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जब मिर्ज़ा ग़ालिब ने अंग्रेज़ों के मुंह पर किया था बंटवारे की चाल का विरोध

यादगार शायर मिर्ज़ा ग़ालिब की प्रतीकात्मक तस्वीर.

यादगार शायर मिर्ज़ा ग़ालिब की प्रतीकात्मक तस्वीर.

Mirza Ghalib Death Anniversary : 15 फरवरी 1869 को ऐतिहासिक शायर मिर्ज़ा असदुल्लाह खां ग़ालिब दुनिया से विदा हुए थे. जानिए ग़ालिब कैसे समझ गए थे कि हिंदी और उर्दू (Hindi-Urdu Politics) का बंटवारा बेहद खतरनाक होने वाला था.

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हिंदी और उर्दू के बीच खड़ी की गई दीवार की बुनियाद क्या इतनी पक्की थी कि आज तक यह दीवार तोड़ी नहीं जा सकी? अस्ल में, नफ़रत की जड़ ज़्यादा मज़बूत हो ही जाती है और रहीम के शब्दों में कहा जाए तो ‘टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गांठ पड़ जाए’ वाली बात होती है. अंग्रेज़ों ने हिंदी और के बीच जो खाई पैदा की, वो वक़्त के साथ गहराती चली गई. हालांकि हर वक़्त में सच्चे कलाकारों ने इस बंटवारे को समझा भी और इसके खिलाफ़ आवाज़ भी उठाई. ऐसा ही एक किस्सा हिंदोस्तान के मशहूर शायर मिर्ज़ा ग़ालिब के नाम से भी जुड़ा है.

तक़रीबन हर दौर में शायरों, भाषा विशेषज्ञों और कलाकारों ने इस झगड़े को बेजा बताया या फिर इसका मज़ाक़ उड़ाया. करीब 100 साल पहले अकबर इलाहाबादी ने अपने अंदाज़ में इस विषय में कटाक्ष इस तरह किया था :

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“हम उर्दू को अरबी क्यों न करें हिंदी को वो भाषा क्यूं न करें
झगड़े के लिए अखबारों में मज़मून तराशा क्यूं न करें
आपस में अदावत कुछ भी नहीं लेकिन इक अखाड़ा कायम है
जब इससे फलक का दिल बहले हम लोग तमाशा क्यूं न करें?”

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मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी

साहित्य या शैक्षणिक संस्थाओं में तो बाद में भाषा की पॉलिटिक्स शुरू हुई, पहले तो इस सियासत के ज़रिये लोगों के बीच खाई पैदा की गई. ईस्ट इंडिया कंपनी के अफसरों को बाक़ायदा औपनिवेशिक ट्रेनिंग दी जाती थी. हिंदी के विद्वान आलोक राय की मानें तो फोर्ट विलियम कॉलेज की रूढ़िवादी ट्रेनिंग से भाषा के बंटवारे के रास्ते खुले.

मुहब्बत की कोशिशें भी होती रहीं
भाषा के इस विभाजन को कुछ दूरदर्शी कलाकार हमेशा समझ रहे थे और भरपूर कोशिशें होती रहीं कि हिंदी और उर्दू के बीच घुल रहे ज़हर का तोड़ निकाला जाए. गंगा जमुनी तहज़ीब और साझा संस्कृति जैसे शब्द करीब दो सदियों से चलन में रहे और 1920 के दशक में तो बाकायदा एक संगठन ने धर्म के आधार पर माने जाने वाले भाषा के बंटवारे को खत्म करने और दोनों भाषाओं की तरक्की के लिए आवाज़ उठाना शुरू किया.

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मुंशी प्रेमचंद से लेकर सज्जाद ज़हीर तक तमाम प्रगतिशील लेखकों ने इस विषय पर प्रेम और सामंजस्य की बातें हमेशा कहीं. कालजयी लेखक मंटो ने कभी भाषा की खेमेबाज़ी पर कटाक्ष किए तो अपने समय के मशहूर अभिनेता और लेखक बलराज साहनी ने भी इस विषय पर एक लंबा लेख लिखकर कुछ अहम पहलू उठाए.

जुनूं है चन्द लोगों का ज़ुबां झगड़ा नहीं कोई
ग़ज़ल हिंदी में हो उर्दू में हो कल्चर सुहाना है.

