क्या खौलते ज्वालामुखी के भीतर गिरकर भी बचा जा सकता है?

क्या खौलते ज्वालामुखी के भीतर गिरकर भी बचा जा सकता है?
ज्वालामुखी के खौलते हुए लावे का तापमान लगभग 1000 डिग्री सेल्सियस होता है- सांकेतिक फोटो (Photo-सांकेतिक फोटो (Photo-pixabay))

खौलते हुए लावे का तापमान लगभग 1000 डिग्री सेल्सियस होता है. यानी पानी खौलाने के लिए जो तापमान चाहिए, उससे 10 गुना ज्यादा. जानिए, ज्वालामुखी में गिरना क्या होता है.

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ज्वालामुखी के खौलते हुए लावे का तापमान लगभग 1000 डिग्री सेल्सियस होता है. ये तापमान इतना है कि गिरते ही या यूं कह सकते हैं कि सतह पर गिरने से थोड़ा सा पहले ही किसी की मौत हो सकती है. यहां तक कि इसके किनारों का तापमान तक 500 डिग्री सेल्सियम के आसपास होता है, जो किसी को गंभीर रूप से जला सकता है. यानी एक्टिव ज्वालामुखी के पास जाना खतरे से खाली नहीं. तब इसमें गिरने की बात ही क्या! लेकिन अमेरिका में एक शख्स एक्टिव ज्लावामुखी में गिरने के बाद भी उसे मात देकर लौट आया था.

ज्वालामुखी के पास हुई दुर्घटना
ये बात है साल 2019 की. अमेरिका के हवाई द्वीप पर दुनिया के सबसे सक्रिय ज्वालामुखियों में से एक है किलाएवा ज्वालामुखी. छोटे-मोटे विस्फोट इसमें लगातार होते ही रहते हैं लेकिन साल 2019 की मई में एक काफी बड़ा विस्फोट हुआ. लावा के बौछार आसमान में 150 फीट की ऊंचाई तक जा रही थी. अमेरिकी भूगर्भीय सर्वेक्षण विभाग ने इसकी तीव्रता रिक्टर पैमाने पर अधिकतम पांच मापी थी. तब भी ये इतना शक्तिशाली था कि लावा गिरने से दूर-दूर तक की सड़कों पर दरारें आ गईं. इस भयानक खतरनाक ज्वालामुखी को पास से देखने के लिए वहां पर तैनात एक अमेरिकी फौजी आ पहुंचा.

अमेरिका के हवाई द्वीप पर दुनिया के सबसे सक्रिय ज्वालामुखियों में से एक है किलाएवा ज्वालामुखी

गंभीर रूप से घायल


लगभग 32 साल का ये फौजी हवाई वॉल्केनो नेशनल पार्क में ज्वालामुखी के पास पहुंचकर एक रेलिंग पर चढ़ा भीतर झांकने की कोशिश कर रहा था. इसी दौरान उसका पैर फिसला और वो दुनिया के सबसे सक्रिय ज्वालामुखी में 70 फीट अंदर पहुंच गया. खौलते हुए लावे के पास पहुंचकर भी वो जिंदा रहा, हालांकि गंभीर रूप से जल गया. बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक फौजी को बचाने के लिए डिपार्टमेंट ऑफ हेल्थ के हेलीकॉप्टर की मदद ली गई. वहां रस्सियों और सीढ़ियों के सहारे से उसे निकालकर पास के मेडिकल सेंटर में एयरलिफ्ट किया गया.

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निकलती हैं जहरीली गैसें
यूएस जियोलॉजिकल सर्वे में किलाएवा ज्वालामुखी को दुनिया के सबसे सक्रिय और खतरनाक ज्वालामुखियों में से एक माना जाता है. साल 2018 में भी ये फटा था, जिस दौरान 22 स्क्वैयर किलोमीटर में फैले सारे घर तबाह हो गए थे. साल 1983 से से ज्वालामुखी लगातार रुक-रुककर फट रहा है, और चेतावनी के बाद भी हर बार कई जानें चली जाती हैं. इसकी एक वजह ये भी है कि ज्वालामुखी के फटने पर लावा के साथ-साथ कई तरह की जहरीली गैसें भी भारी मात्रा में निकलती हैं, जैसे सल्फर डाईऑक्साइड और कार्बन मोनोऑक्साइड. इन गैसों के संपर्क में आने और तुरंत इससे दूर न जाने पर काफी मौतें हो जाती हैं. दूसरी वजह है इसका खौलता हुआ लावा. लगातार फटने के कारण ये लगभग 4 लाख वर्ग किलोमीटर तक फैल चुका है. ड्रोन से भी आसपास के जंगलों में फैला हुआ लावा दिखता है.

