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आजादी के बाद कैसा हिंदुस्तान मिला था सरदार पटेल को

विभाजन से पहले ब्रिटिश राज में भारत (फाइल फोटो)

विभाजन से पहले ब्रिटिश राज में भारत (फाइल फोटो)

पटेल को ऐसा हिंदुस्तान मिला था जो सैकड़ों टुकड़ों में बंटा था. कई रियासतों के राजा किसी भी हाल में स्वतंत्र ही रहना चाहते थे

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जब अंग्रेजों के भारत छोड़ने का समय आया तो देश में 550 से ज्यादा छोटी-बड़ी रियासतें और स्वतंत्र राज्य थे. ये छोटे-बड़े राज्यों, रजवाड़े और देशी रियासतों के रूप में थे. कुछ रियासतों ऐसी भी थीं, जो चंद गांवों तक सिमटी हुई थीं. इनका क्षेत्रफल अगर मिला दें तो ये मौजूदा भारत के कुल क्षेत्रफल के आधे से कहीं ज्यादा था. इन्हें खत्म करके भारत में मिलाने की भी अपनी एक कहानी है.

माउंटबेटन ने देशी राज्यों को सलाह दी कि भौगोलिक स्थिति के अनुकूल वो भारत या पाकिस्तान उपनिवेशों के साथ मिल जाएं. साथ ही उन्हें चेतावनी दी गई कि 15 अगस्त के बाद उन्हें ब्रिटेन से कोई प्रश्रय नहीं मिलेगा. राजाओं ने ये सलाह आमतौर पर मान ली लेकिन कुछ राजा इसके खिलाफ थे. इसकी अगुवाई भोपाल के नवाब कर रहे थे.

इन्हें एक शख्स भड़का रहा था, वो थे मोहम्मद अली जिन्ना. उन्होंने राजाओं से वादा किया था कि वो कराची को मुक्त बंदरगाह के तौर पर इस्तेमाल कर सकते हैं. भोपाल से कराची तक की कड़ी में एक ही अड़चन थी, उदयपुर.
उदयपुर के महाराजा ने इस साजिश में शरीक होने से इनकार कर दिया था. उन्होंने कहा-अगर हमारे पुरखे मुगलों का साथ देते तो आज हमारा राज्य जयपुर और जोधपुर से कहीं ज्यादा बड़ा होता. भारतवर्ष के प्राचीनतम राजघराने के इस कदम ने महाराणा प्रताप के वंश का मान रख लिया. उदयपुर के तत्कालीन महाराणा ने अपने पितामह का ये सपना पूरा करने में सहयोग दिया कि भारत विदेशी दासता से मुक्त हो.

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तीन रियासतों ने कर दिया इनकार
तीन रियासतें अभी बची थींं, जिन्होंने भारत के साथ विलय के समझौते पर दस्तखत करने से इनकार कर दिया. हैदराबाद के निजाम ने ब्रिटेन को इस बात पर मजबूर करने की नाकाम कोशिश की कि उनकी रियासत को स्वतंत्र राजा माना जाये. कश्मीर के महाराजा भी भारत या पाकिस्तान में से किसी में शामिल होने से इनकार करते रहे. तीसरे और आखिरी राजा यानि जूनागढ़ के नवाब. उन्होंने फैसला किया कि या तो वो स्वतंत्र रहेंगे या फिर पाकिस्तान में शामिल हो जाएंगे.

सरदार पटेल ने जब भारत का एकीकरण शुरू किया तो कई ऐसी रियासतें थीं, जो भारत में विलय नहीं करना चाहती थीं (फाइल फोटो)


कुछ राजाओं ने काफी नाटक किया
कुछ राजाओं ने विलय पर हस्ताक्षर तो किये लेकिन काफी नाटक भी किया.रजवाड़ों और रियासतों के विलय पर वी पी मेनन की किताब इंटेग्रेशन एंड द इंडियन स्टेट (भारतीय राज्यों का एकीकरण) में इसका विस्तार से जिक्र है. देशी रजवाड़ों की संख्या करीब 565 के आसपास बताई जाती है. उनका आकार और हैसियत अलग अलग तरह की थी. एक ओर कश्मीर और हैदराबाद जैसे विशाल रजवाड़े थे जो यूरोप के किसी देश के बराबर थे, दूसरी ओर ऐसी छोटी जागीरें और जमींदारियां भीं, जो एक से दो दर्जन गांवों तक सिमटीं थीं.

