फ्रेंच गुयाना से ही क्यों हुई जीसैट-11 की लॉन्चिंग?

फ्रेंच गुयाना एक भूमध्यरेखा के पास स्थित देश है, जिससे रॉकेट को आसानी से पृथ्वी की कक्षा में ले जाने में और मदद मिलती है.

News18Hindi
Updated: December 5, 2018, 12:23 PM IST
फ्रेंच गुयाना से ही क्यों हुई जीसैट-11 की लॉन्चिंग?
भारतीय उपग्रह जीसैट-11
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Updated: December 5, 2018, 12:23 PM IST
भारत में इंटरनेट की स्पीड बढ़ाने के लिए भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र (इसरो) ने अब तक के सबसे भारी उपग्रह जीसैट-11 को अंतरिक्ष में भेज दिया गया है. दक्षिणी अमेरिका के फ्रेंच गुयाना स्पेस सेंटर से फ्रांस के एरियन-5 रॉकेट की मदद से इसे लॉन्च किया गया. अगर यह 5,845 किग्रा वजनी उपग्रह सही सलामत पृथ्वी की कक्षा में स्थापित हो जाता है तो यह देश के टेलिकॉम सेक्टर खासकर ग्रामीण भारत के लिए बहुत बड़ा वरदान साबित होगा.

इसरो कई बार विदेशी सैटेलाइट्स को लॉन्च कर चुका है. हम इस पर गर्व भी करते रहे हैं कि इसरो विदेशी सैटेलाइट्स को लॉन्च कर पैसे कमा रहा है और आत्मनिर्भर बन रहा है. लेकिन कई बार ISRO खुद अपने सैटेलाइट्स के लॉन्च के लिए यूरोपियन स्पेस एजेंसी के जरिए फ्रेंच गुयाना के कोऊरू से भेजता है.

हमारा आज भी भेजा गया GSAT-11 इसका सबसे हालिया उदाहरण है. यह ISRO का बनाया अब तक का सबसे भारी उपग्रह था. ऐसे में हम कह सकते हैं कि विदेशी उपग्रहों को ले जाने से हमें जो पैसे मिलते हैं हम फिर से वो विदेशियों को दे रहे हैं. लेकिन यह जानने वाली बात है कि भारत आखिर ऐसा करता क्यों है? अगर भारत अब अपने सारे उपग्रह भेजने में सक्षम है तो फिर वो ऐसा क्यों करता है?

इसके पीछे बताई जाती हैं कई वजहें

दक्षिण अमेरिका स्थित फ्रेंच गुयाना के पास लंबी समुद्री रेखा है, जो इसे रॉकेट लॉन्चिंग के लिए और भी मुफीद जगह बनाती है. इसके अलावा फ्रेंच गुयाना एक भूमध्यरेखा के पास स्थित देश है, जिससे रॉकेट को आसानी से पृथ्वी की कक्षा में ले जाने में और मदद मिलती है. जियोस्टेशनरी कक्षा की ऊंचाई भूमध्य रेखा से करीब 36,000 किलोमीटर होती है.

वैसे एक बात यह भी है  कि ज्यादातर रॉकेट पूर्व की ओर से छोड़े जाते हैं ताकि उन्हें पृथ्वी की कक्षा में स्थापित करने के लिए पृथ्वी की गति से भी थोड़ी मदद मिल सके. दरअसल पृथ्वी पश्चिम से पूर्व की ओर घूमती है.

वैश्विक स्तर की सुविधाओं से युक्त होने, राकेट के लिए ईंधन आदि की पर्याप्तता आदि ऐसी वजहें हैं जिनके चलते भी ISRO अपने बेहद महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट्स के लॉन्च के लिए फ्रेंच गुयाना को एक मुफीद लॉन्च साइट मानता रहा है.
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मगर इसे माना जा सकता है सबसे मुफीद वजह
भारत के PSLV, GSLV- Mk2 और GSLV- Mk3 रॉकेट 4 टन का पेलोड ले जाने में सक्षम हैं. ऐसे तो PSLV ही सैकड़ों सैटेलाइट ले जाने में सक्षम है लेकिन ये नैनो, माइक्रो सैटेलाइट होते हैं. हालांकि भारत को 4 टन से ज्यादा वजनी रॉकेट भेजने की जरूरत बहुत कम ही पड़ती है.

हालांकि अच्छी ख़बर यह है कि इसरो एक ऐसे रॉकेट के निर्माण में जुटा हुआ है जो उसकी सारी जरूरतें पूरी कर सके.

फ्रेंच गुयाना का इतिहास भी रहा है रोचक
फ्रेंच गुयाना, फ्रांस की कॉलोनी है. फ्रांस ने इस पर कब्जे का पहला प्रयास 1963 में किया था, जो असफल रहा था. बाद में फ्रांस ने इसे बंदियों के लिए कालापानी के तौर पर प्रयोग करना शुरू कर दिया. 19वीं शताब्दी के मध्य तक फ्रांस ने यहां करीब 56,000 लोगों को भेजा, जिनमें से मात्र 10 फीसदी ही अपनी सजा पूरी करके लौट सके थे.

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