#Gandhi@150: गांधीजी की हत्या का बदला लेना चाहते थे उनके बेटे हरिलाल...

#Gandhi@150: गांधीजी की हत्या का बदला लेना चाहते थे उनके बेटे हरिलाल...
गांधीजी के बड़े बेटे हरिलाल, जिन्होंने पिता के खिलाफ विद्रोह कर दिया था

#Gandhi@150: महात्मा गांधी के बड़े बेटे हरिलाल ने जिंदगी भर अपने पिता से विद्रोह किये रखा. उन्होंने हर वो काम किया जो पिता को पसंद नहीं था. लेकिन जब बापू की हत्या हुई तो यही हरिलाल गुस्से में क्यों भर गए थे.

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  • Last Updated: September 27, 2019, 7:37 PM IST
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ये सबको मालूम है कि महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) के संबंध उनके बड़े बेटे हरिलाल (Harilal) से अच्छे नहीं थे. महात्मा गांधी अक्सर कहा करते थे कि आजादी की लड़ाई लड़ना तो मेरे लिए आसान है लेकिन हरिलाल को सही रास्ते पर लाने की लड़ाई मैं हार रहा हूं. बाप-बेटे के संबंध जैसे थे, उसमें हरिलाल लगातार हर वो काम करते थे, जिससे उनके पिता दुखी हों. लेकिन जब गांधीजी की हत्या (Gandhi murder) की खबर आई तब हरिलाल का क्रोध जिसने भी देखा वो दंग रह गया.

हरिलाल के भतीजे और देवदास गांधी के बेटे गोपालकृष्ण गांधी ने अपने हालिया लेख "गांधी'ज लास्ट जेम" में लिखा, "बेशक हरिलाल के मन में पिता के लिए गुस्सा छिपा रहा हो लेकिन वो पिता पर खासा गर्व भी करते थे.

जब गांधीजी की हत्या हुई तो हरिलाल मुंबई में थे. जब उन्हें ये खबर पता लगी तो वो गुस्से से उबलने लगे. फिर चीत्कार भरी आवाज निकली, मैं पिता की मौत का बदला मौत से लूंगा. कृष्णगोपाल ने लेख में लिखा, "हरिलाल की नातिन ने मुझे एक पुराने गुजराती अखबार की क्लिपिंग दिखाई, जिसमें लिखा था, जब हरिलाल ने सुना गांधीजी की हत्या हो गई तो गुस्से से कांपने लगे. फिर वो दहाड़े मैं तब तक चैन से नहीं बैठूंगा, जब तक उस शख्स को मार न दूं, जिसने मेरे पिता की हत्या की है. वो असल में दुनिया के अकेले संत थे और महात्मा."  वैसे गुस्सा और तेवर हमेशा से हरिलाल की शख्सियत का हिस्सा थे.

हरिलाल की तो हालांकि नाथूराम गोड्से से जेल में मुलाकात नहीं हुई. लेकिन उनके छोटे भाई देवदास ने जरूर जेल जाकर उससे मुलाकात की थी. गांधी के तीसरे पुत्र रामदास गांधी ने नाथूराम को फ़ांंसी की सज़ा सुनाए जाने के तीन महीने बाद अंबाला जेल में 17 मई 1949 को एक लंबा भावपूर्ण पत्र भी भेजा था. जिसमें नाथूराम को अहसास कराने की कोशिश की थी कि उसने गांधी की हत्या करके ऐसी ग़लती की, जिसका अहसास उसे नहीं है.



