशेषज्ञों का लगता है कि ये अमेरिका का घातक कदम है, जो अफगानिस्तान और उसके आसपास के इलाकों में अस्थिरता को बढ़ावा देगा.



कुछ अमेरिकी विशेषज्ञ मानते हैं कि डोनाल्ड ट्रंप ने ये फैसला आने वाले राष्ट्रपति चुनाव के मद्देनजर लिया है. वो अमेरिकी खर्चों में कटौती करके देश के सामने स्थिरता लाने का भरोसा पैदा करना चाहते हैं. लेकिन उनका ये दांव उलटा भी पड़ सकता है. अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों के कदम वापस खींचने का उलटा असर भी पड़ सकता है. और इसकी वजह से पूरे इलाके की स्थिरता प्रभावित हो सकती है.

भारत पर क्या होगा इस कदम का असर
हालांकि भारतीय प्रतिनिधि इस शांति समझौते में शामिल हो रहे हैं. लेकिन भारत इस दिशा में लगातार चिंता जताता आया है. अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी का विपरित असर भारत पर पड़ सकता है. तालिबान कश्मीर में गड़बड़ी फैला सकता है. ये पूरी दुनिया जानती है कि तालिबान के हक्कानी नेटवर्क ने अफगानिस्तान में भारतीय दूतावास पर हमले किए हैं. हक्कानी नेटवर्क कश्मीर में भी गड़बड़ी फैलाना चाहता है.

अब अमेरिका उसी हक्कानी नेटवर्क वाले तालिबान के साथ शांति समझौता कर रहा है. इससे अफगानिस्तान में हक्कानी नेटवर्क का प्रभाव बढ़ेगा. इसके अगले चरण में वो अफगानिस्तान की सरकार से बातचीत करेंगे. तालिबान और उसके हक्कानी नेटवर्क के अफगानिस्तान की मुख्य धारा की राजनीति में आना, किसी भी तरह से भारतीय हितों के लिए ठीक नहीं है.

तालिबान के डिप्टी हेड और हक्कानी नेटवर्क के मुखिया सिराजुद्दीन हक्कानी ने शांति समझौते को बहाल करने का वादा किया है. पिछले कुछ हफ्तों में अफगानिस्तान में कोई बड़ा हमला नहीं हुआ है. तालिबान ने शांति समझौते में वादा किया है कि वो अफगानिस्तान की धरती से आतंकवाद को बढ़ावा नहीं देगा और अल कायदा के आतंकियों को पनाह नहीं देगा. इसके बदले में अमेरिकी सैनिक अफगानिस्तान की धरती छोड़ देंगे.

तालिबान अफगानिस्तान में ISIS से लड़ रहा है. लेकिन ये अमेरिकी भी जानते हैं कि अफगानिस्तान में तालिबान के लोगों ने भारतीय हितों पर हमले किए हैं. अफगानिस्तान में तालिबान पाकिस्तान की भूमिका का समर्थन करता है.

पाकिस्तान के हाथ में है तालिबान की चाबी
भारत के लिए चिंता की बात ये भी है कि तालिबान की चाबी पाकिस्तान के पास है. अमेरिका अपने हितों के लिए तालिबान और उसके हक्कानी नेटवर्क को अफगानिस्तान की मुख्यधारा की राजनीति में लाने की कोशिश में लगा है. लेकिन इसका फायदा पाकिस्तान को ही मिलेगा. हक्कानी नेटवर्क पर पाकिस्तानी की मजबूत पकड़ा है. सिराजुद्दीन हक्कानी पाकिस्तान के इशारों पर काम करता है.

इसी साल जनवरी महीने में यूएस तालिबान शांति समझौते की खबरों के बीच भारत के चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत ने अमेरिका को चेताया भी था. बिपिन रावत ने कहा था कि तालिबान के साथ शांति समझौता हो जाने के बाद भी पाकिस्तान, अफगानिस्तान में आतंकवाद को समर्थन देता रहेगा. जनरल रावत से इस बारे में सवाल पूछा गया था कि क्या शांति समझौते के बाद भी पाकिस्तान, अफगानिस्तान में तालिबान को फंड और दूसरे तरीकों से मदद करता रहेगा? जवाब में रावत ने कहा था- बिल्कुल ऐसा ही होगा.

उन्होंने कहा था कि ‘आप एक समझौते तक पहुंचे हैं. लेकिन मुझे लगता है कि जब समझौते तक पहुंचे हैं तो ये लंबी अवधि तक शांति लाने वाला होना चाहिए. ये जल्दबाजी में सिर्फ वहां से बाहर निकलने के लिए अस्थायी कदम के बतौर नहीं होना चाहिए.’

जनरल बिपिन रावत ने कहा था- उन्हें मुख्य टेबल पर आना होगा. उन्हें अफगानिस्तान की मुख्यधारा की राजनीति में आना होगा और अगर वो देश पर शासन चलाना चाहते हैं तो उन्हें वहां के लोगों की मर्जी के मुताबिक शासन करना होगा.’

अंतरराष्ट्रीय मामलों पर नजर रखने वाले विशेषज्ञ भी अमेरिका के इस कदम को लेकर सशंकित हैं. जंग के मैदान में तब्दील अफगानिस्तान में बचाव और राहत के कार्यों में भारत ने करीब 3 बिलियन यूएस डॉलर की मदद की है. लेकिन वहां के राजनीतिक हालात पर भारत ने ज्यादा हस्तक्षेप करना उचित नहीं समझा है. इस शांति समझौते के बाद भारत को अफगानिस्तान को लेकर अपनी रणनीति में बदलाव करना पड़ेगा.

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First published: February 29, 2020, 2:42 PM IST
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