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सरदार पटेल से उस मुलाकात के बाद कश्मीर के महाराजा का चेहरा फक पड़ गया

आज सरदार पटेल की जयंती है और इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सरदार पटेल की मूर्ति 'स्टेच्यू ऑफ यूनिटी' का अनावरण करेंगे.

आज सरदार पटेल की जयंती है और इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सरदार पटेल की मूर्ति 'स्टेच्यू ऑफ यूनिटी' का अनावरण करेंगे.

आज सरदार पटेल की जयंती है और इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सरदार पटेल की मूर्ति 'स्टेच्यू ऑफ यूनिटी' का अनावरण करेंगे.

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    देश आजाद होने के बाद जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री बने. सरदार वल्लभभाई पटेल पहले गृह मंत्री. तब पार्टी संगठन पर पटेल की पकड़ नेहरू की तुलना में कहीं मजबूत थी. ये हालात अक्सर आते थे जब नेहरू की बहुत सी बातों पर पटेल असहमति जाहिर कर देते थे. ऐसा कई बार हुआ लेकिन जब नेहरू कोई बात बल देकर कहते थे तो पटेल उसे मानते भी थे. ऐसा ही तब हुआ जब नेहरू ने उनसे कहा कि वो कश्मीर के महाराजा से कहें कि वो राज्य को छोड़ दें, क्योंकि उससे संवैधानिक तौर पर दिक्कतें आ रही हैं.

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    अब ये सरदार पटेल की जिम्मेदारी थी कि वो ऐसा कैसे करते हैं. वर्ष 1949 में कश्मीर के संवैधानिक प्रमुख महाराजा हरिसिंह ही थे. कर्ण सिंह उनके वारिस थे. 20 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तानी कबायलियों के हमले के बाद 26 अक्टूबर को कश्मीर के महाराजा हरिसिंह और भारत सरकार के बीच एक समझौता हुआ. इसके तहत महाराजा की स्थिति राज्य के संवैधानिक प्रमुख के रूप में बरकरार रही, लेकिन शेख अब्दुल्ला का आपातकालीन प्रशासक के पद पर नियुक्त कर राज्य में सरकार चलाने की जिम्मेदारी उन्हें दे दी गई. इसके बाद उन्हें 05 मार्च 1948 को राज्य का अंतरिम प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया.



    शेख अब्दुल्ला और महाराजा के बीच टकराव
    राज्य प्रशासन को लेकर शेख अब्दुल्ला और महाराजा के बीच टकराव के हालात अक्सर पैदा होने लगे. शुरुआती दिनों में ये कम थे, लेकिन आने वाले महीनों के साथ ये बढ़ते चले गए. घाटी में ऐसा लग रहा था दो समानांतर सत्ताएं चल रही हैं. अब्दुल्ला बार बार दिल्ली में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से शिकायत करते कि महाराजा उन्हें काम नहीं करने दे रहे हैं.

    युवराज कर्ण सिंह को सदर ए रियासत बनाया गया
    हालात को टालने के लिए पहले नेहरू ने महाराजा पर दवाब डाला कि उन्हें राज्य की सक्रियता से खुद को अलग कर देना चाहिए. इसी क्रम में केंद्र के इशारे पर महाराजा के 19 साल के बेटे कर्ण सिंह को सदर ए रियासत और गर्वनर बनाकर उन्हें संवैधानिक प्रमुख की स्थिति पर बहाल किया गया. माना गया कि हालात इससे सुधर पाएंगे लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ.

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    इसी परिप्रेक्ष्य में नेहरू को लगा कि अगर कुछ महीनों के लिए महाराजा और उनके वारिस को राज्य से बाहर जाने को कहा जाए तो राज्य में हालात पटरी पर आ जाएंगे. साथ ही राज्य की राजनीति में महाराजा का प्रभाव भी कम हो जाएगा. ये काम उन्होंने सरदार पटेल को सौंपा कि वो महाराजा को कुछ महीनों के लिए राज्य से बाहर जाने को कहें.

    सरदार पटेल (फाइल फोटो)


    पटेल ने महाराजा से कैसे कहा
    राजमोहन गांधी की किताब पटेल ए लाइफ में कर्ण सिंह के हवाले से कहा गया, नेहरू ने ये सरदार पटेल पर छोड़ दिया था कि वो मेरे पिता को कैसे कश्मीर से हटाते हैं. 29 अप्रैल 1949 को हमने सरदार पटेल के घर पर साथ में भोजन किया. फिर डिनर के बाद सरदार मेरे पेरेंट्स को लेकर अलग कमरे में चले गए. जब वो लौटे तो चेहरा फीका पड़ा हुआ था और मां अपने आंसू रोकने की कोशिश कर रही थीं.

