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विधानसभा भंग होने के बाद जम्मू-कश्मीर में अब क्या हो सकता है?

विधानसभा भंग होने के बाद जम्मू-कश्मीर में अब क्या हो सकता है?

उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती (फाइल फोटो)

उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती (फाइल फोटो)

जम्मू-कश्मीर विधानसभा के चुनाव अगले आम चुनावों के साथ कराए जाने के कयास भी लगाए जा रहे हैं.

    19 जून से जम्मू-कश्मीर में राज्यपाल शासन लगा हुआ था. लेकिन सरकार बनाने की कोशिश में जुटी पीडीपी-एनसी और कांग्रेस को बड़ा झटका देते हुए 21 नवंबर को रात 9 बजे से पहले राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने विधानसभा को भंग कर दिया है. ज्यादातर राज्यों में राज्य विधानसभा के भंग होने पर अनुच्छेद 356 के अनुसार राष्ट्रपति शासन लगा दिया जाता है. लेकिन जम्मू-कश्मीर को अपने संविधान के अनुच्छेद 92 के तहत इस मामले में विशेषाधिकार मिला हुआ है, यहां राज्यपाल शासन लगाया जाता है.

    हालांकि, जैसा कहा गया जम्मू-कश्मीर में राज्यपाल शासन 19 जून से ही लागू है. अब विधानसभा भंग होने के बाद अब जम्मू-कश्मीर को 6 महीने में चुनाव कराने होंगे, ताकि नई सरकार चुनी जा सके.

    इसी बीच चुनाव आयोग ने तुरंत आचार संहिता लागू करने के विचार पर अध्ययन की बात कही है. चुनाव आयोग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि आयोग अध्ययन करेगा कि क्या जम्मू-कश्मीर में नये सिरे से चुनावों की घोषणा होने से पहले ही वहां आदर्श आचार संहिता लागू कर दी जाए?

    बता दें कि हाल ही में चुनाव आयोग ने चुनावों की घोषणा पर आचार संहिता लागू करने के बजाए विधानसभा भंग होते ही आचार संहिता लागू करने का निर्णय लिया था. इससे पहले केवल तेलंगाना में ऐसे आचार संहिता लागू की गई है, जहां निर्वाचित सरकार ने विधानसभा को भंग कर दिया था.

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    वैसे तो जम्मू-कश्मीर में 6 महीने के लिए लगने वाला यह राज्यपाल शासन इस अवधि के पूरा होते ही राष्ट्रपति शासन में बदल जाता है. लेकिन दोनों ही स्थितियों में कोई खास फर्क नहीं होता और व्यावहारिक रूप में राज्यपाल ही केंद्र सरकार की सलाह पर काम करता है.


    वैसे जब विधानसभा सस्पेंड रहती है तो इसका मतलब होता है कि MLA अपने पदों पर हैं, लेकिन उनके पास कानून बनाने की शक्ति नहीं है. यह शक्ति इस वक्त में गवर्नर के पास चली जाती है.

    लेकिन अगर गवर्नर विधानसभा भंग कर देता है (जैसा कि जम्मू-कश्मीर में किया जा चुका है) तो 6 महीनों में अगली सरकार चुनने के लिए चुनाव कराने होते हैं. लेकिन अगर ऐसा हो कि अगले 6 महीनों में चुनाव न कराया जा सके तो चुनाव आयोग को इसका कारण बताना पड़ता है.

    जम्मू-कश्मीर विधानसभा के चुनाव अगले आम चुनावों के साथ कराए जाने के कयास भी लगाए जा रहे हैं. इन कयासों को पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस वाई कुरैशी ने फिलहाल लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने की संभावना को सर्वसम्मति बनने तक खारिज कर दिया है. कुरैशी ने कहा कि इस मसले पर जब तक दलों में आम सहमति नहीं बन जाती, तब तक अलग-अलग चुनाव कराने की मौजूदा प्रणाली पर चलना ही बेहतर है.

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