भारतीय टीम के इस विकेटकीपर को मांगनी पड़ी थी भीख

ज्ञानोबा की बैटिंग टेस्ट क्रिकेट में ज्यादा नहीं चल पाई, इसीलिए वो अपने जीवन में दो टेस्ट मैच ही खेल पाए. एक बार जब टीम से बाहर हुए तो फिर कभी वापस नहीं आ सके.

Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: December 7, 2018, 1:29 PM IST
भारतीय टीम के इस विकेटकीपर को मांगनी पड़ी थी भीख
प्रतीकात्मक फोटो
Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: December 7, 2018, 1:29 PM IST
जब भारतीय क्रिकेट टीम ने 1932 में लार्ड्स के मैदान पर इंग्लैंड के खिलाफ पहला टेस्ट खेला तो भारतीय पारी में पहली गेंद का सामना ओपनर जनार्दन ज्ञानोबा नवेले ने किया. वह भारतीय क्रिकेट टीम के पहले टेस्ट विकेटकीपर थे. आखिरी दिनों में उनकी हालत इतनी खराब हो गई कि भीख मांगने की नौबत आ गई. उन्हें मुंबई-पुणे हाई-वे पर भीख मांगते हुए देखा गया. इसी हालत में उनकी मौत हुई. आज ज्ञानोबा का जन्मदिन है.

ज्ञानोबा 07 दिसंबर 1902 में महाराष्ट्र के फूलगांव में पैदा हुए थे. पांच फुट चार इंच का ये क्रिकेटर गजब का विकेटकीपर था. जब भारतीय टीम 1932 में पहला टेस्ट खेलने इंग्लैंड पहुंची तो वहां उसने कई प्रथम श्रेणी के मैच खेले. जिसमें जनार्दन की विकेटकीपिंग इतनी बढिया थी कि अंग्रेज भी उनकी तारीफ किए बगैर नहीं रह सके.

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केवल दो टेस्ट खेल पाए थे

ज्ञानोबा की बैटिंग टेस्ट क्रिकेट में ज्यादा नहीं चल पाई, इसीलिए वो अपने जीवन में दो टेस्ट मैच ही खेल पाए. एक बार जब टीम से बाहर हुए तो फिर कभी वापस नहीं आ सके.

दो टेस्ट मैचों में वो 42 रन बना सके. उनको सर्वोच्च स्कोर 13 था. इस दौरान उन्होंने एक कैच लिया.अलबत्ता प्रथम श्रेणी क्रिकेट में ज्ञानोबा का अच्छा था. उन्होंने 65 मैचों में 1976 रन बनाए, जिसमें नौ हाफसेंचुरी थी. अलबत्ता विकेटकीपर के रूप में उन्होंने 101 कैच लिये और 36 स्टंपिंग की.

भारत के पहले टेस्ट क्रिकेट विकेटकीपर जनार्दन ज्ञानोबा नवेले (फाइल फोटो)

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ओपनर बैट्समैन भी थे
जनार्दन भारत टेस्ट टीम के पहले ओपनर बैट्समैन भी थे. उन्होने लार्ड्स के उस पहले टेस्ट में दोनों पारियों में बैटिंग की शुरुआत की थी. साथ ही पहले टेस्ट विकेटकीपर के रूप में उन्होंने इंग्लैंड के कप्तान डगलस जार्डिन का कैच लपका.

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पूरे दौरे में उन्होंने कुल मिलाकर 41 कैच लिए. भारतीय टीम ने इस दौरे में 38 मैच खेले थे, जिसमें 26 फर्स्ट क्लास के मैच थे. पहले चार मैचों में कप्तानी महाराजा पोरबंदर ने की. फिर सीके नायडु को कप्तानी सौंप दी.

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किसान परिवार में पैदा
जनार्दन पुणे के रहने वाले थे. एक किसान परिवार में उनका जन्म हुआ. वह हाईस्कूल तक पढ़े थे. प्रथम श्रेणी की क्रिकेट में उनका जलवा था. उस समय उनकी जोड़ का कोई विकेटकीपर नहीं था.

