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क्या एक दूसरे के पूरक थे गांधी और अंबेडकर?

Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: October 3, 2019, 5:46 PM IST
क्या एक दूसरे के पूरक थे गांधी और अंबेडकर?
बाबा साहेब डॉक्टर भीमराव आंबेडकर

#Gandhi@150: गांधीजी (Gandhi) और अंबेडकर (Ambedkar) दोनों ही पिछड़ों को उठाना चाहते थे ..दोनों ने इसपर अपने अपने तरीकों से काम किया..हालांकि सियासी तौर पर उनके रिश्ते शायद ही कभी सहज रहे

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  • Last Updated: October 3, 2019, 5:46 PM IST
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मोहन दास करमचंद गांधी (Mohandas Karamchand Gandhi) और भीमराव अंबेडकर (Bhimrao Ambedkar) समकालीन थे. दोनों भारतीय समाज (Indian society) को सामाजिक न्याय (Social justice) और बंधुत्व आधारित चाहते थे लेकिन ये कैसे किया जाए, उसे लेकर उनमें मतभेद था. दोनों विदेश से पढाई पूरी करके स्वदेश आए थे.दोनों ने लगभग एक ही काम किया लेकिन अपने तरीकों से. दोनों एक दूसरे के विरोधी थे. जब भी दोनों सामने आए, कभी उनमें बहुत सहजता नहीं रही.

गांधी और अंबेडकर दोनों दो अलग वर्गों से ताल्लुक रखते थे. गांधी राजकोट में एक दीवान के घर पैदा हुए, जहां उनके परिवार का खासा मान सम्मान था. उनका परिवार राजकोट के कुलीन परिवारों में था. वहीं अंबेडकर मध्यप्रदेश एक ऐसे परिवार में जन्मे, जिसे अछूत माना जाता था.  उन्हें पढ़ाई के दौरान और बाद में कटु अनुभवों से गुजरना पड़ा, जिससे एक विचारधारा उनमें मजबूत होती गई.

अंबेडकर शुरू से ही पढ़ाई में बेहद मेघावी और प्रखर थे. गांधी जी औसत श्रेणी के विद्यार्थी थे. जीवन के आरंभिक बरसों में गांधी जी को कभी उन हालात और चुनौतियों का सामना नहीं करना पड़ा, जो बाबा साहेब अंबेडकर के सामने आईं.

ताजिंदगी राजनीतिक विरोधी रहे

गांधी और अंबेडकर कभी एक पार्टी में नहीं रहे. दोनों जिंदगी भर एक दूसरे के राजनीतिक विरोधी बने रहे. 1917 में अपनी पढ़ाई खत्म करके लौटने के बाद अंबेडकर ने वर्ण और जाति व्यवस्था खत्म करने के लिए मुहिम चलानी शुरू की.

तब तक कांग्रेस की अगुवाई में स्वतंत्रता आंदोलन की कमान गांधी जी संभाल चुके थे. हर कोई उनसे प्रभावित था. अंबेडकर ने राजनीति की अपनी जो रेखा खींची, उसमें गांधी और कांग्रेस उनकी विरोधी पार्टी थी.

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कहा जा सकता है कि ये दोनों महान शख्सियतें दरअसल दो अलग स्कूल थे, दो अलग विचारधाराएं थीं. दोनों की मंजिलें एक जैसी थीं लेकिन रास्ते जुदा थे. अंबेडकर जोर-शोर से अपनी आवाज उठाते थे तो गांधी सांकेतिक तरीकों से उच्च जातियों पर बदलाव का दबाव बनाने के पैरोकार थे.

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लंदन की गोलमेज कांफ्रेंस में गांधीजी और अंबेडकर


तब अंबेडकर ने गांधी की तीखी आलोचना की
1930 और 1940 के दशक में अंबेडकर ने गांधी जी की तीखी आलोचना की. उनका विचार था कि सफाईकर्मियों और पिछड़ों के उत्थान का गांधी जी का तरीका कृपावादी और नीचा दिखाने वाला है. ये वही समय था जब गांधी जी देशभर में घूम घूमकर अश्पृश्यों के लिए मंदिर खुलवा रहे थे. साझा भोज और इसी तरह के दूसरे अभियान चलाए हुए थे.

वह अश्पृश्यता के दाग को हटाकर हिंदुत्व को शुद्ध करना चाहते थे. इसके चलते तमाम हिंदू संगठन गांधीजी से नाराज हो गए. उनपर हमले हुए. काले झंडे दिखाए गए. पुणे में गांधी जी कार पर बम से हमला किया गया.

देखा जाए तो गांधी जी ने 1915 में भारत वापसी के बाद से ही जाति व्यवस्था पर चोट करने की शुरुआत अपने तरीकों से की थी. इसी परिप्रेक्ष्य में वह खुद सफाई करते थे. उनके आश्रम में दलितों का स्वागत था. सभी साथ मिलकर रहते थे.

दूसरी ओर अंबेडकर ने हिंदुत्व को ही खारिज कर दिया था. उनका विचार था कि यदि दलितों को समान नागरिक की हैसियत पानी है तो उन्हें दूसरी आस्था अपनानी होगी.

