Health Explainer: क्या होता है जब तापमान 4 डिग्री से नीचे चला जाए

Health Explainer: क्या होता है जब तापमान 4 डिग्री से नीचे चला जाए
छत्तीसगढ़ के सरगुजा में सबसे अधिक ठंड है. फाइल फोटो.

शरीर का तापमान इतना अधिक गिरने की स्थिति में शरीर के भीतर अहम अंग काम करना बंद कर सकते हैं और ऐसी स्थिति में इंसान बेहोश हो सकता है, उसे हाइपोथर्मिया या मौत भी हो सकती है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: December 18, 2019, 10:46 AM IST
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पहाड़ों पर हो रही  बर्फबारी के कारण पूरा उत्तर भारत इस समय भीषण ठंड की चपेट में है. दिल्ली में न्यूनतम तापमान 12.2 डिग्री पर आ चुका है. वहीं पहाड़ी इलाकों में तापमान और भी कम है और मौसम विभाग की मानें तो इसे साल 1997 के बाद तापमान में सबसे ज्यादा गिरावट माना जा सकता है. आइए जानते हैं कि जब तापमान चार डिग्री से नीचे चला जाए तो शरीर कैसे रिएक्ट करता है. बता दें कि पानी 0 डिग्री सेल्सियस पर जमता और 100 डिग्री सेल्सियस पर उबलता है.

ठंड के असर से कभी रोएं खड़े हो जाते हैं, कभी उंगलियां सुन्न हो जाती हैं तो कभी कान ठंडे हो जाते हैं. लेकिन हमारा शरीर ऐसी प्रतिक्रिया क्यों देता है, कभी सोचा है? हर इंसान में यह प्रतिक्रिया अलग अलग होती है. हर इंसान की त्वचा में तापमान के सेंसर होते हैं. कुछ लोगों में ये सेंसर कान में ज्यादा होते हैं तो कुछ में शरीर के किसी और हिस्से में ये सेंसर अधिक मात्रा में हो सकते हैं. इसके अलावा शरीर में तापमान के सेंसरों की संख्या हर इंसान में अलग हो सकती है.

शरीर की चेतावनी
चार डिग्री से नीचे तापमान पर शरीर आने वाले की बदलाव चेतावनी देता है. शरीर में मौजूद सेंसर एक समय में एक ही तरह के तापमान को समझते हैं. ठंडे तापमान को भांपने वाले सेंसर गर्म तापमान को नहीं आंक पाते हैं. लेकिन दुनिया के किसी भी कोने में रह रहे लोगों का आंतरिक तापमान लगभग समान ही होता है, फिर चाहे वे सहारा के मरुस्थल में रह रहे हों या ग्रीनलैंड की ठंडी बर्फीली हवाओं के बीच.
हाइपोथर्मिया


कोलोन में जर्मन स्पोर्ट्स कॉलेज के योआखिम लाच कहते हैं, "जिस तरह लोगों के जूते का साइज एक दूसरे से अलग होता है उसी तरह उनमें मौजूद तापमापी सेंसरों की संख्या भी एक दूसरे से अलग हो सकती है." कई बार बहुत अधिक ठंड के कारण हाइपोथर्मिया और मौत भी हो सकती है.



हाइपोथर्मिया के लक्षण
बाजू, हाथ, पैर, टांगों की ब्लड वेसल्स (रक्त वाहिकाएं) अकड़ने लगती है. दरअसल हमारे शरीर में मौजूद खून त्वचा को गर्मी देता है. और जब रक्त वाहिकाओं में अकड़न होती है, तो वो स्किन को गर्माहट नहीं दे पातीं. जैसे-जैसे ब्लड फ्लो कम होता है, उसी रफ्तार से स्किन को गर्माहट मिलना कम होती है.

>>बार-बार टॉयलेट जाने की ज़रुरत पड़ सकती है.
>> ठंड लगने पर बेशक आपको कंपकपी लगती है. ऐसा इसलिए होता है जब वाहिका संकीर्णन (vasoconstriction) शरीर को गर्माहट नहीं दे पाता तो, हाइपोथेलेमस मसल्स को कॉन्सनट्रेट करने के लिए कहता है.
>> हाइपोथर्मिक सिचुएशन में ब्रेन और नर्वस सिस्टम नॉर्मली फंक्शन नहीं कर पाते. ठंड की इस स्थिति में व्यक्ति हालात के मुताबिक, सही से फैसला नहीं ले पाता.
>> शरीर की बाहरी त्वचा ठंड से अकड़कर सफेद पड़ने लगती है. खासकर गाल, नाक और उंगलियों में ब्लड वेसल्स का फ्लो बेहद कम हो जाता है. इस स्थिति को Frostbite कहा जाता है. इसमें स्किन टिश्यू डैमेज हो जाते हैं.



