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जब इंदिरा गांधी ने भी कांग्रेस टूटने के बाद दो बार गंवाए थे चुनाव चिन्ह

जब इंदिरा गांधी ने भी कांग्रेस टूटने के बाद दो बार गंवाए थे चुनाव चिन्ह

इंदिरा गाधी के समय में कांग्रेस में दो बार बड़ी टूट हुई. हालात ऐसे पैदा हुए कि उन्हें दो बार पार्टी का चुनाव चिन्ह गंवाना पड़ा.

इंदिरा गाधी के समय में कांग्रेस में दो बार बड़ी टूट हुई. हालात ऐसे पैदा हुए कि उन्हें दो बार पार्टी का चुनाव चिन्ह गंवाना पड़ा.

लोक जनशक्ति पार्टी (Lok Janshakti Party) में पार्टी पर नियंत्रण और चुनाव चिन्ह को लेकर जो विवाद खड़ा हुआ था. उसमें चिराग पासवान (Chirag Paswan) और उनके चाचा पारस पासवान (Paras Paswan) किसी को ना तो पार्टी मिली और चुनाव चिन्ह. भारत की ताकतवर प्रधानमंत्री रहीं इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) के साथ भी दो बार हुआ जब उन्हें पार्टी का चुनाव चिन्ह गंवाना पड़ा था.

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    राम विलास पासवान के निधन के बाद लोक जनशक्ति पार्टी को लेकर चाचा पारस पासवान और भतीजे चिराग पासवान के बीच पार्टी पर नियंत्रण और चुनाव चिन्ह पर दावे को लेकर चल रहे विवाद का अंत हो गया. राष्ट्रीय चुनाव आयोग ने पार्टी और चुनाव चिन्ह दोनों को फ्रीज कर दिया. नतीजतन दोनों को नई पार्टी बनानी पड़ी और नए चुनाव चिन्ह लेने पड़े. भारत की सबसे ताकतवर प्रधानमंत्री रहीं इंदिरा गांधी को कांग्रेस में टूटफूट के बाद दो बार ऐसे हालात का सामना करना पड़ा था जब पार्टी का चुनाव चिन्ह उन्होंने गंवाया. वैसे भारतीय राजनीति में पार्टियों के टूटने के बाद इस तरह के विवाद कई बार होते रहे हैं.

    आजादी से पहले और उसके बाद कांग्रेस में कई बार बदलाव हुए. तब का समय अलग था. कांग्रेस उन दिनों चुनाव में नहीं उतरती थी. लेकिन जब कांग्रेस को सियासी राजनीति में चुनाव चिन्ह लेने की जरूरत पड़ी तब कांग्रेस की कमान जवाहरलाल नेहरू के हाथ में थी.

    नेहरू ने कांग्रेस पार्टी के चुनाव चिन्ह के तौर पर बैलों की जोड़ी को चुना. ऐसा इसलिए किया, क्योंकि उन्हें लगता था कि देश कृषिप्रधान देश है. यहां ज्यादातर लोग किसान हैं. बैलों की जोड़ी चुनाव चिन्ह आम जनता के ज्यादा करीब रहेगा.

    congress foundation day how party symbol changed from Pair of bullocks cow and calf to hand in indira gandhi time

    नेहरू ने बैलों की जोड़ी को कांग्रेस का चुनाव चिन्ह चुना था

    1952, 1957 और फिर 1962 में लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने इसी चुनाव चिन्ह के साथ चुनाव जीता. केंद्र में अपनी मजबूत सरकार बनाई. शास्त्री के समय में भी ऐसा ही था.

    शास्त्री के निधन के बाद जब इंदिरा गांधी ने कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार की बागडोर संभाली तो हालात बदलने लगे थे. इंदिरा का टकराव पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के साथ चरम पर पहुंच रहा था.

    तब आजादी के बाद पहली बार टूटी कांग्रेस 
    इंदिरा गांधी के नेतृत्व को लेकर कांग्रेस पार्टी के भीतर असंतोष पैदा हो गया. इंदिरा पार्टी के सीनियर नेताओं के सिंडीकेट से टकराव में इतने आगे तक चली गईं कि पार्टी ही तोड़ दी. उन्होंने बहुत से कांग्रेसियों को साथ लेकर कांग्रेस (आर) के नाम से नई पार्टी बना ली. सीनियर कांग्रेसियों का दूसरा धड़ा कांग्रेस (ओ) बन गया.

    जब इंदिरा को नहीं मिला कांग्रेस का चुनाव चिन्ह
    नई पार्टी बनाने के बाद इंदिरा गांधी ने कोशिश की कि उन्हें किसी तरह से बैलों की जोड़ी का चुनाव चिन्ह मिल जाए. उस चुनाव चिन्ह पर कांग्रेस (ओ) ने दावा जताया. कांग्रेस (ओ) के सदस्यों में ज्यादातर स्वतंत्रता सेनानी रह चुके थे. साथ ही लंबे समय से वो पार्टी के सदस्य थे. उनका कहना था कि कांग्रेस की असली विरासत संभालने वाले वहीं हैं, इसलिए बैलों की जोड़ी वाला चुनाव चिन्ह उनकी पार्टी को दिया जाए.

    तब इंदिरा को मिला नया चुनाव चिन्ह
    इंदिरा गांधी की पार्टी कांग्रेस को बैलों की जोड़ी का चुनाव चिन्ह नहीं मिला. काफी सोच विचार के बाद उन्होंने गाय और बछड़े को अपनी पार्टी का चुनाव चिन्ह बनाया. इंदिरा ने अपनी पार्टी के नए चुनाव चिन्ह गाय और बछड़े का जोरशोर से प्रचार किया. उन्होंने खुद को एक ब्रांड के तौर पर स्थापित किया.