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1930 और 1940 के दशक में अंबेडकर ने गांधी जी की तीखी आलोचना की. उनका विचार था कि सफाईकर्मियों और पिछड़ों के उत्थान का गांधी जी का तरीका कृपावादी और नीचा दिखाने वाला है


विवादास्पद भाषा का इस्तेमाल करते थे
गांधीजी पहले शख्स थे, जिन्होंने अपने आश्रम में दलित और सवर्ण के विवाह की अनुमति दी, जो उस समय के लिहाज से क्रांतिकारी काम था. उन्होंने शंकराचार्य और धार्मिक अभिलेखों को अश्पृश्यता के लिए चुनौती दी. उनके इस कदम पर उन्हें हिंदू धर्म से निकालने की भी बात की गई.

गांधीजी ने अपने जीवन में शायद ही कभी अंबेडकर के खिलाफ सार्वजनिक तौर पर कुछ कहा हो लेकिन ये हमेशा कहा कि अंबेडकर के काम करने के तरीके एकदम अलग हैं, जिससे वह सहमत नहीं हैं.

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वर्ष 1996 में अरुण शौरी ने एक किताब लिखी-"फाल्स गॉड".किताब में शौरी ने लिखा कि अंबेडकर ने स्वतंत्रता आंदोलन के दिनों में अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष करने की बजाए ब्रिटिशों का साथ दिया. "भारत छोड़ो" आंदोलन के दौरान पर वह वायसराय कार्यकारी परिषद के सदस्य थे. किताब के अनुसार, "वो हमेशा गांधीजी के खिलाफ अपमानजनक और विवादास्पद भाषा का इस्तेमाल करते थे."

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गांधीजी पहले शख्स थे, जिन्होंने अपने आश्रम में दलित और सवर्ण के विवाह की अनुमति दी, जो उस समय के लिहाज से क्रांतिकारी काम था.


तब अंबेडकर जो चाहते थे वो हो नहीं सका
अंग्रेजों के सामने कांग्रेस पूरे देश के लोगों के प्रतिनिधित्व का दावा करती थी, लेकिन बाद के बरसों में मुस्लिम लीग और रियासतों ने ही नहीं बल्कि अंबेडकर की अगुवाई में दलितों ने भी लगातार जोर दिया कि भारत में अलग-अलग वर्ग हैं और ब्रिटिश राज उन्हें उसी रूप में देखे. लंदन की दूसरी गोलमेज कांफ्रेंस में इसे लेकर गांधीजी और अन्य प्रतिनिधियों के बीच काफी नोक-झोंक की स्थिति बनी थी.

दरअसल 1932 में राजनीति में दलितों का प्रतिनिधित्व बढाने के लिए दलित नेता अंबेडकर ने एक अलग प्रस्ताव रखा था, इसके तहत सीटों में आरक्षण की बजाए दलितों को अपना प्रतिनिधि अलग से चुनकर सरकार में भेजने की बात सुझाई गई थी.

गांधीजी ने इसे हिंदुओं में बंटवारे की अंग्रेजी साजिश माना. पुणे जेल में आमरण अनशन शुरू कर दिया. आखिरकार गांधीजी की बात अंग्रेज सरकार को माननी पड़ी. अंबेडकर को भी तब झुकना पड़ा.

बाद में अंबेडकर और उनके अनुयायियों ने कहा कि अगर गांधी विरोध नहीं करते. अंबेडकर के रास्ते को अपना लिया जाता तो दो दशकों में एक मजबूत और सच्चा दलित नेतृत्व उभरता, जो दलित सरोकारों को आगे ले जाता. अब सुरक्षित सीटों पर वही लोग चुने जा रहे हैं जिनके पास दूसरे समुदायों में भी पर्याप्त संख्या है. दलित कार्यकर्ता अब भी इसे ऐतिहासिक भूल बताते हैं.

B.R._Ambedkar
गांधीजी के दबाव में अंबेडकर को आजाद भारत के पहले मंत्रिमंडल में शामिल किया गया, क्योंकि वो चाहते थे कि देश के पहले मंत्रिमंडल में सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व होना चाहिए.


अंबेडकर को मंत्रिमंडल में रखने का दवाब डाला
जब देश आजाद होने वाला था तब नेहरू और पटेल शायद नहीं चाहते थे कि अंबेडकर को मंत्रिमंडल में शामिल किया जाए. गांधीजी ने उन्हें इसके लिए राजी किया. उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता कांग्रेस को नहीं देश को मिल रही है, इसलिए पहले मंत्रिमंडल में देश की सबसे अच्छी प्रतिभाओं को शामिल किया जाना चाहिए, चाहे वह किसी भी दल से जुड़ा हो या वर्ग की रहनुमाई करता हो.

देश के पहले कानून मंत्री और संविधान निर्माता समिति के अध्यक्ष के तौर पर अंबेडकर ने जो काम किया, वो वाकई अद्वितीय और अप्रतिम है. अंबेडकर हमेशा से मानते आए थे कि दलितों और पिछड़ों की हालत में सुधार तभी होगा जब इसे संविधान में संहिताबद्ध किया जाए. ये मार्ग कानूनी सुधारों और आरक्षण का था.

दोनों एक दूसरे के पूरक थे
इंग्लैंड में लेबर पार्टी से हाउस ऑफ कामंस में सांसद रहे भीखू पारेख ने गांधी पर दो किताबें लिखीं. उसमें उन्होंने कहा, "अंबेडकर और गांधी दोनों को एक दूसरे का पूरक मानना चाहिए. क्योंकि दोनों ने एक जैसे काम अपनी अलग अलग शैलियों में किए. दोनों भारतीय जाति व्यवस्था और समाज के दृष्टिकोण में बदलाव लाना चाहते थे और दोनों ने धीरे धीरे इसे कर भी दिखाया."

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First published: October 3, 2019, 4:37 PM IST
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