कोरोना में सबसे उपयोगी साबित हो रहे हैं साबुन, किसने की थी सबसे पहले इसकी खोज

कोरोना में सबसे उपयोगी साबित हो रहे हैं साबुन, किसने की थी सबसे पहले इसकी खोज
कोरोना काल में लोगों की जिंदगियां बचाने वाले इस साबुन की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है.

कोरोना संक्रमण (Corona Infection) से बचाव में साबुन से हाथ धुलना (Hand wash with soap) बेहद कारगर तरीका है. इस महामारी से लोगों को दूर रखने वाले साबुन का इतिहास 4500 साल पुराना है.

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वैश्विक महामारी कोरोना के खिलाफ इस वक्त सबसे कारगर हथियार साबुन साबित हो रहे हैं. इस महामारी को लेकर शुरुआत से विश्व स्वास्थ्य संगठन समेत देशों की सरकारें लोगों को आगाह करती रही हैं कि हर कुछ समय अंतराल पर साबुन से हाथ जरूर धुलें. सैनेटाइजर के इस्तेमाल की भी हिदायत दी गई है लेकिन सबसे ज्यादा कारगर साबुन को ही माना गया है. कोरोना काल में लोगों की जिंदगियां बचाने वाले इस साबुन की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है. पश्चिमी एशिया में साबुन के निर्माण के प्रमाण तकरीबन 4500 साल पुराने हैं.

4500 साल पुराना है साबुन का इतिहास
साबुन बनाने के समय और जगह पर तो काफी रिसर्च हुई है लेकिन उस व्यक्ति के बारे में सटीक जानकारी नहीं है जिसने पहली बार इसे बनाया. टाइम मैगजीन में प्रकाशित एक स्टोरी में साबुन बनाने वाली महिला को निनी नाम दिया. निनी नाम देने का कारण सुमेरियन सभ्यता में दवा की देवी निनीसिना हैं. मैगजीन ने अविष्कारक को महिला इसलिए माना है क्योंकि जिस सुमेरियन सभ्यता के बाजार में साबुन के सबसे पहले निर्माण की बात की जाती है उस पर महिलाओं का कब्जा था. सुमेरियन सभ्यता का विकास आज के दक्षिणी इराक में हुआ था.

सुमेर सभ्यता में साबुन के पहले प्रमाण मिलते हैं.

निनी का जन्म मशहूर गीजा के पिरामिड के निर्माण के आस-पास माना जाता है. Women in Ancient Mesopotamia किताब की लेखक और स्कॉलर नेमेत निजात के मुताबिक निनी एक पितृसत्तात्मक समाज में पली पढ़ी थी. एक्सपर्ट का मानना है कि निनी एक सामान्य परिवार में पैदा हुई लड़की थी जो बाद में किसी कपड़ा बाजार में काम करने लगी. माना जाता है कि इसी बाजार में पहली बार साबुन का आविष्कार हुआ. केमिकल आर्कियोलॉजिस्ट मार्टिन लेवी के मुताबिक दुनिया में पहली बार साबुन के इस्तेमाल का वर्णन गिरसू शहर में ही आता है. जो सुमेरियन सभ्यता का हिस्सा था.



बेबीलोन में भी मिलते हैं प्रमाण
इसके अलावा 2800 ईसा पूर्व में प्राचीन बेबीलोन में भी साबुन का जिक्र मिलता है. बेबिलोनिया से मिले प्रमाणों के मुताबिक इस साबुन के निर्माण में पानी, दालचीनी के तेल और क्षार के इस्तेमाल का जिक्र है. मिस्र में तो एक पुरातन साक्ष्य के मुताबिक 1550 ईसा पूर्व में साबुन का इस्तेमाल प्रचुरता से होने लगा था. लोग हर दिन इसका इस्तेमाल करते थे. इस साबुन का निर्माण वेजिटेबल ऑयल और एनिमल ऑयल के जरिए किया जाता था.