ये कहा जाता है कि वह अपने जमाने के तेज गेंदबाजों के सामने जबरदस्त बैटिंग करते थे. इसलिए भारतीय टीम इंग्लैंड खेलने गई तो उन्हें पारी में ओपनर बल्लेबाज बनाया गया. हालांकि उनकी बैटिंग बहुत बढिया नहीं रही.

विकेटकीपिंग की तारीफ
जिस तरह से उन्होंने इंग्लैंड दौरे में विकेटकीपिंग की, उससे इंग्लैंड टीम के बड़े बड़े दिग्गज भी उनसे प्रभावित हुए बगैर नहीं रह सके. जैक हॉब्स जैसे लीजेेंड ने उनकी तुलना दुनिया के तीन बेहतरीन विकेटकीपरों में कर डाली.

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उन्होंने कहा कि जनार्दन गेंद पर बिजली की फुर्ती से झपटते थे. नेविल कार्ड्स ने विजडन में उनकी तारीफ करते हुए उन्हें उच्च दर्जे का विकेटकीपर बताया.

एक चित्रकार बनाई गई वो तस्वीर, जिसमें भारत की पहली टेस्ट के खिलाड़ियों के कैरिकेचर हैं, इसमें विकेटकीपर के रूप में जनार्दन ज्ञानोबा नवेले भी नजर आ रहे हैं (फाइल फोटो)


किस्मत साथ नहीं थी
शायद किस्मत उनके साथ नहीं थी. अगले साल जब इंग्लैंड टीम भारत दौरे पर आई. तो जनार्दन ने अपने जीवन का दूसरे टेस्ट मैच खेला. चूंकि वह ज्यादा रन नहीं बना सके, लिहाजा उन्हें टीम से बाहर कर दिया गया. फिर उन्होंने टीम में वापसी की बहुत कोशिश की लेकिन ऐसा हो नहीं पाया.

सुरक्षा गार्ड की नौकरी की
बताया जाता है कि ग्वालियर रियासत में ज्ञानोबा की नौकरी लग गई थी. लेकिन कुछ समय बाद ही वह इसे छोड़कर वापस पुणे अपने घर चले गए. जहां उन्होंने एक चीनी मिल में सुरक्षा गार्ड की नौकरी कर ली. चूंकि वह मालूम पृष्ठभूमि से थे लिहाजा धीरे धीरे अपने समकालीन क्रिकेटरों से उनका संपर्क खत्म हो गया. उन्हें सुरक्षा गार्ड के रूप में ज्यादा पैसे नहीं मिलते थे. पुणे में उनके पास दो कमरे का एक छोटा सा फ्लैट था.

भारत की पहली टेस्ट टीम, जो 1932 में इंग्लैंड के दौरे पर गई थी (फाइल फोटो)


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बुढापा घनघोर तंगी में गुजरा
कुल लोगों का कहना है कि आखिरी दिनों में उनके पास पैसे की घनघोर तंगी तो थी क्योंकि नौकरी से बहुत ज्यादा धन उन्होंने नहीं कमाया था. उस जमाने में क्रिकेट बोर्ड भी आज की तरह पुराने टेस्ट क्रिकेटरों की कोई आर्थिक मदद नहीं करता था.

अपनी मामूली पढाई लिखाई और हैसियत के चलते वह सबसे कट भी गए थे. वृद्धावस्था के दिनों में उन्हें पुणे मुंबई हाईवे पर भीख मांगते भी देखा गया. सात सितंबर 1979 को पुणे में उनकी मौत हो गई. दुर्भाग्य की बात है कि हम अपने उस टेस्ट क्रिकेटर को न तो बाद के दिनों में याद रख सके और न ही उसे बेहतर जिंदगी व सम्मान दे पाए.

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