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क्या होगा, अगर हार के बार भी डोनाल्ड ट्रंप सत्ता छोड़ने से इनकार कर दें?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप आने वाले चुनाव को लेकर विवादों में घिर चुके हैं- सांकेतिक फोटो (flickr)

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप आने वाले चुनाव को लेकर विवादों में घिर चुके हैं- सांकेतिक फोटो (flickr)

अमेरिकी संविधान (Constitution of the United States) ये मानकर चलता है कि हारा हुआ राष्ट्रपति विजेता को शांति से सत्ता सौंप देगा. अब ट्रंप के बयान (Donald Trump statement on transfer o0f power) के बाद से इसकी उलट आशंका दिख रही है.

  • News18Hindi
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    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) आने वाले चुनाव को लेकर विवादों में घिर चुके हैं. हाल ही में उन्होंने एक गोलमोल बयान दिया, जिसके मुताबिक जरूरी नहीं कि हारने पर भी वे सत्ता को शांति से छोड़ देंगे. हालांकि उनका ये भी दावा है कि वे ही जीतेंगे. प्रेस वार्ता में ट्रंप के अजीबोगरीब जवाब पर अमेरिका में सत्ता के शांतिपूर्ण हस्तांतरण पर चर्चा छिड़ गई है. जानिए, क्या हो अगर चुनाव में हार के बाद ट्रंप या कोई राष्ट्रपति विजेता पार्टी को गद्दी सौंपने से इनकार कर दे.




    ट्रंप ने दिया डराने वाला बयान
    ताजा मामले पर नजर डालें तो 16 सितंबर को वाइट हाउस में संवाददाताओं से बात करने हुए ट्रंप भड़क उठे. असल में उनसे सवाल हुआ था कि हारेंगे तो वे क्या करेंगे. सत्ता के शांति से विपक्षी पार्टी को सौंपे जाने की बात पर ट्रंप ने कन्नी काटते हुए कहा कि वे देखेंगे. ट्रंप ने उनसे इस संबंध में सवाल करने वाले पत्रकार के और प्रश्नों के उत्तर देने से इनकार कर दिया. ट्रंप की इस टिप्पणी पर विपक्ष से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार जो बिडेन ने हैरानी जताते हुए ट्रंप को तानाशाह करार दे दिया. बता दें कि इससे पहले फॉक्स न्यूज के साथ एक इंटरव्यू के दौरान भी ट्रंप ने कहा था कि वे चुनाव परिमाण को स्वीकार कर ही लेंगे, ऐसा पक्का नहीं है.

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और विपक्षी उम्मीदवार जो बिडेन (Photo-CNBC)


    क्या हारा हुआ राष्ट्रपति सत्ता सौंपने से मना कर सकता है
    अब ये सवाल उठ रहा है कि क्या हारी हुई पार्टी विजेता पार्टी को सत्ता देने से इनकार भी कर सकती है! इस बारे में विशेषज्ञों की राय खास अच्छी नहीं. द अटलांटिक में छपी एक रिपोर्ट में कानूनविद लॉरेंस डगलस की राय इसी ओर इशारा करती है. डगलस कहते हैं कि अमेरिकी संविधान में सत्ता के शांतिपूर्वक हस्तांतरण की बात नहीं करता है, बल्कि वो इसका अनुमान लगा लेता है कि ऐसा ही होगा. ऐसे में अगर कोई प्रेसिडेंट हार के बाद भी सत्ता जीती पार्टी को देने से इनकार कर दे तो इसके लिए अमेरिकी संविधान में कोई अलग बात नहीं कही गई है. ये हालात भयावह हो सकते हैं, खासकर जब पहले से ही अमेरिका कोरोना संक्रमण से कमजोर पड़ा हुआ है.

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    डर पर लिखी जा चुकी एक किताब भी
    इस बारे में डगलस ने एक किताब भी लिखी है, जिसमें संविधान की इसी कमी पर बात है. विल ही गो (Will He Go?) नाम से इस किताब में अनुमान लगाया गया है कि अगर कोई अमेरिकी प्रेसिडेंट हार के बाद पद छोड़ने से इनकार कर दे तो क्या हालात बन सकते हैं. इस पर एक्सपर्ट बहस कर रहे हैं लेकिन चूंकि संविधान में इसके लिए अलग से कोई प्रावधान नहीं, इसलिए फिलहाल अनुमान ही लगाए जा रहे हैं कि ऐसा होने पर क्या हो सकता है. इस बारे में यूएस अटॉर्नी बारबरा मैक्वेड कहती हैं कि अब तक अमेरिका में ऐसा सोचा तक नहीं गया था लेकिन अब पहली बार ये आशंका दिख रही है.