सक्रिय ज्लावामुखी के फटने पर पहाड़ के मुंह से भारी मात्रा में पिघलते हुए पत्थर, धूल और धुंआ बाहर आता है


ज्वालामुखी में की आत्महत्या
खौलते हुए ज्लावामुखी या लावे की नदी में गिरने पर कुछ ही सेकंड्स के भीतर लंग्स में पहुंची गर्म हवा उसे जला देती है और शरीर के जलने से पहले ही इंसान की मौत हो सकती है. इन्हीं खतरों के चलते वैज्ञानिक लगातार सक्रिय वॉल्केनोज के पास न जाने की हिदायत देते हैं. हालांकि दुनिया में एक मामला ऐसा भी है, जिसमें एक अमेरिकी ने ज्वालामुखी के लावे में कूदकर खुदकुशी कर ली. हवाई के किलाएवा ज्वालामुखी में साल 2017 में लियो ए़डोनिस नाम के 38 वर्षीय पुरुष ने जान दे दी थी. बाद में ज्वालामुखी के पास का नेशनल पार्क विजिटर्स के लिए बंद कर दिया गया.

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कैसे फटता है ज्वालामुखी
वैसे ये जानना दिलचस्प होगा कि आखिर ज्वालामुखी में ऐसा क्या होता है जो उसे इतना खतरनाक बनाता है. असल में ज्वालामुखी मैग्मा यानी पत्थर से मिलकर बना पहाड़ होता है. जब धरती के नीचे जियोथर्मल एनर्जी से पत्थर पिघलने लगते हैं तो नीचे से दबाव ऊपर की आता है. इसी दबाव से पहाड़ फटता है, जिसे ज्वालामुखी का फटना कहते हैं. इस घटना के होने पर पहाड़ में मुंह से भारी मात्रा में पिघलते हुए पत्थर, धूल और धुंआ बाहर आता है, जो जानलेवा होता है. यही वजह है कि ज्वालामुखी को सोता हुआ दानव भी कहा जाता है.

ज्वालामुखी के फटने पर एक बैठे हुए बच्चे ने उसी तरह से बैठे हुए दम तोड़ दिया


फिलहाल दुनिया में 500 से ज्यादा सक्रिय ज्वालामुखी हैं, जो देर-सवेर फटते रहते हैं. कई से सालों से धूल और गर्म धुआं निकल रहा है लेकिन विस्फोट अब तक नहीं हुआ है. वैज्ञानिक इस बारे में अलर्ट जारी करते रहते हैं लेकिन बहुतों बार ज्वालामुखी का फटना एकदम अचानक होता है.

इटली में पूरा शहर खत्म हो गया
ऐसी ही एक घटना इटली के पोम्पई शहर में सदियों पहले हुई थी, जिसने एक पूरे के पूरे शहर को ही पत्थर का बना दिया था. माना जाता है कि आज से लगभग 19 सौ साल पहले नेपल्स की खाड़ी में स्थित Mount Vesuvius ज्वालामुखी फट गया था. बहता हुआ लावा बाढ़ में उफनती नदी की तरह शहर की ओर बढ़ चला था. ज्वालामुखी के फटने के कारण pyroclastic surge हुआ यानी धूल और चट्टानें 100 मील प्रति घंटे की रफ्तार से चलने लगी और हर चीज इनके नीचे दबने लगी. रातभर में पूरा पोम्पई शहर लावे के नीचे दबा हुआ था.

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साल 1748 में जब इसकी खोज हुई तो पाया गया कि शहर के लोग जस के तस अलग-अलग पोजिशन में पड़े हुए हैं. जैसे किसी काम करते व्यक्ति की काम के दौरान ही अपनी जगह पर मौत हो गई. एक बैठे हुए बच्चे ने उसी तरह से बैठे हुए दम तोड़ दिया. यहां तक कि सड़कों पर ब्रेड और सब्जियां तक पत्थर में दबे हुए मिले. यानी लावे की गति इतनी तेज रही होगी कि किसी को संभलने या एक जगह इकट्ठा होने तक का वक्त नहीं मिला.
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