साहित्य में भाषा के खेमे बन रहे हैं और इस झगड़े से आज भी कुछ कलाकार जूझ रहे हैं. ऐसे लेखकों की फ़ेहरिस्त बहुत लंबी रही, जिन्होंने हिंदी और उर्दू के बीच नफ़रत पैदा करने वाली सियासत का सरेआम पर्दाफ़ाश करने और मुहब्बत की वक़ालत करने की भरपूर चेष्टाएं कीं. इसी सिलसिले में ग़ालिब का भी वो विरोध याद आ जाता है, जिसे मशहूर फिल्मकार व लेखक गुलज़ार ने भी दर्ज किया.

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मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी

ये अंग्रेज़ों की चाल है साहेबान!
बंगाल में जड़े मज़बूत करने के बाद कंपनी ने फोर्ट विलियम में मदरसा आलिया खोल दिया था. मिर्ज़ा ग़ालिब वहां पहुंचे थे ताकि बंगाल के तमाम साहित्यकारों और विद्वानों से बातचीत कर सकें. मिर्ज़ा जब वहां पहुंचे तो मौलवी साहब बढ़ चढ़कर कह रहे थे ‘अंग्रेज़ कितने दरियादिल हैं कि फोर्ट विलियम के ओरिएंटल कॉलजे में नया महकमा हिंदी संस्कृत के लिए खोल दिया. यहां के मुसलमानों को उर्दू, फ़ारसी और अरबी की तालीम दी जा रही है और हिंदुओं को हिंदी और संस्कृत की…’

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इतना सुनना था कि ग़ालिब से चुप न रह गया और साफ पूछ बैठे :

हिंदी हिंदुओं की है और उर्दू मुसलमानों की, यह आपसे किसने कह दिया? उर्दू पर हरगोपाल तफ़्ता को उतना ही हक़ है जितना रसखान को हिंदी पर. वारिस और फ़रीद ने पंजाबी तो खुसरो ने फ़ारसी के साथ अवधि में भी रस घोला है.

वहां मौजूद तमाम लोगों के कान खड़े हो गए थे क्योंकि वहां अंग्रेज़ भी मौजूद थे. लेकिन किसी बात की फ़िक्र किए बग़ैर ग़ालिब की हक़बयानी जारी थी. सिराजुद्दीन ने दबी आवाज़ में मिर्ज़ा को अंग्रेज़ अफ़सरों की मौजूदगी का एहसास दिलाते हुए चुप रहने की हिदायत भी दी कि लेकिन चुप रह जाते तो ग़ालिब कहां होते :

ये बंटवारा है. ज़बान और मज़हब के नाम पर लोगों को बांटा जा रहा है… ये अंग्रेज़ों की चाल है साहेबान, ये बंटवारा ज़बान का नहीं है, लोगों को बांटा जा रहा है. कोई भाषा किसी मज़हब की जागीर नहीं है… मैं सब समझ रहा हूं सिराजुद्दीन, ये अंग्रेज़ों का बिछाया हुआ जाल है…

बहरहाल साहब, ग़ालिब की इस सच बयानी को बदतमीज़ी और नाशाइस्ता हरक़त कहकर बात को रफ़ा दफ़ा करने की कवायद हुई और उस वक़्त एक सन्नाटा सा फोर्ट विलियम में रह गया.

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ग़ालिब का प्रचलित चित्र

और फिर सच हुई ग़ालिब की बात!
इतिहास बताता है कि ग़ालिब के पास दूरदर्शिता थी, कोई पल भर का तैश नहीं था. 1947 में जब भारत का विभाजन हुआ और पाकिस्तान बना, तो सबको मोटे तौर पर यही लगता रहा कि बात हिंदू और मुसलमान के बीच नफ़रत की है, लेकिन इस नफ़रत का बीज भाषा के बंटवारे में ही था, जो अंग्रेज़ों ने एक सदी पहले से बोया था.

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विद्वान इस पर सहमत हैं कि भाषा के इस अलगाव का ही एक वक्र रूप था कि 19वीं सदी में पहले स्वाधीनता संग्राम के बाद हिंदी और भारतेंदु हरिश्चंद्र की हिंदू राष्ट्रवादी राजनीति की शुरूआत हुई, जहां से मिली जुली खड़ी बोली के मानक हिंदी भाषा बनने का सफ़र शुरू होता है. बंटवारे के संदर्भ में बाबा-ए-उर्दू कहे जाने वाले अब्दुल हक यह कमेंट याद रखा जाना चाहिए ‘पाकिस्तान जिन्ना या इक़बाल ने नहीं, बल्कि उर्दू ने बनाया’.

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