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जब नरसिंह राव के बेटे दिल्ली आकर इंदिरा गांधी से करते थे पिता के अफेयर की शिकायत

नरसिंह राव जितने विद्वान और कूटनीतिक माने जाते थे, उतने ही निजी जीवन में विवादों से घिरे हुए भी

नरसिंह राव जितने विद्वान और कूटनीतिक माने जाते थे, उतने ही निजी जीवन में विवादों से घिरे हुए भी

पीवी नरसिंह राव देश के पूर्व प्रधानमंत्री (Former Prime Minister PV Narsimha Rao) थे. 90 के दशक के मध्य में जब देश में आर्थिक सुधार शुरू हुए तो उसके पीछे असली ताकत उन्हीं की थी. ये साल उनकी जन्मशती भी है. हालांकि अपनी निजी जिंदगी में नरसिंह राव विवादों से घिरे हुए थे. उनके बारे में लिखी गई किताबें भी कहती हैं कि निजी जिंदगी के अफेयर से उनका परिवार भी खासा नाराज था

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देश के पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव (Former Prime Minister PV Narsimha Rao) का आज जन्म दिन है. देश इस साल उनकी जन्मशती भी मनाएगा. आर्थिक सुधारों के रास्ते पर देश को लाकर समूचा बदलने का श्रेय भी उन्हीं को जाता है. लेकिन बाद में उन्हीं की पार्टी कांग्रेस ने उनसे किनारा कर लिया. नरसिंह राव के साथ बहुत से विवाद भी जुड़े, उनकी जिंदगी में भी एक अन्य महिला के साथ उनके अफेयर का मामला बहुत ज्यादा उछला. कहा जाता है कि इससे नरसिंह राव का परिवार खुद नाखुश था. उनके बड़े बेटे अक्सर पिता के इस अफेयर की शिकायत तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से करते थे.

जब इंदिरा गांधी से कई बार उनके बेटे ने आकर ऐसी शिकायत की तो वो झुंझला गईं. उन्होंने कांग्रेस के कई सीनियर लीडर्स से इस बारे में चर्चा भी की. झुंझलाई हुई इंदिरा ने कहा, 'मैं इस पीवी का क्या करुं. पीवी ने लक्ष्मीकांता अम्मा के साथ फ्लर्ट करने के अलावा कुछ नहीं किया. मैं परेशान हो गई हूं. मुझे उनके बेटे पर दया आती है.'

कांग्रेस के सीनियर लीडर और आंध्र प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री वेंगल राव ने अपनी ऑटोबॉयोग्राफी "ना जीविता कथा" (माई लाइफ स्टोरी) में इस वाकये का जिक्र किया. उन्होंने लिखा, " वो इंदिराजी से मुलाकात करने गए दिल्ली गए थे.

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इंदिराजी बुरी तरह झुंझलाई हुईं थीं.पीवी नरसिंह राव का नाम लेते ही फट पड़ीं." वेंगल राव ने किताब में लिखा, "उन्होंने इंदिराजी को पार्टी के किसी वरिष्ठ मंत्री पर इस तरह झुंझलाते हुए कम देखा था. इंदिरा जी ने कहा, "मैं उम्मीद नहीं करती थी कि वह इतने चरित्रहीन होंगे. जबकि उनके इतने बड़े बच्चे हैं".

नरसिंह राव के बड़े बेटे अक्सर इंदिरा से शिकायत करते थे
वेंगल ने आत्मकथा में ये भी लिखा, " नरसिंह राव के बड़े बेटे पीवी रंगाराव अक्सर पिता के अफेयर की शिकायत लेकर दिल्ली पहुंचते थे. उन्होंने कई बार इंदिरा से मिलकर पिता की शिकायत की थी." उन दिनों राव आंध्र प्रदेश में मुख्यमंत्री थे.

एक ओर अगर बेटा उनकी शिकायत कर रहा था तो दूसरी ओर विरोधी भी उनके अफेयर को मिर्च मसाला लगाकर उछाल रहे थे. उन्हीं लोगों ने लक्ष्मी कांतम्मा नाम की महिला नेता से संबंधों की बात मसाला लगाकर पहुंचाई. इंदिराजी इतनी आजिज आ गईं कि राव की सीएम की कुर्सी तीन साल में ही चली गई.