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क्या कहा था ब्रिटेन ने रियासतों से
भारत की स्वतंत्रता में राजशाही का कोई विशेष योगदान नहीं था. बहुत से शासक केवल नाम मात्र के शासक थे. छोटे-छोटे रजवाड़े अपने किलों में या दरबारों में अपनी प्रशंसा कराके ही खुश हो जाते थे. उनके भीतर ये इच्छा जरूर थी कि स्वतंत्र भारत में शायद वो भी अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाये रख सकेंगे. स्वतंत्र भारत में वह भी अपनी स्वतंत्रता खोज रहे थे.
उनकी ये इच्छा उस समय और बलवती हो गयी, जब अंग्रेजों ने भारतीय रियासतों को अधिकार दे दिया कि वह चाहें तो भारत के साथ जा सकती हैं, चाहें तो पाकिस्तान के साथ जा सकती हैं और यदि चाहें तो अपना स्वतंत्र अस्तित्व भी बचाये रख सकती हैं लेकिन ब्रिटेन स्वतंत्र रियासतों में किसी को भी अलग देश के रूप में मान्यता नहीं देगा.

बहुत से राजा खुद को स्वतंत्र देखना चाहते थे
बहुत से राजाओं ने स्वतंत्रता मिलते ही अपने को स्वतंत्र घोषित करने के सपने देखने शुरू कर दिये. रामपुर और पालनपुर के मुस्लिम नवाब ऐसे शासक थे जिन्होंने बिना देर किए और संकोच के भारतीय संघ में मिलने की घोषणा कर दी. जबकि मंगरोल के शासक ने कुछ हिचकिचाहट के साथ अपना अस्तित्व भारतीय संघ के साथ विलीन कर दिया.

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टोंक रियासत के नवाब को जूनागढ़ के नवाब ने भडक़ाने का प्रयास किया. मुस्लिम लीगी नेता भी उसे पाकिस्तान के साथ विलय करने के लिए प्रोत्साहित कर रहे थे. उसे सरदार पटेल ने उधर जाने से रोक लिया.

जिन्ना कई भारतीय रियासतों को भड़का रहे थे. पटेल ने उन्हें अपनी मर्जी का करने से रोका (फाइल फोटो)


किस तरह नेहरू राजाओं से चिढ़े हुए थे
रजवाड़ों के मुद्दे पर नेहरू के अपने ठोस विचार थे. वह सामंती तानाशाही और आम जनता के आंदोलनों का पूरी तरह दमन किए जाने के खिलाफ थे. वह इन महाराजाओं के सम्राट बनने की मानसिकता से चिढ़े हुए थे. राजे-महराजे नेहरू से भय खाते और उन्हें नापसंद करते थे. सौभाग्य से कांग्रेस ने इन रजवाड़ों की समस्या के समाधान का जिम्मा प्रशासनिक कार्यों में सख्त माने जाने वाले वल्लभ भाई पटेल को सौंप रखा था. सरदार पटेल ने भारतीय नरेशों से बड़ी सावधानी से वार्तालाप किया. इस बात का पूरा ध्यान रखा कि किसी भी राजा के सम्मान को चोट न लगे और वह हमारी बात को भी मान ले.

कौन से राजा सबसे पहले पटेल के पक्ष में आए
बीकानेर के महाराजा उन राजाओं में एक थे जो सबसे पहले पटेल के पक्ष में आ गए. उनके दीवान का नाम के एम पणिक्कर था, जो बहुत प्रसिद्ध इतिहासकार थे. पणिक्कर ने दूसरों की तुलना में पहले ही भांप लिया था कि राष्ट्रवादी ताकतों को रोकना अब असंभव है और जिसने इनके साथ समझौता नहीं किया वो इतिहास के बियावान में खो जाएगा. अप्रैल 1947 में बीकानेर ने अन्य दूसरे रजवाड़ों से अपील की कि वो संविधान सभा में शामिल हो जाएं.

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हालांकि संविधान सभा में शामिल होने वाला पहला राज्य बड़ौदा था. वह फरवरी में ही संविधान सभा में आ चुका था. पणिक्कर की अपील के बाद दर्जनों रियासतों ने संविधान सभा में शामिल होने का फैसला किया.