    इस बार अमेरिका में ईमेल या डाक के जरिए मतदान होने वाला है- सांकेतिक फोटो (Pixabay)


    ट्रंप को पोस्टल वोटिंग पर शक
    वैसे ट्रंप ने ईमेल या डाक के जरिए मतदान (मेल-इन-बैलेट) पर भी शक जताया है. वे लगातार इसके बारे में बारे में कह रहे हैं कि इससे चुनाव में धांधली हो सकती है. बता दें कि अमेरिका में कोरोना संक्रमण के चलते इस बार पोस्टल वोटिंग होगी. डाक के जरिए वोटिंग एक खास प्रक्रिया है, जिसमें वोटिंग लिस्ट से जुड़े हर मतदाता के पास एक खाली डाक मतपत्र आता है. जहां इलेक्ट्रॉनिक तरीके से बैलेट पहुंच सके, वहां यही किया जाता है. अगर वोटर किसी कारण से इलेक्ट्रॉनिक तरीका नहीं अपना सकता तो उसे डाक सेवा के जरिए मतपत्र भेजते हैं. इस व्यवस्था पर कमेंट करते हुए ट्रंप कह चुके हैं कि लोग मेलबॉक्स से बैलेट निकाल सकते हैं. और कई तरह की हेराफेरी कर सकते हैं.

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    कैसे काम करता है अमेरिका का चुनावी गणित
    सुपर पावर देश में सबसे अहम पद के चुनाव में कई सारे गणित काम करते हैं. कम या ज्यादा वोट से अमेरिका में हार-जीत तय नहीं होती. साल 2016 में ट्रंप का वोट काउंट हिलेरी क्लिंटन से 3 मिलियन कम था लेकिन वही राष्ट्रपति बने. इसकी वजह ये है कि यूएस में राष्ट्रपति जनता के वोट से नहीं बनता, बल्कि इसके लिए इलेक्टोरल कॉलेज काम करता है. इलेक्टोरल कॉलेज असल में एक बॉडी है, जो जनता के वोट से बनती है. इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि जनता के वोट से अधिकारियों का एक समूह बनता है, जो इलेक्टोरल कॉलेज कहलाता है. ये इलेक्टर्स होते हैं और मिलकर राष्ट्रपति चुनते हैं. उप-राष्ट्रपति भी यही बॉडी चुनती है.

    किसी को भी मेजोरिटी न मिले तो अमेरिका में इसका भी तोड़ है- सांकेतिक फोटो (Pixabay)


    इलेक्टोरल कॉलेज कैसे काम करता है
    इसमें कुल 538 सदस्य होते हैं लेकिन हर स्टेट की आबादी के हिसाब से ही उस स्टेट के इलेक्टर्स चुने जाते हैं. यानी अगर कोई स्टेट बड़ा है, तो उससे ज्यादा इलेक्टर चुने जाएंगे ताकि वो अपनी आबादी का प्रतिनिधित्व सही तरीके से कर सकें. जैसे कैलिफोर्निया की आबादी ज्यादा है इसलिए वहां 55 इलेक्टर हैं. वहीं वॉशिंगटन डीसी में केवल 3 ही सदस्य हैं, जो राष्ट्रपति चुनने में रोल अदा करेंगे.

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    मेजोरिटी न मिलने पर क्या होता है
    इन हालातों में अमेरिका के हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव के पास ये अधिकार है कि वो आपस में वोट करके प्रेसिडेंट चुन सकते हैं. हालांकि ऐसा आज तक एक ही बार हुआ है. साल 1824 में चार उम्मीदवारों के बीच इलेक्टोरल कॉलेज बंट गया और किसी को भी मेजोरिटी नहीं मिल पाई. तब ये हुआ था. इस बार चूंकि दो ही पार्टियां हैं, लिहाजा यहां तक जाने की नौबत नहीं आएगी. हालांकि अब ये नया डर सामने आ गया है कि हारने पर हो सकता है, ट्रंप सत्ता आसानी से विजेता पार्टी को न सौंपें.

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