सोचिए कोरोना वायरस से ये हाल है, जैविक युद्ध हुआ तो क्या होगा..?

पहले भी जैविक हमले मानवता का बड़ा नुकसान कर चुके हैं.
पहले भी जैविक हमले मानवता का बड़ा नुकसान कर चुके हैं.

क्या यह दुनिया जैविक युद्ध के लिए तैयार है? क्या कोरोना वायरस किसी किस्म का जैविक हमला है? इस तरह के तमाम सवालों से गुज़रते हुए जानिए कि जैविक हमले कितने भयावह साबित हो चुके हैं और भविष्य में कौन से देश इससे निपटने के लिए कितनी तैयारी रखते हैं.

  • News18India
  • Last Updated: March 27, 2020, 5:44 PM IST
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कोविड 19 (Covid 19) - वर्ल्ड मीटर कह रहा है कि दुनिया में 5 लाख 42 हज़ार से ज़्यादा लोग कोरोना वायरस (Corona Virus) से संक्रमित (Infection) हो चुके हैं. 24 हज़ार 300 से ज़्यादा मौतें हो चुकी हैं. जी हां, इसे प्राकृतिक आपदा (Catastrophe) माना जा रहा है, लेकिन ज़रा विचार कीजिए कि आपदा से जूझने में इतनी खराब स्थिति है तो जैविक युद्ध (Biological War) की स्थिति में इस दुनिया का क्या हाल होगा! कौन से देश इस युद्ध से जुड़ी किस तरह की तैयारी में हैं?

अब आप सोच रहे होंगे कि अचानक यह बात कहां से आ गई, तो आपको यह भी समझना चाहिए कि कोरोना वायरस के पीछे किसी जैविक हमले (Bio-Terrorism) की साज़िश हो सकती है या नहीं. यह वाकई खतरनाक विचार है, लेकिन ऐसा संभव न हो, दुर्भाग्य से ऐसा है नहीं. हालांकि सच क्या है, अभी कुछ कहा नहीं जा सकता लेकिन थ्योरीज़ कम नहीं हैं. जानिए कि कोविड 19 क्या कोई साज़िश (Conspiracy) है और ये भी कि दुनिया जैविक युद्ध के लिए कितनी तैयार है.

क्या कोरोना वायरस जैविक हमला है?
एक तरफ अमेरिका इस संक्रमण के लिए चीन को कठघरे में खड़ा करने में लगा है, तो दूसरी तरफ चीन कई बार कह चुका है कि चीन में यह वायरस अमेरिकी सेना के ज़रिए पहुंचा. आरोपों के इस दौर में मध्य पूर्व के मीडिया में लगातार ऐसी थ्योरीज़ खबरों और लेखों के रूप में प्रकाशित हो रही हैं, जिनमें इस वायरस को अमेरिका की साज़िश करार दिया जा रहा है.
1. अल थौरा, तेशरीन जैसे सीरिया के दैनिक पत्र लिख रहे हैं कि कोरोना वायरस पश्चिम में तैयार किया गया और चीन व दूसरे देशों पर मेडिकल आतंकवाद के रूप में हमला किया गया.


2. मेमरी.ओआरजी पोर्टल की मानें तो अरब डेली ने लिखा है कि चीन और ईरान की अर्थव्यवस्था तबाह करने के लिए अमेरिका ने कोरोना वायरस रचा, इसकी अंतर्राष्ट्रीय जांच होना चाहिए. इसके अलावा अन्य अरबी प्रकाशन भी इसी तरह की थ्योरी दे रहे हैं.
3. अरब देशों के अलावा लेबनान, इराक, फलीस्तीन, जॉर्डन आदि के प्रकाशनों में भी अमेरिका को ही इसका ज़िम्मेदार ठहराया जा रहा है.

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सिर्फ वायरस ही नहीं बल्कि डीएनए संबंधी नई तकनीकों को भी जैविक हथियारों के रूप में देखा जा रहा है.


अमेरिका चपेट में क्यों?
इन थ्योरीज़ को अगर सही माना जाए तो अहम सवाल खड़ा होता है कि अमेरिका में ही इस वायरस का कहर इस कदर क्यों टूट रहा है? क्या अमेरिका अपने पर शक ज़ाहिर न करने के लिए अपने लोगों की इतनी बड़ी कुर्बानी दे रहा है? एक जवाब तो यही है कि यह अमेरिका की साज़िश नहीं है और उस पर जैविक हमले के आरोप गलत हैं क्योंकि अमेरिका साज़िश रचता तो इस वायरस की चपेट में खुद नहीं आता या इसका इलाज तैयार रखता.

दूसरी थ्योरी भी है, जो कहती है कि चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए यह अमेरिका की ही साज़िश है. ग्लोबलरिसर्च पोर्टल का एक लेख कहता है कि जांचें जारी हैं और सच क्या है, पुष्ट नहीं है लेकिन ऐसा हो सकता है कि अमेरिका ने इस जैविक हमले की साज़िश रची हो और चाल गलत पड़ गई हो, जिससे उसका भी नुकसान हो रहा है और हालात बहुत बिगड़ चुके हैं.

