जब पहले वित्त मंत्री चेट्टी को पटेल की ये बात मानने के बाद देना पड़ा इस्तीफा

वो कौन सी अनियमितताएं थी, जिसने साफ-सुथरे माने जाने वाले देश के पहले वित्तमंत्री को ही वित्तीय गड़बड़ी में फंसा दिया, जिसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने उनसे इस्तीफा मांगा और उन्हें पद से हटना पड़ा

Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: July 5, 2019, 9:19 PM IST
Sanjay Srivastava
Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: July 5, 2019, 9:19 PM IST
भारत के पहले वित्त मंत्री आरके शनमुखम चेट्टी थे. बेहद काबिल और इकोनॉमी के जानकार. गांधीजी ने नेहरू की अनिच्छा के बाद भी उन्हें देश का पहला वित्त मंत्री बनाने पर जोर दिया. पटेल भी चाहते थे कि चेट्टी ही वित्त मंत्री बनें. लेकिन बाद में पटेल की एक बात मानने के चलते ही उन्हें अपनी कुर्सी गवानी पड़ी. संसद में उस बात पर इतना हंगामा हुआ कि नेहरू ने उनसे इस्तीफा मांग लिया.

शनमुखम चेट्टी ना तो कांग्रेसी थे और ना ही कभी आजादी आंदोलन में सक्रिय रहे बल्कि उन्हें ब्रिटिश समर्थक माना जाता था. जब आजाद भारत में पहली सरकार बनाने की बात आई तो गांधीजी ने वित्त मंत्री के रूप में चेट्टी का नाम आगे किया. गांधी क्यों ऐसा चाहते थे, उसकी कुछ वजहें भी थीं.

चेट्टी मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज और फिर मद्रास लॉ कॉलेज से पढ़े-लिखे थे. वो कोयंबटूर के बड़े बिजनेस परिवार से ताल्लुक रखते थे. उनके परिवार की वसंत मिल्स कंपनी को दक्षिण भारत में बड़ी कपड़ा मिलों में गिना जाता था.

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वो ऐसे शख्स भी थे, जो भारत की आजादी के पहले ही बेहतरीन इकोनॉमिस्ट के रूप में पहचान बना चुके थे. कई इंटरनेशनल समिट में जाते रहते थे. सियासत में भी सक्रिय थे. उन्होंने सियासी करियर की शुरुआत कोयंबटूर में म्युनिसिपिल कॉरपोरेशन में काउंसलर के रूप में की. फिर सीढियां चढ़ते हुए सेंट्रल लेजिस्लेटिव एसेंबली में प्रेसीडेंट तक बने.

गांधीजी चाहते थे कि इकोनॉमी के जानकार शनमुखम चेट्टी को आजादी के बाद देश का पहला वित्त मंत्री बनाया जाए


क्यों गांधीजी चाहते थे कि वो वित्त मंत्री बनें
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दक्षिण भारत की जानी-मानी वेबसाइट "मद्रास कूरियर डॉट कॉम " के अनुसार गांधीजी आजाद भारत में ऐसे शख्स को वित्तमंत्री  के रूप में देखना चाहते थे जो स्वतंत्र दिमाग का हो, इकोनॉमी में तेज समझबूझ वाला हो. कोचीन के दीवान के रूप में उन्होंने वहां कई तरह के आर्थिक सुधार लागू किये थे, उसने उन्हें देशभर में ख्याति दी थी. गांधीजी ये भी चाहते थे कि ऐसे व्यक्ति को वित्त मंत्री बनना चाहिए जो पाकिस्तान के साथ फाइनल सेटलमेंट में कड़ी बातचीत करे.

पर्दे के पीछे एक कहानी और चल रही थी
हालांकि पर्दे के पीछे एक कहानी और चल रही थी. नेहरू की पहली पसंद वित्त मंत्री के रूप में जॉन मथाई थे. पटेल नहीं चाहते थे कि वो वित्त मंत्री बनें. वजह शायद ये थी कि मथाई भी उस टैक्स के समर्थक थे, जो आजादी से ठीक पहले वित्त मंत्री के रूप में लियाकत अली खान ने लागू किया था. इसे एक्सेस प्रॉफिट टैक्स के रूप में जाना जाता था.

पटेल का मानना था कि इस टैक्स की मार हिंदू उद्यमियों और कारोबारियों पर ज्यादा पड़ रही है. लिहाजा इसे खत्म होना चाहिए. इसीलिए वो गांधीजी के इस बात के समर्थन में थे कि चेट्टी को ही वित्त मंत्री बनना चाहिए.

