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जिस मर्डर से तय हो गया कि बाल ठाकरे की गद्दी राज नहीं उद्धव ही संभालेंगे

News18Hindi
Updated: November 28, 2019, 5:42 PM IST
जिस मर्डर से तय हो गया कि बाल ठाकरे की गद्दी राज नहीं उद्धव ही संभालेंगे
उद्धव ठाकरे कैसे बने बाल ठाकरे के सियासी वारिस

एक समय तक राज ठाकरे चाचा बाबासाहेब के आंख के तारे थे. लोग भी उन्हीं को शिवसेना का अगला नेता मानकर चल रहे थे लेकिन ऐसा कैसे हो गया कि सारी तस्वीर ही बदल गई. हुआ तो बहुत कुछ लेकिन ताबूत में आखिर कील गड़ी एक मर्डर से

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  • Last Updated: November 28, 2019, 5:42 PM IST
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1996 में मुंबई (Mumbai) में एक मर्डर हुआ था. इस मर्डर ने ही राज ठाकरे की शिवसेना (Shivsena) में नैया डुबो दी. हालांकि उद्धव (Uddhav thakrey) के पार्टी में आने के बाद उनकी हैसियत कमजोर होने लगी थी लेकिन इस मर्डर ने राज का चैप्टर ही करीब करीब शिवसेना में क्लोज कर दिया. इसके बाद उद्धव का सितारा चमकता गया. अब वो महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं. कहा जाता है कि उद्धव एक जमाने में राजनीति में कतई इच्छुक नहीं थे. ऐसा लग रहा था कि बाबासाहेब ठाकरे की कमान भतीजे राज के हाथों में ही आएगी. राज बचपन से ही चाचा बाल ठाकरे के चहेते थे.

ठाकरे बचपन से ही राज को अपने साथ राजनैतिक रैलियों में ले जाने लगे थे. तो उनके सारे गुण भी राज में आ गए थे. चाल-ढाल, भाषण, तेवर-गुस्सा. सब हू-ब-हू. वो बाल ठाकरे की तरह गजब के कार्टूनिस्ट थे. सब राज को ही शिवसेना का भविष्य मान के चल रहे थे.

मां चाहती थीं कि उद्धव सियासत में आएं
लेकिन कहा जाता है कि बेटा तो बेटा ही होता है. बाबा साहेब की पत्नी मीना ठाकरे चाहती थीं कि कम से कम उनका एक बेटा तो राजनीति में आए. बड़े बेटे बिंदू माधव की सड़क दुर्घटना में मौत हो चुकी थी. जयदेव की पिता से बनती नहीं थी. वो विद्रोह करके पिता से नाता तोड़ चुके थे. अब बचे थे केवल उद्धव, जो शर्मिले, संकोची और सीधे-साधे माने जाते थे. मां ने उनसे कहा कि उन्हें शिवसेना के कार्यक्रमों में जाना चाहिए. उद्धव ने मां की बात का पालन किया.

राज ठाकरे को काफी हद तक लोग बाबासाहेब ठाकरे की कॉपी के तौर पर ही देखते थे, वैसे ही तेवर और वैसा ही स्टाइल


उद्धव बनाने लगे पकड़
1995 के बाद वो पार्टी के अंदरूनी कामों में पकड़ बनाने लगे. बाल ठाकरे भी तमाम कार्यकर्ताओं को उनके पास भेजने लगे. 1997 के बीएमसी चुनाव में. तमाम टिकटें उद्धव के मन के बांटे गए. इससे राज ठाकरे नाराज भी हुए. उस चुनाव में शिवसेना बीएमसी चुनाव जीती और उद्धव की पकड़ मजबूत होने लगी. शिवसैनिकों को भी समझ में आने लगा कि अगले नेता वही होंगे.
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राज ठाकरे ने रखा उद्धव के पक्ष में प्रस्ताव
राज नाराज रहने लगे. पार्टी के अंदर कई खेमे बन गए. लेकिन ये अब तक रहस्य है कि उद्धव से नाराजगी के बाद भी राज ठाकरे ने उनका नाम अध्यक्ष पद के लिए क्यों प्रस्तावित किया था. 2003 में महाबलेश्वर में उद्धव ठाकरे को अगला अध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव राज ठाकरे ने ही दिया था और इस पर तुरंत सर्वसम्मति से मुहर भी लग गई. उद्धव शिवसेना के कार्यकारी अध्यक्ष बन गए.

अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का स्वागत करते हुए महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के अध्यक्ष राज ठाकरे ने शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे को याद किया.
वर्ष 2003 में राज ठाकरे ने उद्धव को शिवसेना का अगला नेता बनाने का प्रस्ताव रखा था, जिसे तुरंत सर्वसम्मति से मंजूरी मिल गई थी


क्या थी मर्डर की कहानी 
अब आते हैं मर्डर की कहानी पर. ये मर्डर रमेश किनी का हुआ था. 1996 में ये हत्या हुई. रमेश मिडिल क्लास आदमी थे. कथित तौर पर शिवसेना के लोग उनका फ्लैट चाहते थे. रमेश को धमकाया गया. उनकी लाश एक सिनेमा हॉल में मिली. रमेश की पत्नी शीला ने राज ठाकरे पर हत्या का आरोप लगाया. मामला सीबीआई में गया. राज से पूछताछ हुई. हालांकि वो बच गए.

फिर शुरू हो गई राज के लिए उल्टी गिनती 
जब ये बात बाल ठाकरे तक पहुंची तो वो राज से खासे नाराज हुए. उन्होंने गुस्से घोषणा की ‘मैं शिवसेना छोड़ रहा हूं.’ फिर उन्हें मनाया गया. वो मान गए लेकिन राज ठाकरे के लिए उल्टी गिनती शुरू हो गई. जो फिर राज ठाकरे के पार्टी छोड़ने के साथ खत्म हुई.

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First published: November 28, 2019, 5:42 PM IST
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