जब माफी मांगने और 100 रुपये जुर्माना देने से ज़्यादा ज़रूरी था जेल जाना!

जब माफी मांगने और 100 रुपये जुर्माना देने से ज़्यादा ज़रूरी था जेल जाना!
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मथाई मंजूरन.

अदालत की अवमानना के मामले में वकील और एक्टिविस्ट प्रशांत भूषण (Prashant Bhushan) ने माफी मांगने से इनकार कर दिया और कहा कि माफी मांगना 'उनके अपने ज़मीर की अवमानना' के बराबर होगा. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) क्या फैसला देगा, यह देखना है, लेकिन इतिहास खुद को दोहरा चुका है. जी हां, 60 साल पहले भी ऐसा हुआ था.

  • News18India
  • Last Updated: August 24, 2020, 6:22 PM IST
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'100 रुपये का जुर्माना दीजिए या फिर कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट के जुर्म में जेल जाइए.' अदालत ने जब यह फैसला (Court Verdict) सुनाया तो दोषी के कठघरे से आवाज़ आई कि वो जेल जाना पसंद करेगा. सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में प्रशांत भूषण (Lawyer-Activist Prashant Bhushan) ने कोर्ट की अवमानना के आरोप में माफी मांगने से इनकार करने और जेल जाने के लिए तैयार होने की बात कही, लेकिन यह केस करीब 61 साल पहले का है, जो केरल के हाई कोर्ट (Kerala High Court) में चल रहा था.

साल 1959 में, पत्रकार और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मथाई मंजूरन (Mathai Manjooran) प्रैस की आज़ादी के लिए खड़े हुए थे और अदालत की अवमानना के एक केस में उन्होंने माफी मांगने से इनकार कर दिया था. जुर्माना देकर छूटना भी उन्हें गवारा नहीं था और स्वतंत्र प्रैस की मांग के लिए उन्होंने जेल जाने में ज़रा भी हिचकिचाहट नहीं दिखाई थी. जानिए कि क्या था ये दिलचस्प और ज़रूरी केस.

मंजूरन का केस और अदालत का फैसला
करीब 62 साल पहले केरल के त्रिशूर में सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी और कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच हुई हिंसा में चाकुओं के हमले से छह कांग्रेसी मारे गए थे. इस मामले की खबर मलयालम के दैनिक अखबार केरल प्रकाशम में विस्तार से 29 जुलाई 1958 के संस्करण में छापी गई थी, जिसमें कोर्ट को लेकर भी टिप्पणी थी. इस खबर के छपने के बाद एडिटर मंजूरन और प्रकाशक सुधाकरण के खिलाफ कोर्ट की अवमानना का केस चला था.
मंजूरन और सुधाकरण दोनों ने ही अपने शपथ पत्र में इस आरोप को मानने से इनकार किया. यही नहीं, दोनों ने कहा कि वो माफी भी नहीं मांगेंगे. इस तरह के एफिडेविट के बाद केस आगे बढ़ा. करीब एक साल बाद अदालत ने 20 पेज के फैसले में मंजूरन और सुधाकरण को दोषी करार दिया. हालांकि पत्रकार को जेल भेजने में अदालत को भी हिचक थी इसलिए मंजूरन को 100 रुपये के जुर्माने का एक रास्ता भी दिया गया था. साथ ही, सुधाकरण के लिए 15 दिनों तक 50 रुपये जुर्माना देने का रास्ता था.



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कोच्चि स्थित 'मथाई मंजूरन मार्ग' की बदहाली की यह तस्वीर इंडियन एक्सप्रेस ने 2012 में छापी थी.


लेकिन, दोनों ने ही बोलने की आज़ादी और प्रैस की स्वतंत्रता के अधिकार के हवाले से जेल जाना कबूल किया. दोनों को त्रिशूर की वियुर जेल भेजा गया. लेकिन कहानी अभी बाकी थी.

स्वराज चौक पर 'आज़ादी' के दीवानों का सत्कार
अदालत के इस फैसले और लोगों की भावनओं के बीच कितना फर्क था, यह तब नज़र आया जब मंजूरन जेल से रिहा होकर बाहर आए. उनके समर्थकों और दोस्तों ने भीड़ की मौजूदगी में जेल से 4 किमी दूर त्रिशूर के बीचों बीच स्थित स्वराज चौक पर मंजूरन का स्वागत सत्कार किया. यही नहीं, इसी तरह का सत्कार कार्यक्रम मंजूरन के गृह नगर एर्नाकुलम और कोट्टायम में भी किया गया.

केरल के टीवी चैनलों पर होने वाले कार्यक्रमों में बतौर वक्ता शामिल हुए वकील ए जयशंकर के हवाले से द टेलिग्राफ के लेख में कहा गया है कि इस तरह के सत्कार कार्यक्रमों में मंजूरन ने प्रशासन के खिलाफ तीखे भाषण दिए. यही नहीं, सुप्रीम कोर्ट में जब भूषण के खिलाफ अवमानना का केस चला, तब जयशंकर ने मंजूरन पर वीडियो कमेंट्री भी जारी की थी.

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मंजूरन : देश के भुला दिए गए नायक
इसी साल 14 जनवरी को मंजूरन की 50वीं पुण्यतिथि थी, लेकिन उन्हें किसी खास तरीके से याद नहीं किया गया. इसकी एक वजह यह भी हो सकती है कि मंजूरन ने शादी नहीं की थी इसलिए उनकी संतानें नहीं हैं, जो उनके नाम और छवि को आगे बढ़ा सकें. जयशंकर की किताब में 1912 को पैदा हुए मंजूरन की ज़िंदगी के बारे में बताया गया है कि किस तरह वो फ्रीडम फाइटर, आग उगलने वाले वक्ता और समाजवादी क्रांतिकारी रहे.

सिर्फ 15 साल की उम्र में साइमन कमीशन के विरोध में 1928 में हुए प्रदर्शनों में मंजूरन ने हिस्सा लिया था. 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में मंजूरन खुलकर बोले थे और जयशंकर की किताब के मुताबिक मैसूर से विस्फोटक ले जाकर कोझिकोड में बम बनाने के क्रांतिकारियों के कदम के पीछे मंजूरन ही मास्टरमाइंड थे. केरल समाजवादी पार्टी के संस्थापक मंजूरन हालांकि लेफ्ट पार्टियों के आलोचक थे, लेकिन नंबूदरीपाद सरकार में उन्हें 1967 से 1969 तक श्रम मंत्री बनाया गया था.

जयशंकर के मुताबिक 'मंजूरन उस समय के प्रशांत भूषण थे'. इसे उल्टा भी कहा जा सकता है कि प्रशांत भूषण इस समय के मंजूरन हैं. बहरहाल, केरल राज्य की स्थापना के प्रमुख प्रस्तावकों में भी मंजूरन का नाम शुमार रहा है. इतनी उपलब्धियों और योगदान के बावजूद उन्हें भुला दिया जाना देश की विडंबना ही है.
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