वो शख्स, जिसने अमेरिका से आकर कंपनी बनाई, अब बनी स्वदेशी वैक्सीन

वैज्ञानिक डॉ कृष्णा एल्ला (Photo-फ़र्स्टपोस्ट)

भारत बायोटेक के लगभग 65 साल के एमडी और वैज्ञानिक डॉ कृष्णा एल्ला (Krishna Ella, Bharat Biotech) ने कम कीमत की असरदार वैक्सीन पर काफी काम किया. अब वे कोवैक्सीन (Covaxin) के लिए चौबीसों घंटे काम कर रहे हैं.

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    नए साल की शुरुआत पर देश में भी कोवैक्सीन (Covaxin) के सीमित इस्तेमाल को मंजूरी मिल गई. भारत बायोटेक फार्मा कंपनी के तहत बनी इस वैक्सीन को लेकर हालांकि विपक्ष कई सवाल कर रहा है. इस बारे में सफाई के लिए कंपनी के एमडी कृष्णा एल्ला खुद सामने आए और अपना पक्ष मजबूती से रखा. लगभग 65 साल के वैज्ञानिक कृष्णा एल्ला इस वैक्सीन के निर्माण में 9 महीनों से रात-दिन एक किए हुए हैं.

    कोवैक्सीन पर सवाल खड़े होने पर कुछ ही रोज पहले एमडी कृष्णा एल्ला ने एक प्रेस वार्ता के दौरान कहा- मैं विज्ञान की ही सांस लेता हूं, विज्ञान ही जीता हूं और विज्ञान से ही मुझे ताकत मिलती है. ये बात कृष्णा की रुटीन को देखते हुए साफ पता चलती है. लगभग 9 महीने पर जब कोरोना वैक्सीन का जीनोम पकड़ा गया, उसके बाद से ही वे हैदराबाद स्थित अपनी लैब में रह रहे हैं. वहां चौबीसों घंटे बिताते इस वैज्ञानिक का कहना है कि वैक्सीन की जांच एक बार पूरी हो जाने दीजिए, उसके बाद अगर मैं गलत हुआ तो पुलिस में मेरी रिपोर्ट कर दीजिए.

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    कोवैक्सीन की निर्माता कंपनी के एमडी और वैज्ञानिक डॉ कृष्णा एल्ला (Photo-moneycontrol)


    इतने यकीन से बोल पाने के पीछे है डॉ एल्ला का वैक्सीन निर्माण का लंबा इतिहास. वे विस्कॉन्सिन मेडिसन यूनिवर्सिटी और मनोआ स्थित हवाई यूनिवर्सिटी में शिक्षा लेने के साथ ही दक्षिण कैलिफोर्निया की मेडिकल यूनिवर्सिटी में काम भी कर चुके हैं. 1996 में उन्होंने पत्नी डॉ. सुचित्रा ऐल्ला के साथ मिलकर अपनी कंपनी शुरू की थी, जिसमें अब हजारों कर्मचारी काम करते हैं. कोवैक्सिन से पहले उनकी कंपनी भारत बायोटेक चिकनगुनिया, जीका, रोटावायरस, रेबीज, जापानी इंसेफलाइटिस और H1N1 के खिलाफ भी वैक्सीन बना चुकी है.



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    वैसे प्रशिक्षण के लिहाज से देखें तो डॉ एल्ला एक एग्रीकल्चर वैज्ञानिक हैं. जैसा कि उन्होंने हाल ही में कई जगहों पर बताया कि उनका पूरा परिवार खेती-किसानी से जुड़ा रहा. तमिलनाडु के वेल्लोर जिले में जन्मे इस डॉक्टर की पारिवारिक पृष्ठभूमि भी साधारण रही. उनके पहले कोई किसी बिजनेस में नहीं था. पढ़ाई में तेज होने के कारण डॉ कृष्णा को आगे की पढ़ाई के लिए फैलोशिप मिल गई और वे अमेरिका चले गए.

    भारत लौटने और हैदराबाद में लैब बनाने से पहले वे वहां यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ कैरोलिना में पढ़ा रहे थे. भारत लौटने के पीछे उनकी प्रेरणा देश और परिवार रहा.

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    भारत बायोटेक लैब की ताजा चुनौती कोवैक्सीन का ट्रायल सही ढंग से पूरा करना और उसे सफल बनाना है- सांकेतिक फोटो (pixabay)


    लौटने के बाद एक वैज्ञानिक होने के नाते जो सबसे पहली बात उनकी नजर में आई, वो है वैक्सीन का काफी महंगे दामों पर मिलना. तभी उन्होंने देसी और कम कीमत वाली लेकिन उतनी ही असरदार वैक्सीन बनाने की सोची और ये कर भी दिखाया. लैब बनने के दो ही सालों के भीतर भारत बायोटेक चर्चा में आ गया. उन्होंने हेपेटाइटिस बी वैक्सीन तैयार की और दूसरे लैबों से लगभग 25 प्रतिशत कम कीमत पर उसे उपलब्ध कराया. तब साल 1998 में डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने इसे लॉन्च किया था.

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    वैक्सीन की दुनिया में जाना-माना नाम बन चुकी भारत बायोटेक लैब की ताजा चुनौती कोवैक्सीन का ट्रायल सही ढंग से पूरा करना और उसे सफल बनाना है. जैसा कि हमारी सहयोगी वेबसाइट मनीकंट्रोल में इस बारे में आया है. इसके लिए लैब ने ICMR का सहयोग लिया और 9 महीनों से काम कर रही है.

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    बता दें कि वैज्ञानिक और लैब में काम करने वाले लोग सुरक्षित रहें, इसके लिए भी डॉ एल्ला के यहां पूरे इंतजाम हैं. भारत बायोटेक के पास लेवल-3 सेफ्टी लैब है, जो देश में इस लेवल की सबसे बड़ी लैब है. रिसर्च करना किसी टीके को बनाने का सबसे अहम हिस्सा है. इसके लिए भी डॉ एल्ला और उनकी टीम ने पूरा बजट बनाया. साल 2021 में वे लगभग 100 करोड़ रुपए रिसर्च और क्लिनिकल ट्रायल पर लगा रहे हैं.

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    फिलहाल तो कोवैक्सीन के दो डोज वाले टीके तैयार हुए हैं, लेकिन डॉ एल्ला की लैब इससे आगे के चरण पर भी काम कर रही है. वे मिसौरी में वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन से भी जुड़ चुके हैं ताकि आने वाले समय में कोरोना वैक्सीन की केवल एक खुराक दी जा सके, वो भी नाक से.

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