हक की लड़ाई, जब 28 लाख हिंदोस्तानी औरतों के पास अपना नाम तक नहीं था!

भारतीय महिला वोटर

भारतीय महिला वोटर

Women's Day Special : लोकतंत्र में वोटिंग मौलिक अधिकार है, महिला सशक्तिकरण नहीं लेकिन सदियों तक नारी अस्मिता से जुड़ा मुद्दा रहा. भारत में इस लड़ाई ने आंदोलन भी देखे तो 'बेनाम महिलाओं' का दौर भी.

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महिलाओं को पहचान और नाम हासिल करने के लिहाज़ से 8 मार्च ऐतिहासिक तारीख मानी जाती है. अमेरिकी समाजवादी पार्टी (Socialist Party) ने 1909 में पहली बार राष्ट्रीय महिला दिवस (National Women's Day) इसी तारीख को मनाया था. 1910 में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाये जाने का प्रस्ताव 8 मार्च को ही रखा गया और 1911 में इस दिन पहली बार अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मना. लेकिन, इससे पहले 1907 में ब्रिटेन (Britain) में और 1908 में अमेरिका (America) में इसी तारीख को महिलाएं लड़ रही थीं कि उन्हें वोट का अधिकार (Voting Rights) यानी नागरिक की पहचान मिले.

आप जानते हैं कि ब्रिटेन के गुलाम रहे भारत के संविधान और शासन प्रशासन पर ब्रिटेन की व्यवस्था का कितना असर रहा. यह भी छुपी बात नहीं है कि अमेरिका और यूरोप के आंदोलन भारत के आधुनिक समय के निर्माण को दिशा देते रहे हैं. भारत में स्वाधीनता मिलते ही महिलाओं को वोटिंग अधिकार मिल जाना स्वाभाविक नहीं था, बल्कि लड़ाई लड़ी गई.

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महिलाओं के वोटिंग अधिकार की लड़ाई
सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि दुनिया भर में इस अधिकार के लिए लड़ाई लड़ी गई. अमेरिका में 144 साल की लड़ाई के बाद महिलाओं को वोट का अधिकार मिला तो स्विटज़रलैंड में यह 1874 में संभव हुआ. ब्रिटेन में एक सदी की लड़ाई लड़कर यह अधिकार महिलाओं ने हासिल किया. भारत की बात से पहले यूके में 8 मार्च की तारीख का एक किस्सा जानना चाहिए.

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वोटिंग अधिकार के लिए महिलाओं ने लंबा संघर्ष किया था.


ब्रितानी राजा ने 1907 के फरवरी महीने में जब अपने भाषण में महिलाओं को वोटिंग अधिकार से वंचित रखे जाने की बात की तो ब्रिटेन महिलाओं की सामाजिक व राजनीतिक संस्थाओं ने बड़े स्तर पर आंदोलन छेड़ दिया. यह आंदोलन बहुत उग्र था यानी लाठियां भी चलीं, महिलाएं घायल भी हुईं और 50 से ज़्यादा जेल भी गईं.

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7 फरवरी 1907 को तो करीब 3000 महिलाएं सड़क पर उतर आईं और अपने हक के लिए नारे करने लगीं. इसे इतिहास में मड मार्च कहते हैं. फिर इस आंदोलन के चलते 8 मार्च 1907 को उदारवादी नेता डब्ल्यू एच डिकिंसन ने संसद में महिलाओं के वोटिंग अधिकार संबंधी विधेयक पेश किया. जबकि यह प्रस्ताव कुछ महिलाओं के लिए ही वोट की वकालत करता था, लेकिन इसे भी तब नकार दिया गया था और महिलाओं का आंदोलन चलता रहा.

यह लड़ाई में 1929 में जाकर एक मायने में खत्म हुई जब 21 साल से ज़्यादा उम्र की म​हिलाओं ने पहली बार आम चुनाव में वोटिंग की. क्या आपको पता है कि इसी दौरान भारत में महिलाएं वोटिंग अधिकार के लड़ रही थीं?

भारत में वोट के हक का संघर्ष
गेराल्डीन फोर्ब्स जैसे इतिहासकारों के हवाले से कहा जाता है कि महात्मा गांधी महिलाओं के वोट अधिकार के पक्ष में नहीं थे और चाहते थे कि महिलाएं ब्रितानी हुकूमत से लड़ाई में पुरुषों का सहयोग करें. लेकिन इतिहास बताता है कि 1921 में बॉम्बे और मद्रास में पहली बार महिलाओं को सीमित तौर पर वोट करने की इजाज़त मिली थी. 1923 से 1929 के बीच सात और सूबों में यह संभव हुआ था.

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मतलब साफ है कि ब्रिटेन में जिस तरह महिलाओं के वोटिंग अधिकार के लिए लड़ाई चल रही थी, उसकी आंच भारत में महसूस की जा रही थी. भारत में आंदोलित महिलाएं यह संघर्ष कर रही थीं. अब सवाल यह है कि क्या ब्रितानी हुकूमत इसके विरोध में थी?

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भारत में आज़ादी के साथ ही महिलाओं को मिला था वोटिंग का अधिकार.


भारत 1947 में जब आज़ाद हो रहा था, तब तक दुनिया के विकसित या संपन्न देशों में से ज़्यादातर में महिलाओं को यह अधिकार मिल चुका था या मिल रहा था. तब ब्रितानी व्यवस्था का कहना था कि भारत में गरीबी और अशिक्षा का आलम देखते हुए महिलाओं को वोटिंग अधिकार देने की 'यूनिवर्सल प्रणाली' यहां लागू नहीं की जाना चाहिए.

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इसके बावजूद, भारतीय नेताओं ने इस विरोध को नहीं माना और भारत के आज़ाद होते ही पुरुष के बराबर ही महिला के वोट की कीमत थी. लेकिन अधिकार मिलने या देने से ही लड़ाई खत्म नहीं हो गई थी! वोट की अहमियत समझने की लड़ाई जो आज भी चल रही है, तब क्या थी?

बेनाम थीं लाखों महिलाएं?
आज़ादी मिली, लेकिन 1948 में महिलाओं की वोटिंग को लेकर समस्या तब खड़ी हुई जब इलेक्टोरल रोल में नागरिकों को दर्ज करने का सिलसिला शुरू हुआ. बीबीसी की एक रिपोर्ट की मानें तो उस समय कुछ सूबों के अधिकारियों ने यह समस्या बताई कि महिलाएं अपना नाम तक रोल में दर्ज नहीं करवा सकीं.

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क्योंकि उन्हें अपने नाम को लेकर ही सरोकार नहीं था. वो खुद को किसी पुरुष की पत्नी या मां या विधवा या बेटी बताती थीं. यह व्यवस्था में स्वीकार नहीं किया गया और पहले इलेक्टोरल रोल में करीब 28 लाख औरतें पात्र होने के बावजूद बतौर वोटर दर्ज ही नहीं हुईं. आज तक संसद और सरकारी मशीनरी में महिलाओं के आरक्षण और उनकी सशक्त उपस्थिति को लेकर चर्चा जारी है.
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