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जब गुलाब की क्‍यारियां उजाड़कर नेहरू ने तीन मूर्ति भवन में लगवाई गेहूं की फसल

News18Hindi
Updated: November 12, 2019, 4:39 PM IST
जब गुलाब की क्‍यारियां उजाड़कर नेहरू ने तीन मूर्ति भवन में लगवाई गेहूं की फसल
खाद्यान्न उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए नेहरू ने तीनमूर्ति भवन में गुलाब की क्यारियां हटाकर फसलों की खेती करवाने लगे थे

पंडित जवाहरलाल नेहरू की 130वीं जयंती के अवसर पर हम नेहरू जी से जुड़ी विशेष शृंखला चला रहे हैं. इसमें पेश है पीयूष बबेले की किताब नेहरू मिथक और सत्‍य के अंश

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  • Last Updated: November 12, 2019, 4:39 PM IST
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देश आजाद (independence) होने के बाद नई सरकार (government) के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी खाद्यान्‍न (food grains) उपज बढ़ाना. इस सिलसिले में नेहरू (Jawaharlal Nehru) लगातार काम कर रहे थे. दिलचस्‍प बात यह है कि वे सरकारी बंगलों तथा दिल्‍ली के पार्कों में भी अन्‍न उपजाने में जुट गए थे. इस सिलसिले में उन्‍होंने प्रधानमंत्री आवास तक का बगीचा उजड़वा दिया और वहां खेती कराई. पढ़िए पुस्‍तक के अंश:

20 जुलाई 1949 को नेहरू ने अपने प्रिंसिपल प्राइवेट सेक्रेटरी को लिखा, ‘‘अधिक अन्न उपजाओ अभियान को देखते हुए यह जरूरी है कि दिल्ली में इस काम लायक जितनी जमीन मौजूद है, उसका पूरा इस्तेमाल हो. ऐसे बहुत से बड़े कंपाउंड हैं, जहां पर फसलें उगाई सकती हैं. इसलिए क्या आप एस्टेट विभाग से इस बारे में तुरंत कदम उठाने के लिए कहेंगे. इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि हम दिल्ली में एक भी फूल ना उगाएं या दिल्ली में मैदानों और लॉन की संख्या कम है. असली बात यह है कि किसी न किसी तरह का खाद्यान्न उगाया जाए. जाहिर है कि यह बातें काफी हद तक मौजूदा हालात और संसाधनों पर निर्भर करेंगी. गवर्नर जनरल ने पहले ही गवर्नमेंट हाउस के बारे में इस तरह का उदाहरण पेश किया है. सभी मंत्रियों और सरकार के अधिकारियों को भी यही उदाहरण पेश करना चाहिए.’’

जैसे एक जमाने में गांधी ने हर आदमी को खादी और चरखे का मंत्र देकर अपना कपड़ा खुद पैदा करने की राह पर चलाया था, उसी तरह नेहरू ने अपना खाना खुद पैदा करो का मंत्र दिया. हाल यहां तक पहुंचा कि तीन मूर्ति भवन के फूलों के बगीचों को ट्रैक्टर से जुतवा दिया गया. वहां फूलों की जगह अनाज की खेती होने लगी. जब डॉ राजेंद्र प्रसाद यही काम करना चाह रहे थे और राज्य संपदा विभाग ने कहा कि ऐसा संभव नहीं है, तो नेहरू ने अफसरों को फटकार लगाई और प्रसाद से कहा कि ट्रैक्टर से बंगला जुतवा लें.

नेहरू ने संपदा विभाग से कहा, ‘‘मुझे डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने बताया है कि वह अपने मकान से लगी जमीन का एक हिस्सा इस उद्देश्य के लिए इस्तेमाल करना चाहते हैं, लेकिन एस्टेट विभाग ने आपत्ति की है और कहा है कि यह नहीं होना चाहिए. मेरी समझ में यह बात नहीं आती. यह सरकार की नीति है की जमीन का एक-एक टुकड़ा, खाना पैदा करने के लिए इस्तेमाल हो. एस्टेट विभाग की जिम्मेदारी है कि वह इस काम के लिए दिल्ली में उपलब्ध सरकारी जमीन का इस्तेमाल करे. इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह जमीन मकानों से जुड़ी है, दूसरे किस्म की है. अगर जरूरत पड़े तो वहां ट्रैक्टर से जुताई की जा सकती है, बल्कि कृषि मंत्री को हल्के फर्गुसन ट्रैक्टर मिल गए हैं, जो इस काम के लिए इस्तेमाल किए जा सकते हैं. वह खुशी-खुशी आपको वह दे देंगे. मैं अपने बगीचे का एक हिस्सा भी इसी तरह ट्रैक्टरों से जुतवाने वाला हूं.’’

when jawaharlal nehru planted wheat crop in teen murti bhawan by destroying rose beds
तीनमूर्ति भवन


तीन मूर्ति भवन में जुताई हो गई, राष्ट्रपति भवन में खेती शुरू हो गई, देश में ट्रैक्टरों का निर्माण शुरू हो गया, दुनिया के शीर्ष भोजन प्रबंधन विशेषज्ञों की सलाह ली गई, यह सब हुआ, लेकिन 1951 के अंत तक वह स्थिति नहीं आई कि विदेश से खाद्यान्न का आयात बंद किया जा सके. नेहरू को गहरा धक्का लगा, लेकिन वह निराश नहीं हुए.

