कौन थे 'मित्रा'? क्यों चांद के एक हिस्से को मिला उनका नाम?

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Updated: August 27, 2019, 4:15 PM IST
कौन थे 'मित्रा'? क्यों चांद के एक हिस्से को मिला उनका नाम?
भारतीय वैज्ञानिक के नाम पर रखा गया एक क्रेटर का नाम.

भारत के चंद्रयान 2 (Chnadrayaan 2) ने जो ताज़ा तस्वीरें भेजी हैं, उनमें कुछ 'मित्र' क्रेटर (Crater of Moon) की भी हैं. क्रेटर, उसके नामकरण और मित्र नाम के पीछे की पूरी कहानी के बारे में जानें.

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स्पेसक्राफ्ट चंद्रयान 2 के टैरेन मैपिंग कैमरा द्वारा लिये गए ताज़ा चित्र इसरो ने सोमवार को जारी किए, जिनमें चांद की सतह और क्रेटर की तस्वीरें शामिल हैं. इसरो के मुताबिक ये तस्वीरें चंद्रयान ने 4375 किलोमीटर की ऊंचाई पर पहुंचकर 23 अगस्त को ली थीं जिनमें जैक्सन, मित्रा, माक और कोरोलेव आदि क्रेटर्स की तस्वीरें शामिल हैं. क्रेटर यानि चांद का हिस्सा या सतह. चांद के एक ​क्रेटर को आखिर 'मित्रा'  कहे जाने के पीछे क्या कहानी है? क्या आप जानते हैं कि ये मित्रा कोई और नहीं बल्कि एक भारतीय वैज्ञानिक थे. जानते हैं उनके नाम पर चांद के एक क्रेटर का नाम कैसे रखा गया.

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एक अमर भारतीय वैज्ञानिक
साल 1890 में बंगाल प्रेसिडेन्सी में जन्मे शिशिर कुमार मित्रा भारत के शुरुआती महान वैज्ञानिकों में शुमार हैं. सर आशुतोष मुखर्जी, डॉ. सीवी रमन जैसे महान भारतीय वैज्ञानिकों के मार्गदर्शन में काम करने के बाद मित्रा ने यूरोप जाकर विज्ञान शोध किए थे और वहां उन्होंने दुनिया के प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों चार्ल्स फैब्री, मैरी क्यूरी और कैमिल गटन के साथ उनकी प्रयोगशालाओं में वैज्ञानिक अध्ययन किए थे. इसके बाद उन्होंने भौतिक विज्ञान के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धियां हासिल कीं.

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पृथ्वी के परिमंडल की परतों की थ्योरी
ओज़ोन लेयर की खोज फैब्री ने की थी और इसी क्षेत्र में मित्रा ने अपने शोध व विश्लेषण करते हुए पृथ्वी के वायुमंडल के एक हिस्से पर अपने सिद्धांत दिए. उन्होंने पृथ्वी के ऊपरी वायुमंडल में स्थित ई लेयर और एफ लेयर के बारे में राज़ खोले थे. अंतरिक्षीय भौतिकी के चर्चित पत्र एटमॉस्फिरिक रिसर्च में 1947 में मित्रा का शोध लेख 'दि अपर एटमॉस्फियर' छपा था और वह एक चर्चित व प्रतिष्ठित वैज्ञानिक कबूल किए जाने लगे थे.
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पहला रेडियो मित्रा का ही था!
ब्रिटिश राज में करंट साइन्स नामक एक पत्र छपे एक लेख के मुताबिक़ मित्रा ही पहले वैज्ञानिक थे जिन्होंने देश में पहली बार रेडियो कम्युनिकेशन की समझ दी थी. 1926 में कलकत्ता स्थित विज्ञान यूनिवर्सिटी कॉलेज की अपनी प्रयोगशाला से मित्रा रेडियो ट्रां​समिशन के ज़रिए कार्यक्रम जारी करते थे. जबकि, 1927 में पहली बार भारतीय ब्रॉडकास्टिंग कंपनी की स्थापना हुई थी जिसके बाद शुरुआती रेडियो स्टेशन के ज़रिए कार्यक्रम प्रसारित होते थे. इसी कंपनी को बाद में ऑल इंडिया रेडियो के रूप में स्थापित किया गया था.

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चंद्रयान 2 द्वारा भेजी गईं चांद के क्रेटरों की तस्वीरें इसरो ने जारी कीं.


मित्रा के नाम पर क्यों है क्रेटर का नाम?
1960 के दशक के अंत तक अंतरिक्ष विज्ञान की दुनिया में उपलब्धियों के नाम पर काफी कुछ हाथ लग चुका था. चांद सहित कुछ और ग्रहों के कई हिस्सों के वर्णन तक वैज्ञानिक पहुंच चुके थे. ग्रहों और उपग्रहों पर ऐसे कुछ हिस्से दिखे थे, जिन्हें क्रेटर कहा गया. ये असल में, वो हिस्से थे जो संभवत: किसी विस्फोट के कारण एक विशाल गोलाकार तश्तरी जैसे थे. इन सभी हिस्सों को अध्ययन के लिए चिह्नित करना था, जिसके लिए सबका नामकरण होना था. तब विज्ञान में बेमिसाल योगदान देने वाले वैज्ञानिकों के नाम पर इन क्रेटरों के नाम रखे गए थे और उनमें से एक नाम मित्रा का था.

कैसे हुआ था ये नामकरण?
अंतर्राष्ट्रीय खगोलीय यूनियन ने ग्रहों के नामकरण पर एक वर्किंग ग्रुप की स्थापना की थी, जिसने टास्क फोर्स द्वारा चुने गए वैज्ञानिकों के नामों को वोट के आधार पर अंतिम मंज़ूरी दी थी. 100 से ज़्यादा देशों के प्रतिष्ठित खगोलीय वैज्ञानिकों वाली इस यूनियन ने पद्म भूषण से सम्मानित मित्रा के नाम पर एक क्रेटर का नाम रखे जाने की घोषणा 1970 में की थी, जब मित्रा को गुज़रे हुए सात साल हो चुके थे और जब भारत में अंतरिक्ष विज्ञान कार्यक्रम बहुत शुरुआती स्टेज पर थे.

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First published: August 27, 2019, 1:06 PM IST
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