    सरदार पटेल ने दृढता से ये कहा
    कर्ण सिंह का कहना था, सरदार पटेल ने पिता ने विनम्रता लेकिन दृढ़ता से कहा कि उन्हें कुछ महीनों के लिए कश्मीर से बाहर चले जाना चाहिए. पटेल की बात सुनकर पिता अवाक रह गए, लेकिन पटेल का चेहरा सख्त था. उन्होंने ये भी कहा कि ये राष्ट्रहित में होगा. जब सरदार पटेल हमें बाहर गेट तक छोड़ने आए तो उनके चेहरे भींचा हुआ था, सख्ती बरकरार थी.

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    इस तरह मिला शेख अब्दुल्ला का साफ मैदान
    इसी के बाद पटेल के सुझाव पर कर्ण सिंह को इलाज के लिए लंबे समय के लिए अमेरिका भेजा गया. इसके बाद शेख अब्दुल्ला को अपनी मनमर्जी से कश्मीर में राज चलाने की छूट मिल गई. इसके बाद महाराजा का कश्मीर छूट ही गया. महाराजा ने चार शादियां की थीं. उनके अंतिम दिन मुंबई में बीते. वहीं 1961 में उनका निधन हो गया.

    वल्लभभाई पटेल ने कश्मीर के महाराजा को डिनर पर बुलाया और उनसे कहा आपको कुछ महीनों के लिए कश्मीर से बाहर चले जाना चाहिए


    1951 के चुनाव
    1951 में कश्मीर में पहली बार चुनाव हुए. नेशनल कांफ्रेंस इस चुनावों में जीती और शेख अब्दुल्ला अब राज्य के निर्वाचित प्रधानमंत्री (मुख्यमंत्री) बने. हालांकि इसके बाद हालात कुछ ऐसे बने कि खुद नेहरू ने शेख की सरकार को बर्खास्त कर उन्हें 13 सालों के लिए जेल में डाल दिया. तब नेहरू ने ये काम सदर ए रियासत बने राज्य के संवैधानिक प्रमुख कर्ण सिंह के जरिए करवाया.

    कश्मीर को स्पेशल स्टेटस
    1949 में नेहरू विदेश में थे. पटेल कार्यवाहक प्रधानमंत्री की भूमिका निभा रहे थे. तब कश्मीर में एक संविधान सभा की स्थापना पर विचार किया जाना था. एक्टिंग पीएम के तौर पर पटेल कश्मीर को स्पेशल स्टेटस देन पर सहमत थे, उन्होंने नेहरू के खास लोगों के दबाव में कई ऐसी बातों पर भी सहमति जाहिर की, जो उससे परे थीं, जिस पर सहमति जाहिर करके नेहरू विदेश रवाना हुए थे.

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    पटेल ने कहा- ये नेहरू पर भारी पड़ेगा
    राजमोहन गांधी की किताब कहती है कि शेख अब्दुल्ला ने इसके लिए परोक्ष तौर पर दवाब डाला था. गोपालसामी और अब्दुल कलाम आजाद ने इसका समर्थन किया. सरदार पटेल ने इसे मान लिया. हालांकि इसके बाद पटेल ने अपने लोगों के बीच कहा कि कश्मीर के स्पेशल स्टेटस के लिए जो प्रावधान कराए जा रहे हैं वो नेहरू को ही भारी पडेंगे.

    शेख अब्दुल्ला की गिरफ्तारी
    चार साल बाद नेहरू ने अब्दुल्ला को गिरफ्तार कराया. 13 सालों तक वो जेल में रहे. हालांकि 1975 में फिर उनकी मुख्यमंत्री के रूप में वापसी हुई और वो 1982 तक बदस्तूर चीफ मिनिस्टर बने रहे.

    कश्मीर को स्पेशल स्टेटस के कुछ प्रावधानों के बाद पटेल ने अपने लोगों के बीच कहा, ये नेहरू को भारी ना पड़ जाए


    इस तरह खत्म हुआ राजवंश का अध्याय
    इस बीच कश्मीर में एक बदलाव और हुआ. केंद्र सरकार ने 1965 में जम्मू-कश्मीर के संविधान एक्ट में छठा संशोधन करते हुए सदर ए रियासत और प्राइम मिनिस्टर को खत्म कर गर्वनर और चीफ मिनिस्टर के पद मंजूर किए गए. इसी के साथ 1952 से संवैधानिक तौर पर जम्मू कश्मीर के प्रेसीडेंट यानी सदर ए रियासत रहे कर्ण सिंह का भी पद खत्म हो गया. इसके साथ कश्मीर में राजवंश का एक अध्याय भी खत्म हो गया.

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