19 फरवरी 1952 को नई दिल्ली में हुए राज्यों के खाद्य मंत्रियों के सम्मेलन में नेहरू ने कहा, ‘‘हम खाने के सवाल को लापरवाही से नहीं ले सकते, क्योंकि इसका मतलब होगा कि जनता को भूख से मर जाने दें. आपको याद होगा कि कोई तीन साल पहले हमने कहा था कि 1952 की शुरुआत में हम खुद को खाने के मामले में आत्मनिर्भर बना लेंगे. हम ऐसा नहीं कर सके, लेकिन योजना आयोग ने खाने के मामले में आत्मनिर्भर होने का मुद्दा नहीं छोड़ा है. आयोग का मानना है कि भोजन के मामले में इतनी जल्दी आत्मनिर्भर होना संभव नहीं है, लेकिन आत्मनिर्भर होने के मामले में तारीख तय करना जरूरी है. मैं अकेले इसे तय नहीं कर सकता. हम लोग साथ बैठकर इसे तय करेंगे. लेकिन अंततः यह योजना आयोग होगा जो ज्यादा व्यावहारिक तारीख तय करेगा.’’
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इतना बड़ा लक्ष्य हाथ से फिसलने के बाद सरकारों की सामान्य प्रवृत्ति यह होती है कि वे नए कार्यक्रम की चर्चा करती है और पुराने का जिक्र तक नहीं करतीं. लेकिन नेहरू ने ऐसा नहीं किया.

उन्होंने कहा, ‘‘मैं स्वीकार करता हूं कि मुझे इस बात से गहरा धक्का लगा कि हम तय तारीख पर खाने के मामले में आत्मनिर्भर नहीं बन सके. न सिर्फ सरकार बल्कि मैं खुद भी बराबर तारीख पर जोर देता रहा और अब इस वादे पर खरा न उतरने के बाद, मुझे लगता है कि मैंने लोगों को दिया वचन भंग कर दिया.’’

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जवाहरलाल नेहरू


इसके बाद नेहरू वजहें गिनाते हैं, ‘‘हालांकि हम सबको पता है कि जब वह तारीख तय की गई थी, उसके बाद से हर तरह के संकट आए, प्राकृतिक आपदाएं आईं और सूखे पड़े. इन सब के कारण उस लक्ष्य को हासिल करना असंभव हो गया.’’

15 अगस्त 1952 को उन्होंने लाल किले से कहा:

‘‘इस जमाने में हमारे मुल्क में मुसीबतें गुजरीं, प्रकृति ने भी मुसीबतें भेजीं. इन बरसों में बारिश नहीं हुई, जलजले आए, भूकंप आए. क्या-क्या हुआ आप जानते हैं. खैर, कुछ पलटा हमने खाया. इन बातों पर हमने काबू किया और दूसरे सालों के मुकाबले में हमारा हाल जरा अच्छा हुआ. बारिश भी अच्छी हुई. कुछ इस वक्त मुल्क में खाने का सवाल भी अच्छा है, कपड़े का भी अच्छा है. अच्छा तो है, लेकिन फिर भी आप याद रखें कि यह बड़ा मुल्क है और इस बड़े मुल्क में कोई न कोई हिस्सा ऐसा रहता है, जहां कोई न कोई मुसीबत आती रहती है. आजकल ज्यादातर मुल्क में पानी बरसा, ज्यादातर खेती अच्छी हो रही है, खाने के सामान की पैदावार अच्छी है. लेकिन बाज जिले उत्तर प्रदेश के गोरखपुर, आजमगढ़, देवरिया और बस्ती के, कुछ उधर के जिले हैं बिहार के, कुछ बंगाल में हैं, सुंदरबन का इलाका, मद्रास की तरफ रायलसीमा है, मैसूर के कुछ जिले हैं, कुछ राजस्थान में, कुछ सौराष्ट में, जहां काफी मुश्किल है, काफी फाकेमस्ती है, काफी गरीबी है, काफी खाने की कमी है."

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First published: November 12, 2019, 4:39 PM IST
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