छोटे-छोटे टुकड़ों में कई महिलाओं से रिश्ते थे
विजय सीतापति की किताब "द हाफ लॉयन"  में भी इसका उल्लेख है कि आखिर क्यों इंदिरा उनसे नाराज हो गईं. लेखक के अनुसार, "राव के रिश्ते और भी कई महिलाओं से थे लेकिन छोटे-छोटे टुकड़ों में. सबसे ज्यादा प्रगाढ़ता लक्ष्मी कांताम्मा नाम की एक महिला नेता से थी." कांताम्मा 1977 तक लगातार सांसद चुनी जाती रहीं.

नरसिंह राव पर लिखी गई किताबों के अनुसार उनके अफेयर कई महिलाओं से रहे लेकिन छोटे छोटे पीरियड्स में लेकिन सबसे लंबा रिश्ता सांसद रहीं लक्ष्मी के साथ था


फादर ऑफ इंडियन इकोनॉमिक रिफॉर्म्स 
राव को 90 के दशक में उदारीकरण के जरिए देश की तस्वीर बदलने का भी श्रेय जाता है. उन्होंने प्रधानमंत्री बनने के बाद तत्कालीन वित्त मंत्री मनमोहन सिंह के साथ मिलकर जिस तरह के कदम उठाए और नीतियां बनाईं, उससे देश में प्राइवेटीकरण का रास्ता मजबूत हुआ. देश और विकास की पूरी तस्वीर बदली. उन्हें "फादर ऑफ इंडियन इकोनॉमिक रिफॉर्म्स" भी कहा जाता है.

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कौन थीं लक्ष्मी कांतम्मा
वर्ष 1957 में एक महिला खम्मम से जीतकर आंध्र प्रदेश के विधानसभा में पहुंची. राजनीति से उसका ज्यादा लेना-देना नहीं था लेकिन उसने कम्युनिस्टों के अजेय गढ़ में सेंध लगाकर चुनाव जीता था. नाम था लक्ष्मी कांताम्मा.

लंबी, छरहरी, आकर्षक, वाकपटु, तेजतर्रार और पढ़ी लिखी. आंध्र प्रदेश के अनंतपुर के नामी रेड्डी जमींदार परिवार से ताल्लुक रखने वाली. बौद्धिक तौर पर प्रखर. लक्ष्मी जब विधानसभा में पहुंची तब उनकी उम्र थी 33 साल. उसी विधानसभा में 36 साल के पीवी नरसिम्हा राव भी पहली बार मंथनी से जीतकर पहुंचे थे.

नरसिंह राव की जिंदगी में कई विरोधाभास रहे.. जहां वो एक ओर खासे विद्वान, साहित्यकार, दूरदर्शी वाले नेता थे तो उन पर भ्रष्टाचार से लेकर नैतिकता को लेकर भी सीधे आरोप लगे


इस तरह राव पार्टी की ही इस नेता के करीब आए
राव और लक्ष्मी में विधानसभा सत्रों के दौरान मुलाकातें हुईं. दोनों की पृष्ठभूमि में जमीन-आसमान का अंतर था. एक खाते-पीते और बेहद समृद्ध परिवार की और राव बेहद साधारण और अभाव से गुजरकर आए हुए. विधानसभा में बहुत कम समय में नरसिम्हा राव की विद्वता और समझ-बूझ की धाक जम गई.

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लक्ष्मी उनकी ओर आकर्षित होने लगीं. 1962 में जब लक्ष्मी ने लोकसभा का चुनाव लड़ा तो राव ने उनकी भरपूर मदद की. वह उनके करीबी और राजनीतिक गुरु बन चुके थे. हालांकि राव विवाहित थे. दस साल की उम्र में उनका विवाह सत्यम्मा से हो चुका था. वो तीन बेटों और पांच बेटियों के पिता थे.

इंदिरा उनको पसंद करती थीं इसी वजह से मुख्यमंत्री भी बने
लक्ष्मी लोकसभा में पहुंचीं. नरसिम्हा राव आंध्र के तेज-तर्रार नेताओं में गिने जाने लगे. जल्द मंत्री बन गए. लक्ष्मी से नजदीकियां बढ़ती रहीं. राव की पहचान केंद्रीय नेतृत्व तक बन गई थी. नेहरू और इंदिरा उन्हें पसंद करते थे. इसी वजह से इंदिरा ने प्रधानमंत्री बनते ही 1970 में राव को मुख्यमंत्री बनने में मदद की.

