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जब नेहरू ने पीएम पद से इस्तीफा देना चाहा और पटेल ने इसे खारिज किया

जब नेहरू ने पीएम पद से इस्तीफा देना चाहा और पटेल ने इसे खारिज किया

सरदार वल्लभ भाई पटेल और नेहरू

सरदार वल्लभ भाई पटेल और नेहरू

देश के बंटवारे (Partition of country) के बाद जिस बड़ी तादाद से शरणार्थी भारत में आ रहे थे, उससे देश में बड़ी समस्या पैदा हो गई. इस समय पटेल (Sardar Patel) जो कर रहे थे, उससे उनकी लोकप्रियता कांग्रेस (Congress) और सरकार दोनों में काफी ज्यादा बढ़ गई थी. नेहरू (Nehru) को खुद जब ऐसा महसूस होने लगा तो उन्होंने इस्तीफे की पेशकश करके पटेल से कहा कि वो प्रधानमंत्री बन जाएं. जानें क्या था पूरा मामला

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आजादी के बाद जिस बड़ी तादाद में शरणार्थी भारत आ रहे थे, उससे देश बहुत दबाव में था. बंगाल का अर्थतंत्र गड़बड़ हो गया था. शरणार्थियों के मामले में पटेल के विचार ऐसे थे, जो उन्हें कांग्रेस पार्टी और मंत्रिमंडल दोनों में मजबूत कर रहे थे. उनकी स्थिति लगातार मजबूत हो रही थी. ऐसे में नेहरू ने उनके सामने इस्तीफे की पेशकश की, जिसे सरदार पटेल ने तुरंत खारिज कर दिया.

ये मामला दिसंबर 1948 में शुरू हुआ. बंगाल के पाकिस्तान की ओर गए हिस्से से बड़े पैमाने पर हिंदू शरणार्थी के तौर पर भारत आ रहे थे. इससे बंगाल का अमला दबाव में आ गया. क्योंकि उनके पास इतने शरणार्थियों की देखभाल करने लायक संसाधन नहीं थे. अर्थतंत्र दबाव में आ गया. ऐसे में दिसंबर 1948 में जयपुर में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ.

उसमें पटेल ने पाकिस्तान के सामने दो प्रस्ताव रखे-या तो इन सब शरणार्थियों को वापस ले जाकर इनका पुर्नवास कराओ या इसके लिए हमें बंगाल की सीमा पर जरूरी भूमि दो. इससे पहले पटेल ने तीसरा विकल्प भी नेहरू को पत्र लिखकर सुझाया था. वो ये था कि पाकिस्तान सरकार से कह दिया जाए कि अगर इसी तरह शरणार्थियों का आना जारी रहेगा तो मुसलमानों को यहां से वहां भेजने के सिवाय और कोई विकल्प हमारे सामने नहीं बचेगा.

शरणार्थियों को लेकर पटेल का विचार और काम दोनों कांग्रेस और सरकार में मान्य हो रहे थे लेकिन नेहरू ने इस पर जब उचित आपत्ति की तो इसे पटेल ने मान लिया लेकिन जो हालात बने उसमें पटेल की लोकप्रियता तेजी से बढ़ने लगी और वो मजबूत होते लगने लगे. (फाइल फोटो)

पटेल की योजना पर नेहरू की आपत्ति 
नेहरू ने इस विकल्प में आपत्तियां चिन्हित कीं, ऐसी घोषणा करने से पूरे भारत में कौमी दंगे शुरू हो जाएंगे. भारत में रहने वाला हर मुसलमान खुद को विदेशी समझने लगेगा और माना जाएगा कि हमने हिंदू राज्य की स्थापना की है. हम पूर्वी पाकिस्तान भेजने के लिए भारत के मुसलमानों नागरिकों में किनको अलग छाटेंगे. अपने नागरिकों को जबरन धक्का देना आंतरिक और अंतर्राष्ट्रीय दोनों कानूनों का उल्लंघन करने के समान होगा.

पटेल को लगा नेहरू का तर्क ठीक है
ये पूरा वाकया महात्मा गांधी के पोते राजमोहन गांधी की किताब “पटेल ए लाइफ” में इसका ब्योरा दिया गया है. उनकी किताब कहती है, सरदार ने नेहरू के उचित तर्क को स्वीकार कर लिया. वो शरणार्थियों को वापस ले जाने के लिए पाकिस्तान को समझाने के विकल्प के विषय के बारे में सोचने लगे. उन्होंने भारत में और पूर्वी पाकिस्तान में हिंदू-मुसलमानों के एक साथ रह सकने की संभावना का प्रयोग करने के बारे में सोचना शुरू किया.

शरणार्थियों के कारण बंगाल में हालात काफी खराब होने लगी थी. नेहरू चाहते थे कि वो इस्तीफा देकर पूर्वी बंगाल की यात्रा पर चले जाएं.

तब नेहरू ने पटेल से पीएम बनने के लिए कहा
ये विचार 1947 में उठाए गए उनके कदम से अलग था. इस बात का ध्यान रखा गया कि इससे नेहरू की स्थिति असुविधाजनक न हो जाए. विस्थापितों की बाढ़ के बारे में जवाहर लाल की प्रतिक्रिया से अपने दल और मंत्रिमंडल दोनों में असंतोष फैलने से वल्लभभाई को दोनों में अपनी स्थिति मजबूत बनाने का मौका मिल रहा था लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. फरवरी 1950 के अंत में नेहरू की ओर से उनके सामने प्रधानमंत्री का पद स्वीकार करने का प्रस्ताव रखा गया, उसे भी उन्होंने अस्वीकार कर दिया.

महात्मा गांधी के पोते राजमोहन गांधी ने सरदार पटेल पर लिखी किताब “पटेल ए लाइफ” में इस बारे में काफी विस्तार से लिखा है.

नेहरू त्यागपत्र देना चाहते थे
अपने विरुद्ध फैल रहे असंतोष से परेशान होकर नेहरू ने पद से त्यागपत्र देकर गांधीजी की भांति पूर्वी बंगाल की यात्रा करने का विचार किया. उन्होंने पत्र लिखकर पटेल को बताया, मुझे लगता है कि दिल्ली में मेरी उपयोगिता खत्म हो चुकी है. उन्होंने आगे लिखा, हर दृष्टिकोण से मेरा प्रस्ताव उचित है..इनका मार्गदर्शन करने के लिए आप तो हैं ही.

नेहरू के इस्तीफे के प्रस्ताव को पटेल ने तुरंत खारिज कर दिया
नेहरू के प्रस्ताव को अस्वीकार करने में वल्लभ भाई पटेल ने एक मिनट भी नहीं लगाया. प्रधानमंत्री का दायित्व संभाल करने लायक शारीरिक क्षमता अब उनमें रही नहीं थी. फरवरी में एक बार संसद में भाषण देने के बाद उनके थूक से खून निकलने लगा. उससे भी बड़ी बात ये थी कि उन्हें निजी तौर पर खटकने वाली बहुत सी कमियों और विचित्रताओं के बाद भी नेहरू का नेतृत्व देश के लिए आवश्यक प्रतीत होता था.

पटेल ने इस दायित्व को संभालने में अपनी असमर्थता के साथ ही नेहरू को अपना समर्थन होने की बात भी कही. नेहरू ने उसी क्षण त्यागपत्र देने का विचार छोड़ दिया.

Tags: Jawahar Lal Nehru, PM Nehru, Prime minister, Sardar patel, Sardar Vallabhbhai Patel

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