>> जब स्किन टिश्यू डेमेज होते हैं तो पहले हल्का दर्द महसूस होता है फिर स्किन ठंडी, ठंडी और ज्यादा ठंडी होती जाती है.
>> कुछ लोगों को सर्दी से त्वचा पर रिएक्शन भी होता है. जिसमें उनकी स्किन में लाल-लाल चकत्ते पड़ जाते हैं.
>> नॉर्मली जब हम सांस के साथ हवा भीतर लेते हैं तो इसमें नाक हमारी मदद करती है. लेकिन बहुत ज्यादा ठंड की स्थिति में ऐसा होता है कि सांस लेने पर फेफड़ों को गर्माहट नहीं मिलती, क्योंकि बाहर से जो हवा हम सांस के साथ भीतर लेते हैं, वह बहुत ठंडी होती है.

शरीर के कितने तामपान पर होती है मौत
योआखिम लाच कहते हैं, "हमारे शरीर का तामपान 36.5 डिग्री सेल्सियस के आसपास होता है. अगर यह तापमान 42 डिग्री से ऊपर या 30 डिग्री से नीचे चला जाए तो जान भी जा सकती है." शरीर का तापमान इतना अधिक गिरने की स्थिति में शरीर के भीतर अहम अंग काम करना बंद कर सकते हैं और ऐसी स्थिति में इंसान बेहोश हो सकता है, उसे हाइपोथर्मिया हो सकता है या मौत भी हो सकती है.

जैसे ही तापमान गिरता है शरीर का आंतरिक तंत्र सिग्नल भेज कर इस बात की सूचना देता है कि हम खतरे में हो सकते हैं. तापमान में परिवर्तन होने पर शरीर कांपना शुरू कर देता है या रोएं खड़े हो जाते हैं.



बाल करते हैं रक्षा
लाच के अनुसार प्राचीन समय में इंसान के शरीर पर बहुत बाल हुआ करते थे जो उसे ठंड से बचने में मदद भी करते थे. उन्होंने डॉयचे वेले को बताया, "हमारे शरीर पर बाल त्वचा के जिस हिस्से से जुड़े होते हैं वहां ठंड होने पर मांसपेशियां अकड़ने लगती हैं और बाल खड़े हो जाते हैं." उन जीवों में जिनके शरीर पर बहुत बाल होते हैं, बालों की परत ऊष्मारोधी या अवरोधी परत की तरह काम करती है.

इसी तरह शरीर के पास कुछ और भी आत्मरक्षक तरीके होते हैं. लाच ने कहा, "जब शरीर को एहसास होता है कि उसे और तापमान की जरूरत है तो हमें कंपकपी लगती है. अकसर ऐसी स्थिति में हमारे निचले जबड़े में किटकिटाहट होने लगती है."



जब हम कांपते हैं तो शरीर में रक्त स्राव तेज हो जाता है, जिससे हमें गर्मी मिलती है. पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में आंतरिक तापमान बनाए रखने का ज्यादा बेहतर तंत्र होता है. उनके शरीर की संरचना ही कुछ ऐसी होती है जिससे आंतरिक अंगों को गर्मी मिलती रहती है. साथ ही अगर वे गर्भवती हैं तो शरीर के भीतर पल रहे शिशु के लिए भी तापमान उचित बना रहता है.

मोटापे से ठंड का संबंध
एक आम धारणा यह भी है कि मोटे व्यक्ति को ठंड कम लगती है, जो कि सच नहीं है. हालांकि मांसपेशियों का द्रव्यमान भी अहम भूमिका निभाता है. आमतौर पर महिलाओं के शरीर में 25 फीसदी और पुरुषों में 40 फीसदी द्रव्यमान मांसपेशियों का होता है. ज्यादा मांसपेशियों वाले शरीर को ठंड कम लगती है. लेकिन यह धारणा कि वसा या शरीर की चर्बी ठंड से बचने में मदद करती है, गलत है. ठंड से बचने का बढ़िया तरीका वजन बढ़ाना नहीं बल्कि शारीरिक गतिविधियां बढ़ाना है.

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