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जब बीएचयू का नाम बदले जाने पर धमकाए गए थे पूर्व राष्ट्रपति राधाकृष्णन

पूर्व राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन

पूर्व राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन

17 अप्रैल, 1975 को सर्वपल्ली राधाकृष्णन का निधन हो गया था. 1965 में तत्कालीन शिक्षा मंत्री एम.सी. छागला ने की थी बीएचयू का नाम बदलने की कोशिश.

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    एक शिक्षाविद के रूप में सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णन की ख्याति और काम ही है जो हम पांच सितंबर को शिक्षक दिवस मनाते हैं लेकिन एक राजनयिक के रूप में भी वह पैनापन और चतुरता रखते थे. वे देश के दूसरे राष्ट्रपति भी रहे. 17 अप्रैल, 1975 को उनका देहांत हो गया था. हालांकि राधाकृष्णन पूरे भारत में सम्मानित थे लेकिन एक बार बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के कुछ छात्रों ने उन्हें घेर लिया था. यह वाकया हुआ था बीएचयू का नाम बदले जाने के प्रस्ताव के चलते.

    वैसे करीब दो साल पहले भी संस्थानों के नामों के इस खेल पर विचार हुआ था. हालांकि इसपर सुझाव सौंपे जाने के कुछ ही घंटों के बाद केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री प्रकाश जावडेकर और अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने सफाई देते हुए इन्हें बहुत पुराने संस्थान बताया और 'सरकार की नाम बदलने की कोई मंशा नहीं है' इससे भी अवगत कराया था. लेकिन उस वक्त मामला बहुत गर्म हो गया था.

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    सबसे पहले मौलाना आजाद ने की थी मांग
    भारत के पहले शिक्षामंत्री मौलाना आजाद ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी और बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी, इन दोनों ही विश्वविद्यालयों में से धार्मिक शब्दों को 1951 से पहले हटाने की बात कही थी. सरकार, बीएचयू एक्ट, 1915 और अलीगढ़ मुस्लिम एक्ट, 1920 में सुधार का प्रस्ताव भी 1948 में रख चुकी थी हालांकि बात आगे नहीं बढ़ी थी.

    1961 में जवाहर लाल नेहरू ने भी इन शब्दों को हटाने के संदर्भ में कहा था कि ये तभी संभव हो सकेगा जब विश्वविद्यालयों से जुड़े लोग इस कदम के लिए तैयार हों. बल्कि नेहरू के कार्यकाल के आखिरी दौर में शिक्षामंत्री बने एम.सी. छागला ने तो बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी का नाम बदल ही दिया था पर छात्र आंदोलन के बाद संशोधन विधेयक स्थगित करना पड़ा था.

    संसद में संशोधन विधेयक पारित कर ही बदला जा सकता है नाम

    बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी दोनों ही केंद्रीय विश्वविद्यालय हैं, जो बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी एक्ट, 1915 और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी एक्ट, 1920 के जरिए स्थापित किए गए हैं.

    आजादी के बाद में इनकी व्यवस्था का कार्यभार केंद्र सरकार को सौंप दिया गया था. ऐसे में अगर इनके नाम बदले जाने की बात होती है तो इन एक्ट में संशोधन के जरिए ही ये काम हो सकता है.

    ऐसे में इस संशोधन की शुरुआत का बीड़ा उठाया 1963 से 1966 तक भारत के शिक्षामंत्री रहे एम.सी छागला ने.

    छागला ने राज्यसभा में ये बिल रखते हुए कहा, 'भारत की धर्मनिरपेक्षता की नीति की स्वीकार्यता के लिए हिंदू शब्द को हटाना इच्छित है.'

    जनसंघ को छोड़कर सभी राजनीतिक दलों ने बड़ी संख्या में इस कदम का स्वागत किया और 'हिंदू' शब्द को हटाकर विश्वविद्यालय का नाम 'मदन मोहन मालवीय काशी विश्वविद्यालय' कर दिया गया. ये बिल राज्य सभा में पास भी हो गया. छागला ने इसके बाद अपने भाषण में कहा था-

    'जबकि हमने हिंदू शब्द हटा दिया है. हमने मदन मोहन मालवीय और काशी शब्द को शामिल कर लिया है. दोनों ही हिंदू संस्कृति, हिंदू दर्श और हिंदू इतिहास के सबसे ऊंचे, सबसे अच्छे और सबसे महान आदर्शों को दर्शाते हैं. इसलिए हिंदुत्व और हिंदू धर्म के लिए ये कोई अपमान नहीं है, जैसा माना जा रहा था.'

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    मोहम्मदअली करीम छागला यानी एम.सी. छागला एक शिया मुस्लिम थे और व्यापारी घराने से आते थे. पर उन्होंने लिंकन कॉलेज, ऑक्सफोर्ड से कानून की पढ़ाई की थी और बाद में बॉम्बे हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस भी बने थे.

