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‘जब मैंने बिपिन रावत की सेना मुख्यालय में अपनी जगह अनुशंसा की’

‘जब मैंने बिपिन रावत की सेना मुख्यालय में अपनी जगह अनुशंसा की’

जनरल बिपिन रावत (General Bipin Rawat) की सेना में तरक्की में लें.ज. रि.सैयद अता हसनैन की भी एक भूमिका रही. (फाइल फोटो)

जनरल बिपिन रावत (General Bipin Rawat) की सेना में तरक्की में लें.ज. रि.सैयद अता हसनैन की भी एक भूमिका रही. (फाइल फोटो)

जनरल बिपिन रावत (General Bipin Rawat) की सेना में उच्च पदों पर कई बार उनके वरिष्ठ लेफ्टिनेंट जनरल (रि.) सैयद अता हसनैन ने सिफारिश की जिन्होंने जनरल रावत को बहुत करीब से काम करते हुए था. ले.ज. हसनैन ने जनरल बिपिन रावत के साथ अपने अनुभवों को साझा किया है कि कैसे जनरल रावत हमेशा उनकी अनुशंसाओं को पूरी तरह से सही साबित करते रहे.

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    (लेफ्टिनेंट जनरल रि. सैयद अता हसनैन) आज मैंने अपने एक दोस्त, सहयोगी, छोटे भाई को को दिया है. जनरल बिपिन रावत (General Bipin Rawat) 11वीं गोरखा रायफल्स की 5वीं बटालियन से थे. उनके पिता उसी यूनिट से एक लेफटिनेंट जनरल थे. मेरी तरह जनरल रावत भी सेना की दूसरी पीढ़ी के अफसर थे. वे दिसंबर 1978 में भारतीय सेना से जुड़े और भारतीय मिलीट्री एकेडमी में श्रेष्ठ हरफनमौला जेंटलमैन कैडिट बनकर सॉर्ड ऑफ ऑनर तक हासिल किया.

    मैं कई सालों तक उनसे मिलता रहा, लेकिन हम पहली  बार संपर्क में साल 2002 में आए. वे मिलिट्री सेक्रेटरी शाखा में तैनात हुए थे जो अफसरों के करियर और नियुक्ति के प्रबंधन के लिए सेना मुख्यालय की प्रमुख शाखा है. मैं पहले से ही इस शाखा का दो साल से हिस्सा था और उन्होंने ने मेरे साथ एक अधीनस्थ की तरह नहीं बल्कि साथी की तरह  एक साल तक काम किया. एक साल बाद मैं उरी में ब्रिगेडियर की हैसियत से तैनात हो गया और मुझसे कास तौर पर एमएस शाखा के मेरे बॉस सैन्य सचिव ने पूछा था कि मैं अपनी जगह कर्नल मिलिट्री सेक्रेटरी (नीति) के पद पर किसे रखना पसंद करूंगा. यह पद सैन्य सचिव के बहुत ही नजदीक का पद था.

    मुझे यह कहने में कोई हिचकिचाहट नहीं हुई कि मेरे पद को लेकर के लि सबसे अच्छे व्यक्ति बिपिन रावत  होंगे. मुझे लगा कि वे सक्षम, अच्छे और अपने कार्य में तेज व्यक्ति थे और वे इस काम को मुझसे बेहतर रह से कर सकते हैं. इसका बाद उस नियुक्ति के बाद उन्होंने दो साल तक काम किया और अच्छे से काम किया.

    इसके बाद जब में बारामूला के डाग्गर डिविजन में जनरल ऑफिसर कमांडिंग (GOC) के तौर पर तौनात था, वो राष्ट्रीय राइफल्स सेक्टर के कमांडर थे जो उस कमान के बहुत हि कठिन सेक्टर में से एक था. हमें कई बार ऑपरेशन के लिए संयोजन करना पड़ा और हमने कई ऑपरेशन एक साथ किए.

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    जनरल बिपिन रावत (General Bipin Rawat) ने कभी अपने वरिष्ठों को अपने काम के सिलसिले में निराश नहीं किया. (फाइल फोटो)

    कुछ साल  बाद 2010 में जब मैं कशमीर में कॉर्प्स कमांडर के तौर पर वापस आया तब जनरल वीके सिंह सेना प्रमुख थे. मैंने उन्हें याद दिलाया कि मेरी कमांड बारामूला डिविजन अब खाली हो गई है और मेरी जगह एक जनरल अफसर की तैनाती होनी है. मैंने यही कहा कि यदि मुझे चुनने कहा जाए तो मैं बिपिन रावत को चुनूंगा और उन्हें मेजर जनरल तक प्रोमोट कर उनहें GOC बनाना पसंद करूंगा, सेना प्रमुख मुझसे सहमत हो गए.

