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कौन है यह सऊदी एक्टिविस्ट, जिसे सालों प्रताड़ित कर अब आतंकी कहा गया

महिला अधिकार कार्यकर्ता लोजैन अल हथलोल.

महिला अधिकार कार्यकर्ता लोजैन अल हथलोल.

पहली-पहली बूंदों को तपती धरती पर गिरकर धुआं होना पड़ता है... अरब देश (Arab Country) के कड़े कानूनों (Saudi Arabian Laws) के बारे में आपने सुना होगा, लेकिन पिछले कुछ समय से यहां अधिकारों के लिए आवाज़ उठाने वालों को सुनियोजित ढंग से कुचला जा रहा है.

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    'लोजैन अल-हथलौल (Loujain Al-Hathloul) राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा हैं... देश के राजनीतिक सिस्टम को नाकाम करने की कोशिश कर रही हैं..' ये आरोप लगाकर लोजैन को सऊदी अरब के एक विशेष कोर्ट (SCC) ने अस्पष्ट आतंकवाद रोधी कानून (Counter Terrorism Law) के तहत पांच साल आठ महीने की कैद की सज़ा सुनाई. ये आरोप लग चुके हैं कि लोजैन को सालों से मनमाने ढंग से कैद, पीड़ित और नज़रबंद रखा जा चुका है. अब आतंकवादी कह दी गईं लोजैन कौन हैं और जानने की बात यह भी है कि क्या सऊदी में बोलने की आज़ादी (Freedom of Expression) नहीं रही?

    अंतर्राष्ट्रीय खबरों के मुताबिक सऊदी अरब की सबसे अहम महिला अधिकार कार्यकर्ता को अगर जेल में ठूंसे रखा गया तो अमेरिका के साथ सऊदी संबंध बिगड़ने की बात भी कही गई. लोजैन की बहन ने अदालत के फैसले को चुनौती देने की बात कही है. इस बीच जानिए कि यह महिला एक्टिविस्ट कौन है, जिसे लेकर देशों के बीच और सोशल मीडिया पर घमासान मचा है.

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    क्या है कैद की सज़ा और उस पर प्रतिक्रिया?
    लोजैन को सज़ा मिलने पर उनकी बहन लीना ने ट्वीट किया कि सज़ा सुनते ही सालों से प्रताड़ित लोजैन बिलख पड़ीं. 'सालों तक उन्हें परेशान किए जाने के बाद अब आतंकी का टैग उनके सिर पर लगा दिया गया'. दूसरी तरफ, अमेरिकी बार एसोसिएशन ने कहा कि 2008 में सऊदी अरब में जो स्पेशल क्रिमिनल कोर्ट बनाए गए, उनका मक़सद कुछ और था लेकिन अब उनके ज़रिये राजनीतिक असंतुष्टों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को निशाना बनाया जा रहा है.

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    लोजैन की कई तस्वीरें सोशल मीडिया से सामने आ रही हैं.


    एबीए के मुताबिक ये कोर्ट इसलिए बनाए गए थे ताकि 2003 में यूके में अलकायदा द्वारा किए गए आतंकी हमलों से जुड़े मामलों में बगैर आरोपों के बंधक रखे गए हज़ारों लोगों के ट्रायल चल सकें. हालांकि इसके बाद से ही इन अदालतों में अल्पसंख्यकों, एक्टिविस्टों और राजनीतिक विरोधियों के ट्रायलों का केसलोड बढ़ गया. लोजैन के खिलाफ फैसले में अदालत के मुताबिक कैद की मीयाद 2018 से मानी जाएगी, जब उन्हें पहली बार नज़रबंद किया गया था.

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    आखिर कौन हैं लोजैन?
    सऊदी अरब में पुरुषप्रधान व्यवस्था 'विलाया' के तहत हर महिला को जन्म से मौत तक किसी न किसी पुरुष को गार्जियन के तौर पर रखना अनिवार्य रहा. इसके अलावा, महिलाएं गाड़ी नहीं चला सकती थीं. पिछले साल ही संभव हुआ कि पुरुष गार्जियन की इजाज़त के बगैर महिलाओं को विदेश यात्रा की सुविधा मिली. पासपोर्ट आवेदन हो या शादी या तलाक की रजिस्ट्री, सबके लिए पुरुष गार्जियन ज़रूरी रहा यानी महिला अपनी मर्ज़ी से बहुत कुछ नहीं कर सकती.