    1971 के चुनाव में उन्होंने “गरीबी हटाओ”  का नारा दिया. जिसका काफी असर पड़ा. गाय और बछड़े के चुनाव चिन्ह के साथ इंदिरा की तस्वीर वाले पोस्टर हर घर में पहचाने जाने लगे. 71 के चुनाव में इंदिरा गांधी की नई पार्टी ने जबरदस्त कामयाबी हासिल की.

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    1969 में कांग्रेस में फूट के बाद बदला कांग्रेस का चुनाव चिन्ह

    जब फिर कांग्रेस में हालात बदलने लगे
    1975 के आते-आते स्थितियां फिर बदल गईं. इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लागू कर दिया. इसका देशभर में जबरदस्त विरोध हुआ. कांग्रेस पार्टी फिर टूटी. इसके बाद 1977 में हुए चुनाव में कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा.

    आपातकाल के बाद कांग्रेस फिर टूटी 
    चुनाव से पहले ही कांग्रेस के कई सीनियर लीडर्स इंदिरा गांधी का साथ छोड़ चुके थे. चुनावों में हार के बाद जो कांग्रेसी उनके साथ भी थे, अब वो हार के लिए उन्हें जिम्मेदार ठहराने लगे. कांग्रेस दो धड़ों में बंट गई. एक इंदिरा गांधी के साथ था और दूसरा उनके खिलाफ.

    पार्टी के भीतर के विरोध को कुचलने के लिए इंदिरा गांधी ने फिर नई पार्टी बना ली. इसे कांग्रेस (आई) यानी इंदिरा कांग्रेस का नाम मिला.

    तब क्यों इंदिरा ने दूसरी बार गंवाया चुनाव चिन्ह
    77 के चुनाव और उसके बाद कांग्रेस पार्टी के चुनाव चिन्ह गाय और बछड़े का विरोधियों ने खूब मजाक बनाया था. विरोधियों ने प्रचारित करना शुरू कर दिया था कि गाय मतलब इंदिरा गांधी और बछड़ा मतलब संजय गांधी. इंदिरा गांधी ने पुराने चुनाव चिन्ह को छोड़ने का फैसला लिया.

    इंदिरा अपनी नई पार्टी को नए चुनाव चिन्ह के साथ फिर से स्थापित करने में जुट गईं. चुनाव आयोग ने उन्हें तुरंत अपनी पार्टी का चुनाव चिन्ह चुनने को कहा.

    जब बूटा सिंह बोले ‘हाथ’ और इंदिरा गांधी ने सुना ‘हाथी’
    कांग्रेस पार्टी के हाथ चुनाव चिन्ह बनाए जाने को लेकर एक दिलचस्प किस्सा सुनाया जाता है. उस वक्त इंदिरा गांधी, पीवी निरसिम्हा राव के साथ आंध्र प्रदेश के दौरे पर थीं. उनकी गैरमौजूदगी में बूटा सिंह को चुनाव आयोग भेजा गया. चुनाव आयोग ने उन्हें तीन चुनाव चिन्ह- हाथी, साइकिल और हाथ में किसी एक को चुनने को कहा.

    बूटा सिंह चुनाव चिन्ह को लेकर कंफ्यूज थे. उन्होंने इंदिरा गांधी से फोन पर बात कर चुनाव चिन्ह सेलेक्ट करने का फैसला लिया. चुनाव आयोग ने बूटा सिंह को कहा कि अगले दिन तक वो अपना निर्णय बता दें नहीं तो पार्टी को बिना किसी चुनाव चिन्ह के चुनाव में उतरना पड़ेगा.

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    71 के चुनाव में इंदिरा गांधी ने गाय और बछड़ा के चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़ा था

    इस तरह कांग्रेस को मिला वो चिन्ह जो आज भी बरकरार 
    दूसरे दिन सुबह बूटा सिंह ने इंदिरा गांधी को फोन मिलाया. बूटा सिंह ने कहा- ‘मेरे विचार से हाथ चुनाव चिन्ह ठीक रहेगा?’ बूटा सिंह की आवाज मोटी थी. इंदिरा गांधी ने ‘हाथ’ के बजाए ‘हाथी’ सुना. इस पर इंदिरा गांधी बोलीं- नहीं…नहीं…हाथ ठीक रहेगा. दूसरी तरफ से बूटा सिंह फिर बोले- ‘हां, वही तो कह रहा हूं, हाथ ठीक रहेगा.’ लेकिन इंदिरा को बूटा सिंह की आवाज में ‘हाथ’ फिर ‘हाथी’ सुनाई पड़ा.

    इसके बाद इंदिरा गांधी ने फोन पीवी नरसिम्हाराव को सौंप दिया. नरसिम्हाराव 15 भारतीय भाषाएं जानते थे. जब उन्होंने बूटा सिंह से बात की तो समझ गए कि दरअसल वो भी हाथ चुनाव चिन्ह को ही चुनने की बात कर रहे थे. नरसिम्हा राव, बूटा सिंह से बोले- ‘आपका मतलब ‘पंजा’ है ना?’ बूटा सिंह के हां कहने पर वो पूरा मांजरा समझ पाए. इसके बाद कांग्रेस पार्टी को हाथ का चुनाव चिन्ह हासिल हुआ.

    Tags: All India Congress Committee, Central Election Commission, Chirag Paswan, Indira Gandhi, LJP

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