हार्वर्ड पास युवा लिचोम्बम इरेंद्रो, जिन पर कभी राजद्रोह लगा तो कभी रासुका

लिचोम्बम इरेंद्रो (फाइल फोटो)

कौन हैं मणिपुर के एक्टिविस्ट लिचोम्बम इरेंद्रो (Lichombam Erendro) , जिनकी रिहाई के लिए सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने मणिपुर सरकार (Manipur state government) पर तल्ख टिप्पणी की. 40 साल ये युवा अब देशभर में चर्चित हो चुका है. हालांकि उन्हें जिस मामले में रासुका (NSA) लगाकर मई से जेल में रखा गया था, वो बहुत मामूली पोस्ट लगती है.

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    फेसबुक के पेज पर लिचोम्बम इरेंद्रो की ब्लैक एंड व्हाइट मुस्कुराती हुई तस्वीर हैं. जिसकी ज्यादातर पोस्ट में वो नागरिक अधिकारों और अभिव्यक्ति की आजादी की बात करते हैं. 40 साल के इरेंद्रो सुप्रीम कोर्ट के उन्हें तुरंत रिहा करने के फैसले के बाद देशभर में चर्चा में आ गए हैं. लोगों की उत्सुकता उनके बारे में जानने की है कि वो हैं कौन, क्या करते रहे हैं.

    मई में रासुका के तहत उनकी गिरफ्तारी एक ऐसी फेसबुक पोस्ट पर की गई, शायद ज्यादा से ज्यादा हल्की धारा से ज्यादा कुछ नहीं लग सकती थी. उन्होंने मणिपुर के बीजेपी अध्यक्ष रिटायर्ड प्रोफेसर तिरेंद्र सिंह के निधन के बाद एक पोस्ट फेसबुक पर डाली, कोरोना का उपचार गोबर या गोमूत्र में नहीं है. उसका उपचार साइंस और कामनसेंस में है. प्रोफेसर जी आरआईपी.

    पोस्ट पर बीजेपी नाराज हो गई
    बस उनकी इस पोस्ट पर राज्य के बीजेपी नेता बिफर गए. उनकी गिरफ्तारियों की मांग होने लगी. तब देखते ही देखते उन पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया गया. जब स्थानीय अदालतों में सुनवाई नहीं हुई तो उनके परिजनों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. वहां से उन्हें न्याय मिला.

    यहां अति ये भी है कि जब इस फेसबुक पोस्ट पर गिरफ्तारी के चार दिनों बाद इम्फाल कोर्ट ने उन्हें जमानत दे दी तो इम्फाल के जिलाधिकारी ने उनपर रासुका लगा दी.

    सुप्रीम कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी की
    सुप्रीम कोर्ट ने उनकी रिहाई के लिए जितनी तल्ख तरीके से मणिपुर सरकार पर टिप्पणी की कि वो ना केवल राज्य सरकार बल्कि देशभर की उन सभी सरकारों और व्यवस्थाओं पर करारी चोट भी है, जो आजकल पत्रकारों, एक्टिविस्ट और बेधड़क अपनी बात कहने वालों को राजद्रोह या रासुका या अन्य धाराओं में जेल भेज रहे हैं.

    हावर्ड से पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में पोस्ट ग्रेजुएट
    लिचोम्बाम ने हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में पोस्ट ग्रेजुएट डिग्री ली है. वो अच्छे और समृद्ध घर से ताल्लुक रखते हैं. शायद इसीलिए उनके परिवारवाले लगातार कानूनी लड़ाई के तैयार रहे और सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचे.

    इरोम शर्मिला के सहायक रह चुके हैं
    वह मणिपुर की जुझारू प्रदर्शनकारी रह चुकीं इरोम शर्मिला के सहयोगी भी रह चुके हैं. जो हमेशा राज्य में सेना के दमन और राज्य के लोगों की स्थिति पर आवाज उठाती रहती थीं.

    पहले भी हुए हैं मामले दर्ज
    इरेंद्रो पर ये पहला मामला दर्ज नहीं हुआ था. इससे पहले भी वो राज्य में लगातार किसी ना किसी मामले में चर्चा में रहते आए थे. मई 2018 में उन्हें तब हिरासत में ले लिया गया, जब उन्होंने एक वीडियो पोस्ट किया, जिसमें कुछ बिहारी युवा राज्य के लोगों को धमकी देते नजर आ रहे हैं. उनसे प्रशासन ने जब ये वीडियो हटाने के लिए कहा, तो उन्होंने मना कर दिया.

    राजद्रोह भी लगा
    फिर अगस्त 20 में फेसबुक पर ही एक कमेंट पर उनके खिलाफ राजद्रोह का केस लगा. हालांकि पुलिस ने हैरान भरे तरीके से उन्हें एक दिन बाद ही रिहा भी कर दिया. कुल मिलाकर वो राज्य सरकार और प्रशासन की निगाहों में खटकते से लगते हैं.

    कहते हैं संविधान जायज विरोध का हक देता है
    लिचोम्बम खुद को एक्टिविस्ट कहते हैं. उनका मानना है कि संविधान हमें हक देता है कि हम जायज तरीके से सरकार की आलोचना करें. ये हमारा अधिकार है. यही लोकतंत्र भी है. उन्होंने उसी दौरान ये भी कहा कि मणिपुर की सरकार हर किसी को शांत कर देना चाहती है, वो नहीं चाहती कि उसके खिलाफ कोई आवाज उठाई जा सके. ये तो ताकत का बेजा इस्तेमाल है.

    कलेक्टर ने उन्हें राज्य के लिए खतरा माना था
    जब उन्हें 17 मई को रासुका के तहत निरुद्ध किया गया तो इम्फाल के डीएम किरन कुमार ने इसी ठहराया. बकौल उनके ये सही कदम है. लिचोम्बम की गतिविधियां राज्य की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था को खतरे में डालने वाली हैं.

    पीपुल्स के नाम से संगठन भी बनाया है
    राज्य में युवा धीरे धीरे लिचोम्बम को पसंद करने लगे हैं. उन्हें लगता है कि उन्हें गलत तरीके से गिरफ्तार करके रखा गया है. वैसे तो इरेंद्रो राज्य में सभी सियासी दलों की आलोचना करते रहे हैं. उन्होंने हाल के बरसों में पीपुल्स नाम का एक सियासी संगठन भी खड़ा किया है.

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