    ऐसे तमाम मसलों पर आलोचना होती रही है और कट्टर व रूढ़िवादी प्रथाओं को मानवाधिकारों के खिलाफ बताया जाता रहा है. इन्हीं से जुड़ा मामला था, जब 2018 में पत्रकार जमाल खशोगी की क्रूर ढंग से हत्या तक कर दी गई थी. लोजैन पहली बार तब चर्चा में आई थीं, जब यूएई के ड्राइविंग लाइसेंस के साथ वो वहां से सऊदी अरब तक गाड़ी चलाकर आईं और 2014 में उन्हें इसके लिए 73 दिन कैद में रहना पड़ा.


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    यहां से लोजैन ने महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई शुरू की थी. 2018 में जब सऊदी अरब आखिरी देश बना, जिसने महिलाओं की ड्राइविंग पर लगे बैन को हटाया तो उससे पहले विरोध प्रदर्शन करने वाली कई महिलाओं के साथ ही लोजैन को भी गिरफ्तार किया गया था. 2015 में जब पहली बार महिलाओं को वहां वोट करने और चुनाव लड़ने की इजाज़त मिली तो लोजैन ने सऊदी अरब में चुनाव भी लड़ा था हालांकि उनका नाम चुनाव पत्र में शामिल न होने की रिपोर्ट्स भी थीं.

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    खशोगी हत्याकांड में सऊदी प्रिंस का हाथ होने की खबरें रही थीं.


    साल 2018 में लोजैन को राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े आधारों पर हिरासत में लिया गया. 10 महीने से ज़्यादा हिरासत के बावजूद उन पर न तो केस बना और न ही सुनवाई शुरू हुई. एमनेस्टी इंटरनेशनल की मानें तो हिरासत के दौरान लोजैन को बिजली के झटके दिए गए, यौन शोषण किया गया और रेप और हत्या तक की धमकी दी गई.

    तो क्या सऊदी अरब में बोलना गुनाह है?
    एक तरफ फैक्ट यह है कि ओपन सोसायटी की दिशा में सऊदी अरब में कुछ सुधार पिछले कुछ सालों में हुए हैं, लेकिन यह भी सच है कि लोजैन जैसे कई एक्टिविस्टों को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी है और यह सिलसिला जारी है. जो भी सिस्टम के खिलाफ बोलता है, पिछले कुछ समय में देखा गया कि उसे किस तरह निशाना बनाया जाता है.

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    सिस्टम के डर से अमेरिका में जाकर रहे पत्रकार जमाल खशोगी ने जुलाई 2018 में मीडिया से कहा था कि उनके लिखने और ट्वीट तक करने पर प्रतिबंध लगा दिया गया था. खशोगी ने अमेरिका से सऊदी लौटने के बारे में कहा था कि अगर उन्हें आज़ादी से जीने दिया जाए तो लौटेंगे. इसके बाद अक्टूबर 2018 में खशोगी की दर्दनाक हत्या हुई और सीआईए ने कहा कि हत्याकांड को सऊदी के प्रिंस सलमान ने अंजाम दिलवाया.

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    रैफ बदावी को सज़ा सुनाए जाने के खिलाफ दुनिया भर में विरोध प्रदर्शन हुए थे. (तस्वीर विकिकॉमन्स से साभार)


    खशोगी ही नहीं, ऐसे कई नाम हैं. सऊदी विद्वान सलमान अल औदा को देश में सामाजिक सुधारों की बात करने पर योजनाबद्ध ढंग से 37 मामलों में फंसाकर उन्हें मौत की सज़ा सुना दी गई. एमनेस्टी का एक आंकड़ा है कि सऊदी के क्राउन प्रिंस के 5 साल के कार्यकाल में 800 लोगों को मौत की सज़ा दी गई.


    उदारवाद और उदार मीडिया फोरम की पहल करने वाले ब्लॉगर रैफ बदावी को 10 साल की कैद की सज़ा दिए जाने के साथ ही 2015 में जेद्दा में सबके सामने कोड़े मारे गए थे. इस साल अप्रैल में मानवाधिकार आयोग ने कहा कि इस तरह की अमानवीय सज़ाएं खत्म की जा रही हैं. आपको पता है कि 2018 में बैन हटाए जाने से पहले अगर कोई महिला ड्राइविंग करे तो उसे भी कोड़े मारने की सज़ा के प्रावधान थे , वो भी अदालतों से.

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