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इनकम टैक्स कमीशन का गठन 
चेट्टी ने जब अपना पहला बजट पेश किया तो इस टैक्स को हटा भी दिया. लेकिन इसी बीच उद्योगपतियों और कारोबारियों की मुनाफाखोरी के अलावा टैक्स चोरी के आरोपों के बीच नेहरू ने इनकम टैक्स कमीशन बनाने का फैसला किया. इसका उद्देश्य बड़े उद्योगपतियों के वित्तीय अनियमितताओं की जांच करना था. नेहरू ने जब वारादचेरियर को इस कमीशन का मुखिया बनाया तो वारादचेरियर ने उनसे भरोसा लिया कि उनके काम में कोई दखलअंदाजी नहीं होगी.

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चेट्टी ने कई कारोबारियों का यूं सपोर्ट किया
जब इनकम टैक्स कमीशन ने काम शुरू किया. तो कई इंडस्ट्रिलिस्टों और बिजनेसमैन के हाथपांव फूलने लगे. जब ये निशाने पर आए कारोबारियों की सूची वित्त मंत्री के पास पहुंची. तो पता लगा कि उन्होंने उसमें से कोयंबटूर के कुछ कपड़ा मिल मालिकों के साथ गुजरात और देश के कई बिजनेसमैन के नाम इस लिस्ट से निकाल दिये हैं.

तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू के निजी सचिव एमओ मथाई ने अपनी किताब "रेमिनिसेंसेज ऑफ नेहरू एज" में इस बारे में लिखा, "पटेल ने चेट्टी से अनुरोध किया कि कुछ गुजराती बिजनेसमैन और इंडस्ट्रलिस्ट के  नाम लिस्ट से हटा दें. चेट्टी ने ऐसा ही किया. इस बात के सामने आने के बाद संसद में हंगामा मच गया. चेट्टी निशाने पर आ गए. पटेल एकदम चुप रहे. उन्होंने इस बारे में कुछ भी नहीं बोला. चेट्टी शूली पर चढ़ गए, पटेल उस शख्स के बचाव में भी नहीं आए जिसने उनके कहने पर ये काम किया था."

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चेट्टी को इस्तीफा देना पड़ा
नेहरू इससे खिन्न हो गए. उन्होंने चेट्टी से नैतिक आधार पर इस्तीफा देने को कहा. चेट्टी को इस्तीफा देना पड़ा. इसके बाद नेहरू ने उन मथाई को तुरंत वित्त मंत्री बना दिया, जिसका एक समय में पटेल ने विरोध किया था. अबकी पटेल कुछ नहीं कर पाए.

हालांकि जॉन मथाई ने वित्त मंत्री बनने के बाद कहा, चेट्टी खुद भी बेकसूर नहीं थे, उनके गुनाह उससे कहीं ज्यादा थे, जो सामने आए थे.

संसद में जब-जब शायराना हुआ देश का बजट

वित्त मंत्री पद से हटने के बाद भी चेट्टी का सियासी सफर करीब डेढ़ दशक तक चलता रहा. वो पहले स्वराज पार्टी में शामिल हुए. फिर जस्टिस पार्टी का हिस्सा बन गए.

देश का पहला बजट, जिसे चेट्टी ने पेश किया था, उसे व्यावहारिक बजट माना गया था, हालांकि उसमें सबसे ज्यादा धन रक्षा के लिए दिया गया था


कैसा था चेट्टी का पहला बजट यानि देश का पहला बजट 

वैसे हमें जानना चाहिए कि चेट्टी का पहला बजट कैसा था. ये बजट 26 नवंबर 1947 के दिन शाम 05.30 बजे संसद में रखा गया. आजाद भारत का पहला बजट भी घाटे का बजट था. इसमें गरीबों के साथ देश के विकास के लिए कुछ किये जाने का खयाल रखा गया था लेकिन सबसे ज्यादा धन रक्षा के लिए आवंटित किया गया.

रक्षा को मिला था बजट का सबसे बड़ा हिस्सा 
पहले बजट में राजस्व के जरिए 171.50 करोड़ की उगाही का लक्ष्य रखा गया था जबकि खर्च के मद में 192.39 करोड़ रुपए का  प्रावधान था. इस बजट में रक्षा के लिए 92.74 करोड़ रुपयों का प्रावधान किया गया.

उस समय इस बजट को देश के हालात, बंटवारे के बाद की स्थिति, शरणार्थियों को मदद की दृष्टि से काफी व्यावहारिक बजट माना गया. तब देश बाहर से अनाज का आयात कर रहा था. अपने बजट भाषण में वित्त मंत्री ने उम्मीद जाहिर की थी कि अगले एक दो सालों में देश उस स्थिति में आ जाएगा जब बजट में अनाज आयात और रक्षा के मद में खर्च कम हो जाएगा. हालांकि डिफेंस खर्च को लेकर ऐसा कभी नहीं हुआ.

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First published: July 5, 2019, 9:09 PM IST
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