क्या सोच रही थीं पाकिस्तान की सीमावर्ती रियासतें
बीकानेर समेत राजस्थान के कई राजपूत रियासतों की सीमा पाकिस्तान से मिलती थी. मुसलमान राजाओं के साथ अतीत में हुए युद्धों ने उनको मजबूर कर दिया कि वे कांग्रेस से समझौता कर लें. लेकिन कई रियासतें ये भी सोच रही थीं कि अंग्रेजों के जाने के बाद दिल्ली की सत्ता बहुत मजबूत नहीं होगी, बहुत सारे इलाकों पर वह शायद ही अपना प्रभाव जमा पाए. लिहाजा उन्हें हालात स्वतंत्र राज्यों के अनुकूल ज्यादा लग रहे थे.

फिर पटेल को मिला तेज दिमाग का एक मलयाली
27 जून को भारत सरकार द्वारा एक नये राज्य विभाग का गठन किया गया. ये विभाग पटेल को सौंपा गया. उन्होंने वीपी मेनन को अपना सचिव चुना, जो मालाबार से ताल्लुक रखने वाले एक नाटे कद के चौकन्ने किस्म के और बहुत तेज दिमाग के मलयाली थे. उन्होंने भारत सरकार के साथ अपना करियर एक क्लर्क के रूप में शुरू किया था.तरक्की करते हुए ऊपर तक पहुंचे थे.

त्रावनकोर ने तो अपनी स्वतंत्रता की घोषणा ही कर दी थी लेकिन बाद में हालात ने उसे खुद भारत में आने के लिए मजबूर कर दिया (फाइल फोटो)


त्रावणकोर ने दिखाई थी आंखें
1947 में आजादी से पहले तक वीपी मेनन ने भी पूरे हिंदुस्तान का दौरा करके रजवाड़ों को विलय के लिए राजी किया. 15 अगस्त तक लगभग सारी देसी रियासतों ने विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए लेकिन कुछ ने खुद को स्वतंत्र रखने की इच्छा जाहिर की थी और ऐसा किया भी था.

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त्रावणकोर पहली रियासत थी जिसने अंग्रेजी राज के बाद कांग्रेस उसके उत्तराधिकारी होने पर सवाल उठाया था. इस रजवाड़े में देश के सबसे शिक्षित लोग रहते थे. इस राज्य के दीवान सर सी पी रामास्वामी अय्यर थे. माना जाता था कि अय्यर ही त्रावणकोर के असली शासक हैं. वहां के महाराजा और महारानी उनके हाथों की कठपुतली सरीखे थे.

फरवरी 1946 में ही सर सीपी रामास्वामी ने साफ कर दिया था कि जब अंग्रेज भारत छोड़ेंगे तो त्रावणकोर एक स्वतंत्र राज्य बन जाएगा. त्रावणकोर की आजादी की इच्छा का मोहम्मद अली जिन्ना ने समर्थन किया. रामास्वामी 21 जुलाई को माउंटबेटन से मिले. उनका दो-टूक जवाब था कि वो भारत के साथ विलय नहीं करेंगे बल्कि एक स्वतंत्र समझौता करना पसंद करेंगे.

फिर इस तरह त्रावणकोर भारत में मिला
त्रावणकोर में 1934 से ही आजादी के लिए आंदोलन चल रहा था. दीवान जब दिल्ली में त्रावणकोर को स्वतंत्र राज्य बनाने का फैसला सुनाकर लौटे तो यहां की स्थिति और अराजक हो गई.27 जुलाई को सेना की वर्दी एक व्यक्ति ने उनपर हमला किया, जो केरल सोशलिस्ट पार्टी का कार्यकर्ता था. रामास्वामी इस हमले और राज्य की ताजा स्थिति से इतने हिल गए कि उन्होंने अस्पताल के बिस्तर पर लेटे लेटे ही राजा को भारत सरकार से समझौते की राय दे दी. 30 जुलाई को त्रावनकोर के महाराजा उथरादोम तिरुनल मार्तंड वर्मा ने वायसराय को भारतीय संघ में विलय पर हस्ताक्षर करने संबंधी अपना संदेश भेज दिया.