    इससे पहले उन्होंने पाकिस्तान के कायद-ए-आजम मोहम्मद अली जिन्ना के सचिव के रूप में भी काम किया था. बाद में वो भारत के शिक्षामंत्री और विदेशी मामलों के मंत्री भी रहे.

    शिक्षा मंत्री रहते हुए उनके कुछ कदमों की अक्सर चर्चा होती है, जिसमें प्राथमिक शिक्षा के विकास के लिए उठाए गए कदम, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की स्थापना आदि शामिल हैं.

    आरएसएस ने छागला के खिलाफ खोल दिया था मोर्चा
    बीएचयू संशोधन विधेयक राज्यसभा में 15 नवंबर को पास हो गया. जबकि लगातार जनसंघ, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् और हिंदू महासभा इस कदम का विरोध कर रहे थे. हिंदू महासभा ने तो इसे हिंदू धर्म के खिलाफ एक षड्यंत्र कहकर प्रचारित किया और लोगों का इसके खिलाफ लड़ने के लिए आह्वान भी किया था.

    साथ ही 'हिंदू' शब्द को विश्वविद्यालय के नाम में वापस लाने को आरएसएस अपने लिए वैचारिक युद्ध मानता था. पर जैसा कि आरएसएस खुद को एक सांस्कृतिक संगठन बताता है तो उसका खुद राजनीतिक गतिविधियों में कूदना संभव नहीं था. इसलिए आरएसएस ने बीएचयू के छात्रों के जरिए विरोध को संगठित किया. इसमें ज्यादातर वो छात्र शामिल हुए जो या तो आएएसएस के सदस्य थे या फिर उसकी विचारधारा से प्रभावित थे. उन दिनों आरएसएस का एक कार्यालय बीएचयू के अंदर भी हुआ करता था, जिसने इस काम में संघ की पूरी सहायता की.

    हिंदुत्व की राजनीति करने का था स्वर्णिम मौका
    ऐसे वक्त में जब आरएसएस 1965 में छात्रों को विश्वविद्यालय के अंदर एकजुट करने में लगा थी तो उधर जनसंघ वाराणसी और आस-पास के क्षेत्रों में सरकार के इस कानूनी कदम को रोकने के लिए लोगों को जुटा रहा था. इसमें इनके दो सहयोगी 'हिंदू महासभा' और 'रामराज्य परिषद्' भी बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे थे. ऐसे मौके पर जनसंघ की सहयोगी पार्टियों ने ताबड़तोड़ मीटिंग कीं और छागला के दृष्टिकोण को नकार दिया. उन्होंने हिंदू शब्द को हटाए जाने को हिंदू धर्म और संस्कृति पर हमला बताया.

    आग भड़कनी तेज हो गई
    आंदोलनकारियों ने 15 नवंबर की शाम को ही बीएचयू के मेन गेट (सिंहद्वार) पर विरोध में एक मीटिंग बुलाई. जिसमें भारत सरकार को अपने फैसले पर फिर से सोच लेने के लिए 10 दिन का अल्टीमेटम दिया गया.

    सरकार को चुनौती देते हुए कहा गया कि अगर सरकार 25 नवंबर तक अपने फैसले को नहीं बदलती है तो छात्र कुछ भी कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र होंगे.

    छात्रों ने मदन मोहन मालवीय की मूर्ति के सामने इसके लिए हर तरह का बलिदान करने की कसमें भी खाईं. इस फैसले के विरोध में जनसंघ और बीएचयू के छात्रों की बनाई 'एक्शन कमेटी' ने फैसले के विरोध में 17 नवंबर को आम हड़ताल का आयोजन किया.

    एक नेता ने भाषण देते हुए कहा, 'भारत में हिंदुत्व खतरे में है. अभी विश्वविद्यालय के नाम से हिंदू हटाया जा रहा है. आगे चलकर ब्राह्मणों की चोटियां और जनेऊ काटे जाएंगे. फिर मूर्तियां भी तोड़ी जाएंगी और बड़ी संख्या में धर्मपरिवर्तन कराया जाएगा.'

    उन्होंने इसे कांग्रेस सरकार का तुष्टीकरण का प्रयास बताया और ये भी कहा कि 'बीएचयू के नाम से हिंदू हटाया जा रहा है पर एएमयू के नाम से मुस्लिम कभी नहीं हटाया जाएगा.'

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    17 नवंबर, 1965 को बनारस पूरी तरह से बंद रहा. दोपहर में काशी विद्यापीठ के 1,500, बीएचयू के 3,000 छात्रों और हरीशचंद्र कॉलेज, बनारस के हजारों छात्रों ने मिलकर शहर भर में रैली निकाली.