क्या होता है जैविक युद्ध और क्या है इतिहास?
जीवाणुओं, विषाणुओं, कीटों या फंगस जैसे एजेंटों के ज़रिए खतरनाक किस्म के संक्रमणों को जब हमले के तौर पर इस्तेमाल किया जाए तो इसे जैविक युद्ध माना जाता है. ताज़ा इतिहास देखा जाए तो केन एलिबेक की किताब बायोहैज़ार्ड में उल्लेख है कि रिफ्ट वैली फीवर वायरस, एबोला वायरस, जापानी एनसेफलाइटिस वायरस, माचुपो, मारबर्ग, येलो फीवर और वैरिओला जैसे वायरसों को हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जा चुका है.

एनसीबीआई पोर्टल की एक रिपोर्ट 'द हिस्ट्री ऑफ बायोलॉजिकल वॉरफेयर' के अनुसार पिछली यानी 20वीं सदी में संक्रामक बीमारियों से 50 करोड़ से ज़्यादा मौतें हुईं. इनमें से लाखों मौतों का कारण जान बूझकर किए गए हमले थे. उदाहरण के तौर पर जापानियों ने दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान चीन पर जैविक हमले किए थे.

जापान ही नहीं बल्कि अमेरिका, यूरोपीय देश भी विश्व युद्ध से लेकर कोल्ड वॉर के समय के बाद तक भी समय समय पर जैविक हमले करने के आरोपी रहे हैं. ग्लोबल रिसर्च के लेख की मानें तो क्यूबा ने कई बार अमेरिका पर सीआईए की मदद से जैविक हमलों से उसके नागरिकों की जान लेने के आरोप लगाए.


1925 और 1972 में दो बार दो महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संधियां भी हुईं, जिनके तहत जैविक हमलों को गैरकानूनी करार दिया गया लेकिन जैविक हथियारों के बड़े पैमाने पर उत्पादन, उन पर रिसर्च करने से संधि में शामिल देश रुके नहीं.

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जापान, अमेरिका व अन्य कुछ देश पहले भी जैविक बमों से दुश्मनों पर हमले करते रहे हैं.


कौन बना रहा है जैविक हथियार?
दुनिया भर में 16 देशों को जैविक हथियारों के उत्पादन के लिए शक के दायरे में रखा जाता है. एनटीआई.ओआरजी पोर्टल की रिपोर्ट की मानें तो कनाडा, चीन, फ्रांस, जर्मनी, ईरान, इराक, इज़रायल, जापान, लीबिया, उत्तर कोरिया, रूस, दक्षिण अफ्रीका, सीरिया, यूके और यूएसए के साथ ही ताईवान पर संदेह किया जाता है कि यहां जैविक हथियार संबंधी कार्यक्रम चल रहे हैं.

कुछ रिपोर्टों की मानें तो लगातार विकसित हो रही डीएनए संबंधी क्रिस्पआर तकनीक भी घातक सिद्ध हो सकती है. इसका इस्तेमाल भी जैविक हथियार के तौर पर किए जाने की आशंकाएं जताई जा रही हैं. साथ ही, ये देश जैविक हमलों से सुरक्षा की तकनीकों के कार्यक्रम भी ​कथित तौर पर चला रहे हैं.


भारत का नज़रिया क्या है?
भारत जैविक हथियारों की दौड़ में शामिल नहीं है. एनटीए के ही मुताबिक पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने साफ कहा था 'भारत जैविक हथियार नहीं बनाएगा क्योंकि यह मानवता के लिए क्रूरता है'. हालांकि भारत के पास ऐसा करने की स्थिति और योग्यता है लेकिन इसके उलट वह उन मेडिकल रिसर्च को प्राथमिकता देता है, जो ऐसे जैविक हमलों से सुरक्षा करने में कारगर हो.

क्या होगा जैविक युद्ध का अंजाम?
अमेरिका जैसे सबसे ताकतवर और संपन्न देश से लेकर भारत जैसे विकासशील और ईरान या कोरिया जैसे देश तक सभी कोरोना वायरस के संक्रमण की चपेट में बुरी तरह से आए. इससे यह तो साफ है कि पूरी दुनिया इस तरह के संक्रमण से बचने, लड़ने या इसके इलाज खोजने के लिए तैयार नहीं है.

कोरोना वायरस के संक्रमण के समय में दुनिया भर के ज़्यादातर प्रभावित देशों में स्वास्थ्य सेक्टर की पोल खुली. कहीं इन्फ्रास्ट्रक्चर कमज़ोर है तो कहीं आपदा प्रबंधन की नीतियां, कहीं स्वास्थ्य संबंधी मूलभूत सुविधाओं की कमी है और कहीं दूरदृष्टि व नेतृत्व कमज़ोर. ऐसे में, दुनिया का कोई भी देश जैविक हमलों या युद्ध के लिए तैयार नहीं कहा जा सकता.

जैविक युद्ध की स्थिति कितनी भयानक होगी, इसका अंदाज़ा आप मेडिकल न्यूज़ टुडे के लेख में निकाले गए इस निष्कर्ष से लगा सकते हैं - "एक भारी लेख के अंत में हल्का मूड करने के लिए बस ये याद रखिए कि यूएस में जो भी रह रहा है, वह आतंकी हमले के बजाय किसी जानवर के हमले में मारा जाएगा, इसकी आशंका ज़्यादा है, फिर वह हमला जैविक हो या किसी और तरह का."

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