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क्या सरदार पटेल के बेटे ने नेहरू की वजह से छोड़ दी थी कांग्रेस

सरदार पटेल

सरदार पटेल

सरदार पटेल के बेटे दहयाभाई अपने पिता के निधन के कुछ साल बाद कांग्रेस छोड़ दी. उन्होंने स्वतंत्र पार्टी को मजबूत करने में पूरी ताकत झोंक दी थी

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    सरदार वल्लभभाई पटेल कांग्रेस के निष्ठावान नेताओं में थे. जीवनपर्यंत वो कांग्रेस के लिए काम करते रहे. आजादी के बाद वो देश के पहले गृह मंत्री बने. 1950 में लंबी बीमारी के बाद उनका निधन हो गया. इसके कुछ सालों बाद पटेल के बेटे ने कांग्रेस छोड़ दी. पहले वो महा गुजरात जनता परिषद के सदस्य बने और फिर स्वतंत्र पार्टी को मजबूत करने में पूरी ताकत झोंक दी.सरदार पटेल के बड़े बेटे दहयाभाई पटेल कांग्रेसी थे. 1939 में बॉम्बे नगर निगम (बीएमसी) के निर्वाचित सदस्य थे.उन्होंने निगम में 18 साल बिताए, जिनमें से वह छह साल तक कांग्रेस पार्टी के नेता थे.

    अपनी पुस्तक राज्यसभा मा पहेलुन वर्ष (राज्यसभा में प्रथम वर्ष) के प्रस्ताव में दहयाभाई ने लिखा, वह कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में 1957 के लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए तैयार थे. गुजरात प्रांतीय कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष भी उन्हें उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतारने के लिए उत्सुक थे. लेकिन हालात कुछ ऐसे बने कि दहयाभाई को कांग्रेस छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा.

    दहयाभाई ने अपनी किताब में लिखा, प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की कांग्रेस सरदार पटेल के योगदान को स्वीकार करने को तैयार नहीं थी और जनवरी 1957 में कांग्रेस के वार्षिक सत्र में यह सब स्पष्ट हो गया. एक सदस्य प्रस्ताव देना चाहता था कि सरदार पटेल के योगदान का दस्तावेजों में उल्लेख किया जाए कांग्रेस पार्टी के इंदौर वार्षिक सत्र में लेकिन इस विचार को नहीं माना गया. इसने दहयाभाई को उसी साल कांग्रेस छोड़ने के लिए मज़बूर किया.

    कांग्रेस छोड़कर पहुंचे महा गुजरात जनता परिषद में
    दरअसल अलग गुजरात राज्य के लिए आंदोलन 1956 में शुरू हुआ था. 1957 तक ये पूरे चरम पर था. पूर्व कांग्रेसी इंदुलाल याज्ञिक के नेतृत्व में एक नवनिर्मित पार्टी महा गुजरात जनता परिषद बनी थी. दहयाभाई से 1957 के लोकसभा चुनाव में महा गुजरात जनता परिषद के उम्मीदवार के रूप में लड़ने का अनुरोध किया गया था.

    सरदार पटेल के बेटे दहयाभाई पटेल


    राज्यसभा में पहुंचे
    आखिरकार, दहयाभाई गुजरात जनता परिषद के उपाध्यक्ष बने और 1958 में राज्यसभा के लिए जनता परिषद के सदस्य के रूप में चुने गए.

    तब बहन ने लगाई फटकार
    दहया के अपनी बहन मनी बेन से अच्छे रिश्ते नहीं थे. उन्होंने मनीबेन ने आंखों में आंसू के साथ अपने भाई को फटकार लगायी और कहा: कांग्रेस पार्टी के खिलाफ वह कैसे सोच सकते हैं जब उनके पिता नहीं हैं?

    दहयाभाई ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी के साथ काम करते थे. उन्होंने 27 साल की उम्र में अपनी पहली पत्नी को खो दिया था और दोबारा शादी की. सरदार पटेल ने शांत रहने और सही से पेश आने के लिए कई बार सलाह दी थी. उनके अपनी बहन मनीबेन के साथ भी अच्छे संबंध नहीं थे.

    सरदार पटेल का परिवार


    फिर स्वतंत्र पार्टी में शामिल हुए
    सरदार पटेल के कई वफादार नेताओं ने जिनको लगता था कि कांग्रेस पार्टी में पटेल की यादों को सही से नहीं सहेजा गया है. उन लोगों ने 1959 में नई स्वतंत्र पार्टी के पीछे अपनी पूरी ताकत लगा दी. दहयाभाई भी स्वंतत्र पार्टी में शामिल हो गए. गुजरात में स्वतंत्र पार्टी का नेतृत्व भाईलालभाई पटेल ने किया था. उनको भाईकाका के रूप में जाना जाता था. वह एक दूरदर्शी, सरदार पटेल के वफादार और शिक्षा शहर वल्लभ विद्यानगर (सरदार के नाम पर) के निर्माता थे.

    कोई जीत नहीं पाया
    1960 में गुजरात राज्य के गठन के बाद पहली बार 1962 के लोकसभा चुनाव थे. जिसमें सरदार पटेल के परिवार के कई सदस्य चुनाव लड़ रहे थे. जिसमें दहया भाई की पत्नी और उनके भाई ने भी चुनाव लड़ा लेकिन दोनों में कोई भी चुनाव जीत नहीं सका.
    1962 के लोकसभा चुनावों के दौरान दहयाभाई पहले से ही राज्यसभा सांसद थे. इसलिए, उनकी पत्नी भानुमती पटेल और उनके भाई पशाभाई पटेल को क्रमशः भावनगर और साबरकांठा की सीटों से स्वतंत्र पार्टी से मैदान में उतारा गया. भानुमती पटेल, कांग्रेस, प्रजा समाजवादी पार्टी और अपनी स्वयं की स्वतंत्र पार्टी के बीच एक त्रिकोणीय मुकाबले में फंस गयी और बुरी तरह से हार गयी. उन्हें सिर्फ 14,774 (7.35 प्रतिशत) वोट मिले और जमानत राशि भी नहीं बचा सकी.
    उनके भाई पाषाभाई भी हार गए परन्तु कम अंतर से हारे. उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वी गुलजारीलाल नंदा जो केंद्रीय मंत्री थे उनको कड़ी टक्कर दी और उनसे 24,609 मतों से हार गए. यह पाषाभाई पटेल के लिए पहला लोकसभा चुनाव नहीं था. उन्होंने 1957 का लोकसभा चुनाव बड़ौदा से फतेहसिंहराव गायकवार के खिलाफ लड़ा और 63,646 मतों से हार गए.

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