    ये छात्र हाथों में युद्धघोष के हिंदू प्रतीक घंटे और शंख लिए हुए थे और इनकी आवाजों के बीच 'हर हर महादेव' के जयघोष गूंज रहे थे. लगाए जा रहे दूसरे नारे थे, 'हम जान दे देंगे पर हिंदू शब्द कभी हटाने नहीं देंगे'. 'छागला, शर्म करो, शर्म करो!', 'छागला तुरंत इस्तीफा दो'.

    जनसंघ ने भी बनारस के टाउनहॉल में मीटिंग की, जिसमें हजारों लोग शामिल हुए. इस मीटिंग में जनसंघ ने सरकार को फैसला वापस न लेने की स्थिति में देशव्यापी आंदोलन करने और 1 करोड़ लोगों के साथ संसद को घेरने की धमकी दी. मीटिंग में संकल्प रखा गया,

    'हिंदू होना और भारतीय नागरिक होना एक ही बात है. ऐसे में सरकार को विश्वविद्यालय के नाम में ये शब्द बने रहने देना चाहिए.'

    छागला ने कूटनीतिक प्रयास जारी रखे
    छागला ने अपना अगला कदम बड़ी सावधानी से चला और 17 नवंबर को उन्होंने कहा कि नाम बदलना सरकार का नहीं संसद का कदम है. ऐसे में भले ही राज्यसभा ने अपनी अनुमति दे दी हो पर लोकसभा इसमें संशोधन कर सकती है. छात्र बाहरी राजनीतिक ताकतों के बहकावे में न आएं.

    उन्होंने छात्रों से आंदोलन वापस लेकर लोकसभा पर फैसला छोड़ देने को कहा. साथ ही सांत्वना दी कि लोकसभा उनके विचारों और भावनाओं को ध्यान में रखकर ही कोई फैसला लेगी.

    इसके बाद छागला ने बीएचयू के तत्कालीन वीसी एन.एच. भगवती को फोन किया और उनसे कहा कि छात्रों तक ये बात पहुंचा दी जाए कि अगर छात्रों का कोई दल इस मुद्दे पर बातचीत के लिए शिक्षामंत्री (यानि खुद उनसे) मिलने आता है तो उन्हें बेहद खुशी होगी.

    छागला की इस अपील का हालांकि तुरंत कोई असर नहीं हुआ पर 19 नवंबर को छात्रों का एक दल छागला से मिला और अपने नाम न बदलने के फैसले के बारे में किसी भी तरह से पीछे न हटने की सूचना दी. राज्यसभा सदस्यों को उम्मीद भी नहीं थी कि ऐसी प्रतिक्रिया सामने आएगी.

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    दीनदयाल उपाध्याय ने भी आखिरी दम तक लड़ने की हुंकार भरी
    19 नवंबर को हुई एक मीटिंग में जनसंघ और आरएसएस के स्वर में स्वर मिलाते हुए बीएचयू एक्शन कमेटी के छात्रों ने भी कहा,

    'विश्वविद्यालय के नाम से हिंदू हटाना केवल विश्वविद्यालय के नहीं बल्कि देश के हर हिंदू के लिए अपमान की बात है.'

    उसी दिन शाम को फिर शहर के करीब 10 हजार छात्रों ने शहर भर में मशाल जुलूस निकाला. उधर नई दिल्ली में मौजूद बीएचयू एक्शन कमेटी के छात्र लॉबिंग में लगे थे. उन्होंने 20 नवंबर को प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री, संसदीय मामलों के मंत्री सत्य नारायण सिन्हा और गृहमंत्री गुलजारी लाल नंदा से बातचीत की.

    इसी बीच जनसंघ ने 20 नवंबर को पूर्वी उत्तरप्रदेश के मिर्जापुर जिले में एक पब्लिक मीटिंग का आयोजन किया. जिसमें बोलने के लिए जनसंघ के महासचिव दीनदयाल उपाध्याय भी आए थे. उन्होंने वहां बोलते हुए आखिरी दम तक नाम न बदलने देने के पार्टी के इरादे की बात कही.

    एस राधाकृष्णन को मिली धमकी
    इसी बीच 21 दिसंबर को भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राधाकृष्णन बनारस के तत्कालीन संस्कृत विश्वविद्यालय (अब संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय) के दीक्षांत समारोह के लिए बनारस पहुंचे. बीएचयू छात्रों ने उनके सामने भी प्रदर्शन किया और उन्हें धमकी दी कि वो (आंदोलनकारी) अपने शरीर की आखिरी खून की बूंद रहते बीएचयू के नाम से हिंदू शब्द नहीं हटने देंगे.

