जब हिटलर के नाम पर एक जालसाज ने करोड़ों में बेची थी फेक डायरी, हिल गया था जर्मनी

जब हिटलर के नाम पर एक जालसाज ने करोड़ों में बेची थी फेक डायरी, हिल गया था जर्मनी
हिटलर के नाम पर हुई थी जालसाजी की बहुत बड़ी घटना.

हिटलर ( Adolf Hitler) की मौत के कई दशक बाद जर्मनी में एक ऐसा कांड हुआ था जिसे आज भी वहां के लोग याद करते हैं.

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जर्मनी के नाजी तानाशाह हिटलर की मौत 30 अप्रैल 1945 को हो गई थी. हिटलर की मौत के साथ दूसरा विश्व युद्ध भले ही अपने खात्मे की ओर बढ़ गया हो लेकिन तानाशाह से जुड़ी कहानियां लोगों के बीच चलती रहीं. ज्यादातर कहानियां हिटलर के क्रूर कृत्यों से भरी हुई थीं. लेकिन हिटलर की मौत के करीब 35 साल बाद उसके नाम पर धोखाधड़ी का एक बहुत बड़ा स्कैंडल सामने आया था. ये स्कैंडल किया था खुद को नाजीवादी कहने वाले एक व्यक्ति ने. इस स्कैंडल ने 80 के दशक में जर्मनी की पूरी राजनीति को गर्मा कर रखा दिया.

क्या था मामला
जर्मनी की एक विख्यात मैगजीन है स्टर्न. जो अब भी प्रकाशित होती है. 1980 के दशक में उस मैगजीन में एक खोजी रिपोर्टर हुआ करते थे जिनका नाम था गर्ड हाइडमैन. वो हिटलर के बड़े प्रशंसकों में से थे. खुद भी हिटलर पर काफी शोध कर रखा था. 1980 में वो अपने एक नए परिचित फिट्ज स्टीफल के घर मिलने पहुंचे. फिट्ज स्टीफल को भी नाजियों और हिटलर से जुड़ी वस्तुओं के कलेक्शन का शौक था.

अपने घर में ऐसी कई चीजों का उन्होंने म्यूजियम बनवा कर रखा था. हाइडमैन ने भी इस छोटे म्यूजियम को देखना शुरू किया तो उसकी नजर एक किताब पर टिकी जिसका कवर काला था. उस पर लिखा था हिटलर डायरीज. इसे देखते ही हाइडमैन ने पूछा-ये कैसी डायरी है? इस पर स्टीफल ने जवाब दिया कि ये हिटलर की लिखी डायरी है जो सिर्फ उसके पास है. ये सुनते ही हाइडमैन के आंखें चमकने लगी.
1983 में छपा स्टर्न मैगजीन का कवर पेज.




हाइडमैन को लगा कि वो इस डायरी को प्रकाशित करवा कर अगर दुनिया के सामने ला देगा तो उसे पत्रकार के तौर पर बहुत ख्याति मिलेगी. लेकिन वो जानता था कि डायरी खरीदना उसके बूते की बात नहीं. साथ ही इस डायरी की प्रमाणिकता को भी लेकर संदेह था.

कैसी बिकी डायरी
हाइडमैन ने इस डायरी के बारे में अपनी कंपनी में संपर्क किया. कंपनी को भी लगा कि इसे छापकर दुनिया में सनसनी पैदा की जा सकती है. फिर कुछ सोर्स के जरिए इसकी पुष्टि करवाई गई, जिन्होंने कह दिया कि डायरी वास्तविक है. लेकिन इन सारी प्रक्रिया के बीच एक-दो साल गुजर गए. स्टीफल ने डायरी की कीमत भी काफी ऊंची मांगी थी. आखिरकार स्टर्न कंपनी तैयार हुई और वो डायरी 3.7 मिलियन यानी 37 लाख (तब करीब 4 करोड़ रुपए) डॉलर में खरीदी. ये डील बेहद महंगी थी. अगर आज के लिहाज से इसकी कीमत आंकी जाए तो काफी ज्यादा होगी.

छापने का फैसला
स्टर्न मैगजीन ने इस डायरी को छापने का फैसला किया. 25 अप्रैल 1983 को मैगजीन ने अपने कवर पेज जो इस डायरी को छापा तो जर्मनी क्या पूरी दुनिया में चर्चा होने लगी. कवर पेज पर लिखा गया था-हिटलर की डायरी बरामद. पूरी दुनिया के अखबारों में इस स्टोरी हाथोंहाथ लिया गया. स्टर्न ने जैसा सोचा था वैसा ही हुआ. लेकिन अभी काफी कुछ बदलने वाला था.

इतिहासकारों ने उठाए सवाल
दरअसल उस डायरी में हिटलर को एक संवेदनशील व्यक्ति के रूप में दिखाया गया था. ऐसा बताया गया कि नाजियों द्वारा किए गए कई अत्याचारों के बारे में हिटलर को पता नहीं था. ये सब पढने के बाद इतिहासकार चौंक उठे. जर्मन हिस्टोरिय डेविड इरविंग ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सवाल उठाए. साथ ही कहा कि ये डायरी फर्जी है. हिटलर ने ऐसी कोई डायरी लिखी ही नहीं.

जर्मन तानाशाह ने आज ही के दिन 1945 में आत्‍महत्‍या कर ली थी. इसी दिन को दूसरे विश्‍व युद्ध का अंत भी माना जाता है.


शुरू हुई जांच, फिर मिली सजा
बवाल के बाद सरकार ने इस मामले के जांच के आदेश दे दिए जिसमें पता चला कि ये डायरी वाकई में फर्जी है. इसे कुछ इस तरह से गढ़ा गया है जिससे ये पुरानी लगती है. डायरी को कोनराड कजाऊ ने लिखा था. वो बहुत बड़ा जालसाज था. उसने हिटलर की राइटिंग की ऐसी नकल की थी जिसे देखकर शक न हो. उसी ने उस डायरी को फिट्ज स्टीफल को बेचा था. जिनसे बाद में स्टर्न कंपनी ने खरीदा था. मामले में कोनराड और पत्रकार हाइडमन को 42 साल जेल की सजा सुनाई गई थी.

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