तब बीमार हरिलाल भाई के घर पहुंचे
जब गांधी का अंतिम संस्कार दिल्ली में हो रहा था, तब हरिलाल भी मुंबई से वहां पहुंचे थे लेकिन वो जिस हाल में थे, उसमें शायद ही कोई उन्हें पहचान पाया. उनके छोटे भाई देवदास ने "हिंदुस्तान टाइम्स" में हरिलाल के निधन के बाद लिखा, "गांधीजी की हत्या के चार दिन बाद वो मेरे घर आ पहुंचे ताकि हमारे साथ शोक की घड़ी में शामिल हो सकें. वो बीमार थे, उस समय उन्हें अपने उपचार पर ध्यान देना चाहिए था. उनका चेहरे दुख से गमगीन था. काफी हद तक वो बापू सरीखे लग रहे थे. उस दिन उनकी आवाज में जो उदासी थी, वो पहले कभी नहीं महसूस हुई थी."

गांधी के भजन गाते थे
कृष्ण गोपाल के लेख के अनुसार, हरिलाल ने अच्छी आवाज पाई थी, उन्हें वो सारे भजन याद थे, जो गांधीजी के आश्रम में गाए जाते थे. बाद में जब हरिलाल ने अपने बच्चों को पालना शुरू किया तो अक्सर उन्हें ये भजन सुनाते थे. हरिलाल की नातिन नीलम पारिख ने उन पर एक किताब लिखी, "गांधीजी लास्ट ज्वैल:हरिलाल". जिसमें उन्होंने लिखा, "वो ऐसे गांधी थे जो अपने पिता के असल बेटे बन सकते थे लेकिन गांधीजी के विरोधी उन्हें हमेशा भटकाते रहे, वो उनके हाथों में खेलते रहे."

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लोग उन्हें छोटा गांधी कहने लगे थे
हरिलाल की कहानी वाकई बहुत अजीब है. महात्मा गांधी एक समय उन पर गर्व करते थे. उन्हें लगता था कि उनका ये बेटा जिस तरह उनका साथ दे रहा है, वो लोगों में मिसाल बनेगा. दक्षिण अफ्रीका में हरिलाल पिता के साथ "सत्याग्रह" के दौरान साये की तरह साथ रहते थे. 1908 से 1911 के बीच वो कम से कम छह बार जेल गए.

पत्नी कस्तूरबा के साथ गांधीजी के चारों बेटे


म्युनिसिपिलिटी हास्पिटल में गुमनामी की मौत मरे
ये हमेशा माना जाता रहा कि गांधीजी के चार बेटों में वो सबसे ज्यादा साहसी और इंटैलिजेंट थे. फिर भी उनका ये हश्र. महात्मा गांधी के निधन के एक साल बाद वो मुंबई के एक अस्पताल में गुमनामी की मौत मर गए. उन्हें कहीं रास्ते में पड़ा देखकर मुंबई के म्युनिसिपेलिटी अस्पताल में पहुंचाया गया था. वहां वो चार दिनों तक जीवन-मौत के बीच जूझते रहे.

हरिलाल ने वहां किसी को नहीं बताया कि वो क्या हैं. मरने के बाद पता लगा कि वो दरअसल महात्मा गांधी के बड़े बेटे थे. उन्हें टीबी हो गया था. ज्यादा शराब पीने और अराजक जीवन से लिवर खराब हो चुका था और सिफलिस बीमारी भी थी.

पिता से उस दिन टूट गया हमेशा के लिए संबंध
गांधीजी से हरिलाल की तकरार 1911 में तब हुई जब उन्होंने पिता से कहा कि उन्हें इंग्लैंड बैरिस्टरी की पढ़ाई करने के लिए भेज दिया जाए. गांधीजी ने साफ मना कर दिया. उनके अपने तर्क थे,"ये पाश्चात्य शिक्षा भारतीय संस्कृति और सरोकारों के खिलाफ है", "ये पाश्चात्य शिक्षा हमारे जीवन में कोई काम नहीं आती", "ब्रिटेन ने हमारे देश को गुलाम बनाया हुआ है, वहां जाकर शिक्षा ग्रहण करना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं". इसके बाद पिता और पुत्र में जबरदस्त तकरार हुई. हरिलाल ने बिस्तर बोरिया समेटा, पत्नी गुलाब के साथ भारत लौट आए.

