गांधी 150 : जब दिल्ली में नेहरू के सामने नारे लगे, "गांधी को मर जाने दो!"

गांधी उस दौरान दिल्ली में हो रही सांप्रदायिक हिंसा के खिलाफ अनशन कर रहे थे.

Avinash Dwivedi | News18Hindi
Updated: September 10, 2018, 6:52 PM IST
गांधी 150 : जब दिल्ली में नेहरू के सामने नारे लगे,
गांधी उस दौरान दिल्ली में हो रही सांप्रदायिक हिंसा के खिलाफ अनशन कर रहे थे.
Avinash Dwivedi | News18Hindi
Updated: September 10, 2018, 6:52 PM IST
भारत आजाद हो चुका था. लेकिन इसके साथ ही दुनिया की सबसे पुरानी संस्कृतियों में से एक विभाजन का दंश भी झेल रही थी. चारों ओर हिंसा भड़की हुई थी. भारत की राजधानी में भी पाकिस्तान से आकर लाखों सिख और हिंदू रिफ्यूजी ठहरे हुए थे. ऐसे माहौल में महात्मा गांधी दिल्ली की भंगी कालोनी में रह रहे थे. लेकिन इसी दौरान दिल्ली का माहौल खराब होने लगा था. पाकिस्तान से आए हिंदू और सिख रिफ्यूजी जिस भयावह अनुभवों से गुज़रकर दिल्ली पहुंचे थे. वे उसी अनुभव को दिल्ली में दोहरा रहे थे. उन्होंने दिल्ली से पाकिस्तान जा चुके मुस्लिमों के घरों पर कब्जा करना शुरू कर दिया था. उन रिफ्यूजियों में से अधिकांशत: ऐसे भी थे जो जिन घरों में मुस्लिम रह रहे थे उन पर भी कब्जा कर रहे थे. ऐसे में हिंसा और ज्यादा भड़क उठी थी. और कई मुस्लिम परिवारों को उनके घरों से निकालकर सड़क पर रहने को मजबूर कर दिया गया था.

जब दिल्ली में चारों ओर हिंसा फैली तो सरकार ने महात्मा गांधी का ऐसे बिना सुरक्षा के दिल्ली की भंगी कालोनी में रहना सही नहीं समझा और उन्हें अपेक्षाकृत सुरक्षित जगह शिफ्ट कर दिया. यह सुरक्षित जगह थी कांग्रेस से जुड़े सबसे अमीर लोगों में से एक उद्योगपति बिड़ला का घर. यहां गांधी को लाने की एक वजह पिछले साल दिसंबर में हुआ टाइफाइड भी था. जिसके बाद उन्हें स्वस्थ होने के लिए भी बिड़ला हाउस ले आया गया था.

यहीं रोज शाम महात्मा गांधी की प्रार्थना सभा होती थी. जहां वे लोगों को संबोधित भी किया करते थे. ऐसे ही 12 जनवरी, 1948 को महात्मा गांधी ने अपनी प्रार्थना सभा में लोगों को संबोधित करने वाले थे. लेकिन चूंकि उस दिन सोमवार था और गांधी की मौनव्रत था तो महात्मा गांधी के एक सहयोगी ने उनकी जगह जनता को संबोधित किया. महात्मा गांधी की ओर से उन्होंने यह घोषणा कर दी कि वे अगले दिन से अनशन करेंगे.

ऐसा करने का निर्णय महात्मा गांधी ने आजादी के बाद लगातार बढ़ती जा रही सांप्रदायिक हिंसा को रोकने के लिए किया था. महात्मा गांधी यह भी चाहते थे कि पाकिस्तान को उसकी बकाया राशि भी दे दी जाये. इसके अलावा भी महात्मा गांधी दिल्ली की कई गड़बड़ियों को दूर करना चाहते थे. गांधी के इस आखिरी अनशन में हम आगे की कड़ी में बात करेंगे. लेकिन अभी बात उस वाकये की जब लोगों ने नारे गांधी की मौत के नारे लगाए.

इस सीरीज की पुरानी कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दी गई तस्वीर पर क्लिक करें-



वे लोग रिफ्यूजी थे. वही सिख और हिंदू शरणार्थी जो पाकिस्तान से बसने के लिए जगह की तलाश में दिल्ली चले आये थे. अचानक से एक रोज ये लोग साइकिलों से आकर बिड़ला हाउस के सामने खड़े हुए. गांधी यहीं ठहरे हुए थे. और चूंकि यह उनके अनशन का दूसरा दिन था तो लगभग अचेत अवस्था में थे. उस वक्त उनके पास ही तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू, उपप्रधानमंत्री सरदार पटेल और शिक्षामंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद भी बैठे हुए थे. इतने में ही बाहर इकट्ठा हुए चंद शरणार्थियों ने नारा लगाना शुरू कर दिया. वे चिल्ला रहे थे, "गांधी को मर जाने दो."

इतना सुनते ही नेहरू बाहर निकले और चिल्लाए, तुम्हारी ऐसा कहने की हिम्मत कैसे हुई? आओ और पहले मुझे मारो. इतना कहना था कि सारे नारे लगाने वाले भाग निकले. इसके बाद जब नेहरू वहां से चले गए तो ये शरणार्थी फिर आ गए. इस बार महात्मा गांधी के डॉक्टर जीवराज मेहता बाहर निकले और उनसे ऐसे नारे लगाने का कारण पूछा. उन लोगों ने बताया कि वे दिल्ली में इकट्ठा हुए रिफ्यूजियों के चलते यहां आए हैं और चाहते हैं कि इन शरणार्थियों को खाना, घर, कपड़े और नौकरियां मिलें.

यह भी पढ़ेंगांधी 150 : गांधी के गुरु कौन, गोपालकृष्ण गोखले या बाल गंगाधर तिलक?
पूरी ख़बर पढ़ें
अगली ख़बर