जब नरसिंह राव प्रधानमंत्री बने तो सोनिया गांधी से उनकी खटक गई. इसका जिक्र उन्होंने बाद में किया भी. उनका कहना था कि जब भी वो सोनिया को फोन करते थे तो उनको लंबा होल्ड करा देती थीं, जो प्रधानमंत्री पद का अपमान था


70 के दशक में राव की पत्नी का निधन हो गया
60 के दशक के आखिर तक नरसिंह राव और लक्ष्मी कांताम्मा का रिश्ता समय के साथ और मजबूती ले चुका था. हालांकि दोनों ने इसे गुप्त रखने की कोशिश की. लक्ष्मी संसद में प्रखर वक्ता के रूप में पहचान बना चुकी थीं.

विजय सीतापति ने अपनी चर्चित किताब "द हाफ लॉयन" में यूं तो नरसिंह राव की तारीफ में काफी कसीदे पढ़े हैं, लेकिन उनकी प्राइवेट लाइफ पर निगाह डालने में भी कोताही नहीं बरती. उन्होंने किताब में लिखा, सत्यम्मा का जीवन पति की उपेक्षा और इसी वजह से मिले अकेलेपन से भरा था. उनका 1970 में निधन हो गया. इसके बाद लक्ष्मी से रोमांटिक रिलेशनशिप में ज्यादा स्वेच्छाचारिता आ गई.

इन संबंधों को लेकर पसोपेश की स्थिति भी बनी
नरसिंह राव को जब आंध्र प्रदेश में झटका लगा तो वह कुछ सचेत तो हुए लेकिन लक्ष्मी से उनके संबंध कभी खत्म नहीं हुए. हालांकि तब जरूर पसोपेश की स्थिति बन गई जब आपातकाल के दौरान लक्ष्मी कांतम्मा इंदिरा के विरोध पर उतर आईं. जनता पार्टी में चली गईं.

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1977 में चुनाव भी जनता पार्टी के टिकट पर लड़ा. "हाफ लॉयन" में लेखक विजय सीतापति ने लिखा है कि नरसिम्हा राव से लक्ष्मी के रिश्ते 1962 से लेकर 1975 तक चले. लेकिन वह राव के साथ जब तक रहीं, तब तक पूरी तरह समर्पित और प्रतिबद्ध.

बाद में लक्ष्मी साध्वी बन गईं, बड़ी संपत्ति दान कर दी
बाद में लक्ष्मी ने राजनीति से अपने सारे संपर्क काटकर आध्यात्म की ओर कूच किया. साध्वी बन गईं. वह गुरु श्रीशिवा बालयोगी महाराज के शरण में चली गईं. उन्होंने अपनी संपत्ति का बड़ा हिस्सा धर्मार्थ कामों में दे दिया.

कहा जाता है कि उन्होंने नरसिम्हा राव को भी राजनीति छोड़ साथ आने को प्रेरित किया. 1991 में राव बोरिया बिस्तर और किताबें बांधकर संन्यास की ओर ही जाने वाले थे लेकिन राजीव गांधी की हत्या ने उनके भाग्य को पूरी तरह बदल दिया.

नरसिंह राव आठ भाषाओं के जानकार थे. कांग्रेस में लगातार उन्हें उतार-चढ़ाव का सामना तो करना पड़ा लेकिन उन्होंने पार्टी कभी नहीं छोड़ी. हालांकि 1977 में लक्ष्मी कांग्रेस छोड़कर जनता पार्टी में चली गईं थीं


बाद में राव ने खुद अपनी जिंदगी पर नॉवेल लिखा
राव ने प्रधानमंत्री पद से हटने के बाद एक आत्मकथात्मक उपन्यास लिखा-"इनसाइडर", जिसे पेंग्विन ने प्रकाशित किया. इस किताब को लिखने के लिए राव को उस जमाने में बतौर एडवांस एक लाख रुपए मिले थे. इस किताब में उन्होंने संकेतों, इशारों और परोक्ष तौर पर अपने कुछ संबंधों पर इशारा किया है. हालांकि उनके सहयोगी कहते हैं कि जब वह प्रधानमंत्री थे, तब अपनी कैबिनेट की एक जूनियर महिला मंत्री पर मेहरबान थे. इसका लोगों ने अलग-अलग तरीके से अर्थ लगाया.

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