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उन्होंने बापू से संबंध जो तोड़े तो कभी नहीं जोड़े- गांधीजी के लाख चाहने के बाद भी वो ना केवल उनसे दूर रहे बल्कि वो सारे काम किये, जिससे गांधीजी को दुख पहुंचे. हालांकि संबंध टूटने के बाद भी दोनों एक दूसरे के संपर्क में रहते थे-पत्रों और परिचितों के जरिए. गांधीजी अक्सर खुद को दोष देते और कहते मैं पिता के रूप में फेल हो गया हूं.

तब हुआ था हरिलाल का जन्म
हरिलाल का जन्म तब हुआ जब गांधीजी बैरिस्टर की पढ़ाई करने के लिए इंग्लैंड जा रहे थे. हरिलाल गोदी में थे. गांधीजी अपनी पत्नी और बेटे को अपनी मां, भाई और उनकी बीबियों के हवाले छोड़ गए थे. तीन साल वो इसी तरह रहे.

पत्नी गुलाब के निधन के बाद हरिलाल अपनी बाल विधवा साली से शादी करना चाहते थे लेकिन जब ऐसा नहीं कर पाए तो एकदम ही बिखर गए और उन्होंने खुद को शराब में डूबो लिया


साली से करना चाहते थे शादी 
हरिलाल की पांच संतानें थीं. बाद में उन्होंने बच्चों से भी मुंह मोड़ लिया. बच्चों को बापू और कस्तूरबा ने पाला. जब उनकी पत्नी गुलाब का निधन हुआ, तो बहुत दिनों तक दुखी रहे. फिर उनकी इच्छा थी कि उनका विवाह बाल विधवा साली कुमी अदालाजा से हो जाए.

हरिलाल ने इसके लिए बहुत कोशिश की थी. लेकिन रजामंदी ना कस्तूरबा से मिली और ना ही परिवार के अन्य लोगों से. ये हरिलाल की जिंदगी के पटरी से उतरने का दूसरा टर्निंग प्वाइंट था. इसके बाद उन्होंने खुद को शराब में डूबो लिया. वो जगह-जगह नौकरियां करते. पहले ही अग्रिम वेतन लेकर गायब हो जाते.

वो धर्म बदलकर मुस्लिम बन गए
वो कहीं नहीं टिकते थे.  1935 में गांधीजी ने उन्हें पत्र लिखकर शराबी और व्याभिचारी होने का आरोप लगाया. 1936 में तब पूरे देश में लगभग भूचाल सा आ गया जब ये पता लगा कि हरिलाल धर्म बदलकर मुस्लिम बन गए हैं. अब उनका नया नाम अब्दुल्ला गांधी है. मां कस्तूरबा के अनुरोध पर वो दोबारा आर्यसमाजी तरीके से हिंदू बन गये. उन्हें नया नाम मिला हीरालाल.

माना जाता है कि कस्तूरबा का सारा ध्यान हमेशा अपने इस बड़े बेटे की ओर ही लगा होता था लेकिन वो उनकी वजह से जिंदगीभर दुखी ही रहीं


जब उनकी मां 1944 में आगा खान पैलेस में बीमार थीं. माना जा रहा था कि ये उनका आखिरी समय है. तब हरिलाल जब अकस्मात वहां आ गए तो मां कस्तूरबा की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. बापू भी खुश हुए. लेकिन हरिलाल एक-दो दिन बाद वहां शराब पीकर पहुंचे तो मां बिखर गईं.

कहा जा सकता है कि गांधीजी ने अपने जीवन मुख्यतौर पर दो मोर्चे पर लड़ाई लड़ी. पहला मोर्चा - अंग्रेज सरकार के खिलाफ, जिसमें उनकी जीत हुई और दूसरा मोर्चा- अपने बड़े बेटे हरिलाल को सुधारने की लड़ाई, जिसमें वो बुरी तरह नाकाम रहे.

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