साबुन के जरिए दिया गया स्वच्छता का संदेश, फैला व्यापार
ये वो दुनिया के शुरुआती प्रमाण हैं जहां पर साबुन का इस्तेमाल होता दिखता है. इसके अलावा बाद के दिनों में प्राचीन चीन, इजरायल, अरब, रोम में भी इसका इस्तेमाल होने लगा. 15वीं शताब्दी साबुन के इंडस्ट्री के रूप में विकसित होने के प्रमाण हैं. 1525 में फ्रांस के मरसेलिस में साबुन बनाने की दो फैक्टरियां काम कर रही थीं. 18वीं, 19वीं और 20वीं शताब्दी में तो साबुन दुनियाभर के हर कोने में पहुंच चुका था. लोग इसका कम या ज्यादा इस्तेमाल करने लगे थे. 20वीं शताब्दी में दुनिया की बड़ी कंपनियों ने स्वच्छता को प्रोत्साहित करने के लिए दुनियाभर में साबुन के साथ अपने व्यापार का विस्तार भी किया.

अभी तक कोरोना से बचने के लिए कोई दवाई और वैक्सीन नहीं खोजी जा सकी है लेकिन साबुन सबसे बेहतर उपाय है. साबुन में एमीफिफिल्स जैसे अव्यव मौजूद होते हैं. जो वायरस को खत्म करने का काम करते हैं. साबुन से हाथ धोने से लिपिड लेयर खत्म होती है और वायरस से संक्रमण का खतरा भी कम होता है.
अभी तक कोरोना से बचने के लिए कोई दवाई और वैक्सीन नहीं खोजी जा सकी है लेकिन साबुन सबसे बेहतर उपाय है. साबुन में एमीफिफिल्स जैसे अव्यव मौजूद होते हैं. जो वायरस को खत्म करने का काम करते हैं. साबुन से हाथ धोने से लिपिड लेयर खत्म होती है और वायरस से संक्रमण का खतरा भी कम होता है.


क्यों सबसे ज्यादा कारगर है साबुन
कोरोना वायरस को लेकर जितने भी बचाव के उपाय बताए जा रहे हैं उनमें साबुन से हाथ धोना से सबसे अहम है. सरकारी विज्ञापनों में भी लगातार इस बात को दोहराया जा रहा है. आखिर साबुन से हाथ धुलने में ऐसा क्या खास है जो ये कोरोना के खिलाफ सबसे कारगर हथियार बन गया है.

वायरस का स्ट्रक्चर
ज्यादातर वायरस का स्ट्रक्चर मूलत: तीन चीजों से बना होता है. आरएनए, प्रोटीन और लिपिड. ये तीनों परतें मिलकर वायरस का निर्माण करती हैं. लिपिड बाहरी परत का निर्माण करता है और वायरस के स्ट्रक्चर को बनाए रखने में मदद करता है. लेकिन वायरस के स्ट्रक्चर में लिपिड की ये बाहरी परत ही सबसे कमजोर कड़ी होती है. अब चूंकि बाहरी परत ही इसकी सबसे कमजोर कड़ी है इस वजह से इस स्ट्रक्चर को तोड़ने के लिए किसी ज्यादा तेज केमिकल की जरूरत नहीं पड़ती है. आम प्रचलन में चल रहे सामान्य साबुन में मौजूद केमिकल्स इसे खत्म करने के लिए पर्याप्त होते हैं.

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प्रतीकात्मक तस्वीर


सतह पर कैसे प्रभावी होता है ये वायरस
ज्यादातर वायरस, जिनमें कोरोना भी शामिल है, 50-200 नैनोमीटर के बीच होते हैं. सच कहा जाए तो नैनो पार्टिकल्स की तरह है. जब किसी व्यक्ति की छींक, खांसी से निकले हुए कण सतह पर गिरते हैं तो उसमें मौजूद पानी तो सूख जाता है लेकिन वायरस बने रहते हैं. लकड़ी, कपड़े और त्वचा पर ये वायरस ज्यादा आसानी से और ज्यादा समय तक बने रहते हैं. इसके विपरीत स्टील और प्लास्टिक पर अपेक्षाकृत वायरस कम प्रभावी होती हैं. खुरदुरी सतह पर वायरस सबसे कम काम करता है लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि ये पूरी तरह से सेफ है. वायरस के लिए सबसे आइडियल जगह त्वचा है.

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