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भोपाल ने भरपूर कोशिश की स्वतंत्र रहने की
15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता मिलने के बाद भोपाल के नवाब ने अपने चैम्बर ऑफ प्रिंसेस को अधिकृत कार्यरत घोषित कर दिया. भोपाल के नवाब 25 जुलाई 1947 की उस बैठक में भी नहीं गए थे, जो माउंटबेटन ने दिल्ली में बुलाई थी.

भोपाल के नवाब ने भरपूर कोशिश की कि वो भारत में नहीं मिलें. इसके लिए उन्होंने ब्रिटेन की महारानी को तरह तरह से भरोसे में लेने की कोशिश की (फाइल फोटो)


भोपाल मध्य भारत में स्थित था. वहां बहुसंख्यक हिंदू जनता थी और एक मुस्लिम शासक था. उन्हें कांग्रेस का कटु विरोधी और जिन्ना और लीग का नजदीकी माना जाता था.
भोपाल के नवाब ने अपने सलाहकार को लंदन भेजकर भरपूर कोशिश की वह भोपाल को स्वतंत्र राज्य बनाकर रख सकें. उन्होंने खुद को स्वतंत्र रखने के लिए अजीबोगरीब तर्क दिए. आखिरकार बाद में वो कुछ हिचकिचाहट के बाद विलय के लिए मान गए.

सरदार पटेल ने नवाब को अपनी उदारता और विनम्रता का जवाब यों दिया-स्पष्ट बात तो यह है कि आपकी रियासत के भारतीय राष्ट्र में विलय को मैं न अपनी जीत मानता हूं और न ही आपकी हार. आखिरकार विजय न्याय एवं उपयुक्तता की हुई है. इस विजय में मैंने और आपने अपनी-अपनी भूमिका ही निभाई है.

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जूनागढ़ का क्या हुआ
अब जूनागढ़ की ओर आते हैं. यहां के शासक ने जिन्ना की बातों में आकर पाकिस्तान के साथ जाने का निर्णय लिया. जिन्ना ने इस रियासत के नवाब को केवल भारत को तंग व परेशान करने के लिए ही उपसाया था. इस रियासत के दीवान शाहनवाज भुट्टो के पिता थे. वह रियासत को भारत के साथ जाने देने के घोर विरोधी थे.

जूनागढ़ ने शुरू में आंखें दिखाईं लेकिन बाद में उसका नवाब पाकिस्तान भाग गया (फाइल फोटो)


यद्यपि उनके ऐसे प्रयास सरदार पटेल के लौह व्यक्तित्व और बुद्धि चातुर्य के सामने जल्दी ढीले पड़ गये.जूनागढ़ के नवाब पाकिस्तान भाग गए. वह इतने भयभीत हो गए थे कि अपनी एक बेगम का हवाई अड्डे पर इंतजार भी नहीं किया. उन्हें छोडक़र ही चला गया. 20 फरवरी 1948 को जूनागढ़ की जनता ने जनमत के माध्यम से भारत के साथ विलय कर दिया.

हैदराबाद में हुई कार्रवाई
अब आते हैं हैदराबाद की रियासत पर. हैदराबाद की रियासत की जनसंख्या का 80 प्रतिशत भाग हिंदू था. अंग्रेज़ों के दिनों में भी हैदराबाद की अपनी सेना, रेल सेवा और डाक तार विभाग हुआ करता था. हैदराबाद के निजाम भारत में विलय के किस क़दर खिलाफ थे, इसका अंदाज़ा इससे लगाया जा सकता है कि उन्होंने जिन्ना को संदेश भेजकर ये जानने की कोशिश की थी कि क्या वह भारत के खिलाफ लड़ाई में हैदराबाद का समर्थन करेंगे?

हैदराबाद में सैन्य कार्रवाई के बाद निजाम ने विलय पर मुहर लगा दी (फाइल फोटो)


पटेल को अंदाज़ा था कि हैदराबाद पूरी तरह से पाकिस्तान के कहने में था. यहां तक कि पाकिस्तान पुर्तगाल के साथ हैदराबाद का समझौता कराने की फिऱाक़ में था जिसके तहत हैदराबाद गोवा में बंदरगाह बनवाएगा और ज़रूरत पडऩे पर वो उसका इस्तेमाल कर सकेगा. पटेल ने लगातार निजाम से भारत में विलय की बात कही और हर बार निजाम ने इसे ठुकरा दिया. आखिरकार सितंबर 1948 में सैन्य कार्रवाई से पटेल ने हैदराबाद को भारत में मिलाया.

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