    "वे लोग उन देशद्रोहियों को कुचल के रख देंगे, जिन्होंने बीएचयू के नाम से हिंदू शब्द को हटाने की मांग उठाई. वो राज्यसभा की मनमानी को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करेंगे." बताते चलें डॉ. राधाकृष्णन स्वयं बीएचयू के वीसी रह चुके थे. (मदन मोहन मालवीय के बाद दूसरे.)

    22 नवंबर को आंदोलनकारी लड़कों ने यूनिवर्सिटी प्रशासन को हाथों में ले लिया और उन्हीं को यूनिवर्सिटी के अंदर घुसने दिया, जिन्होंने अपनी बांहों पर काले कपड़े बांध रखे थे.

    23 नवंबर को बीएचयू मेनगेट और आसपास की इमारतों पर काले झंडे फहराए गए और काला दिवस मनाया गया. 24 नवंबर को 15 छात्रों ने एक दिन की भूख हड़ताल की और चूंकि 25 तारीख को दस दिन की समयसीमा खत्म हो रही थी तो 25 को बनारस के सारे शैक्षणिक संस्थानों में हड़ताल का आयोजन किया.

    आखिरकार सरकार को झुकना पड़ा
    24 नवंबर को ही इन परिस्थितियों के बीच लोकसभा में बीएचयू संशोधन विधेयक पर चर्चा शुरू हुई. लोकसभा पहले ही बहुत दबाव में थी. दिनभर की चर्चा के बाद आखिर में बिल को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित करने का फैसला लिया गया. पर जनसंघ ने इस फैसले को सरकार का बिछाया जाल बताया और आंदोलन जारी रखने की बात कही.

    उनका कहना था कि मौका मिलते ही सरकार फिर नाम बदलने की कोशिश करेगी. बीएचयू एक्शन कमेटी ने अगले दिन फिर बनारस बंद का आह्वान किया. उनका कहना था कि सरकार बीएचयू संशोधन विधेयक को 30 नवम्बर तक बीएचयू संशोधन विधेयक को पूरी तरह से वापस ले ले नहीं तो प्रदर्शनकारी छात्र दिल्ली मार्च करेंगे और संसद को घेर लेंगे. जनसंघ ने भी 1 करोड़ लोगों के साथ संसद को घेरने की धमकी दी.

    मामला इंटरनेशनल हो रहा था
    30 नवंबर को नेपाल के राजा बीएचयू के विशेष दीक्षांत समारोह में शिरकत करने वाले थे, जिन्हें डॉक्टरेट की उपाधि भी दी जानी थी. पर आंदोलनकारियों ने सरकार के इस बिल के विरोध में नेपाल के राजा पर दीक्षांत समारोह में शामिल न होने का दबाव बनाने का फैसला किया. पर सरकार के बिल को स्थगित करने के बाद से आंदोलनकारियों की एकता में भी कमी आने लगी थी. जिसके चलते 29 नवंबर को आखिरकार ये आंदोलन छात्रों ने वापस ले लिया.

    Jawahar Lal Nehru

    उस दौर की रिपोर्ट्स में कहा गया है कि छागला ने दो स्तरों पर गलतियां कीं. नेहरू के विजन की बात करने वाले छागला ने नाम बदलने के फैसले से पहले यूनिवर्सिटी के लोगों को अपने समर्थन में नहीं लिया, जबकि नेहरू ने 1961 में ही ऐसा करने को कहा था.

    साथ ही उन्होंने दोनों ही यूनिवर्सिटी (बीएचयू और एएमयू) का नाम एक साथ बदलने की बजाए केवल बीएचयू का नाम बदलने की कोशिश की. शायद उनका दोनों धार्मिक शब्दों को एक साथ हटाने का प्रयास इतना बड़ा आंदोलन न खड़ा होने देता. और ऐसी हालत में कट्टर तत्वों को छात्रों को धर्म के नाम पर भड़काने में भी कठिनाई होती.

    पर सोचिए अगर ऐसा हो गया होता तो आज हम 'काशी हिंदू विश्वविद्यालय' को 'मदन मोहन मालवीय काशी विश्वविद्यालय' के नाम से जान रहे होते. ऐसा भी हो सकता है कि इस वाकये के चलते ही ऑडिट कमेटी की नामों को बदले जाने की सिफारिश पर सरकार की ओर से इतनी जल्दी सफाई आई है.

    (स्त्रोत- एम.सी. छागला: ए टाइटन अमंग नेशनलिस्ट, वी. सुंदरम, अनिल बरन का 'द इंडियन जर्नल ऑफ पॉलिटिकल साइंस' में इसी विषय पर छपा आलेख, प्रेशर ग्रुप्स एंड पॉलिटिक्स ऑफ इंफ्लूएंस, संपा. वीरेंद्र ग्रोवर, मीडिया रिपोर्ट्स)

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