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    ये तीसरा मौका था जब हमने साथ मिलकर काम किया और मैं उन्हें कमांडिंग टीम में पाकर बहुत खुश था. उन्होंने अगले साथ सीधे मेरे साथ मिलकर बहुत अच्छा काम किया, जिसमें एलओसी पर आपरेशंस के अलावा बारामूला में आतंकियों को जवाबी अटैक करने का अभियान शामिल था. हम अक्सर ही एक दूसरे से बात करते और एक दूसरे के हेडक्वार्टर पर विजिट करते. इस तरह हमारा रिश्ता भी मजबूत होता गया. श्रीमती रावत हमेशा कश्मीर में होने पर हमारे यहां जरूर आती, हमारी फेमिली बांडिंग भी अच्छी रही.

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    जनरल बिपिन रावत (General Bipin Rawat) ने गोरखा राइफल्स से अपने सेना के करियर की शुरुआत की. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

    जब वह आर्मी चीफ बनाए गए और मैं रिटायर हो चुका था, तब शायद मैं पहला शख्स था, जिसको उन्होंने ये खबर सबसे पहले दी. मैं अब भी याद कर सकता हूं कि उन्होंने कहा था कि चूंकि मुझको दो सीनियर अफसरों को सुपरसीड करते हुए आर्मी चीफ बनाया गया है, लिहाजा इस पर विवाद भी हो सकता है. उन्होंने मुझसे पूछा कि पूर्व सीनियर होने के नाते क्या इसको सपोर्ट करता हूं,मेरा हां कहने से वह बहुत खुश हुए. मैने उनसे कहा कि अगर एक बार सरकार ने कोई फैसला कर लिया तो हमें उसका समर्थन करना चाहिए.

    कुछ सालों में हमारी दोस्ती ने एक स्वस्थ बौद्धिक बंधन का रूप ले लिया. ऐसा भी समय आता था जब वे मुझे कोई विचार साझा करना चाहते थे और मुजे सुबह सुबह फोन किया करते थे. वे जानते थे कि मैं ऑफिस के लिए 8.30 तक निकलता हूं इसलिए वे 7.30 बजे ही कॉल कर लेते थे.वे मुझसे कशमीर, सैन्य अवधारणाओं और अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक मामलों, जैसे विषयों पर चर्चा करते थे. उत्तराखंड की गढ़वाल राइफल से थे और उस राज्य से गहराई से जुड़े थे.

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    जनरल रावत अगले महीने  चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ के रूप में दो साल पूरे  करने वाले थे. पहले सीडीएस के तौर पर उन पर ही निर्भर था कि वे अपने शक्तियों को क्या दिशा दें. और उन्होंने इस बड़ी चुनौती को मामूली तरीके से नहीं लिया. उनके सामने तीनों सेवाओं  के 17-18 कमान को चार क्रियात्मक कमान में बदलने का मुश्किल काम था जब हर कोई उन्हें प्रभावित करने का प्रयास कर रहा था. मुझे लगताहै कि उन्होंने परिपक्व तरीके से काम किया और टीम वर्क का सम्मान करते हुए सेना, वायुसेना और नौसेना तीनों का समान रूप से तव्जजो दी.

    उनके सीडीएस के कार्यकाल में उन्हें कोरोना काल में ही लद्दाख की चुनौती मिली और 50 हजार सैनिकों को लद्दाख में इतनी जल्दी तैनात कर देना और उन्हें कड़कड़ाती ठंड में अच्छे काम करने लायक हालात बनाना कोई छोटी उपलब्धि नहीं थी. वे अपने काम के प्रति बहुत जुनूनी थी, उनकी ऊर्जा का स्तर मुझे चौंकाता था.  वे शायद केवल 4-5 घंटे ही सो पाते थे और काम से साथ सभी समाजिक कार्यक्रमों में शामिल होते थे.

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    जनरल और श्रीमती रावत (बिपिन और मधुलिका) आपने अपने पीछे दुखी दोस्तों को छोड़ दिया  है. ईश्वर आपको वह हर चीज दे जिसके आप हकदार हैं और आपकी आत्मा को शांति दे. हम उनके परिवार के लिए प्रार्थना करते हैं. जय हिंद

    लेफ्टिनेंट जनरल रि. सैयद अता हसनैन जनरल बिपिन रावत के वरिष्ठ रहे हैं और उन्हें 2002 से व्यवसायिक तौर पर जानते थे.
    (नोट- यह लेख ले. ज. रि. सैयद अता हसनैन की न्यूज18डॉटकॉम से बातचीत पर आधारित है.)

    Tags: Cds bipin rawat, General Bipin Rawat, India, Indian army

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