कौन था कोरोना वायरस का पहला मरीज, क्‍यों जरूरी होता है 'पेशेंट जीरो' की पहचान होना

गुरुवार को बुजुर्ग की हुई थी मौत (सांकेतिक तस्वीर)
गुरुवार को बुजुर्ग की हुई थी मौत (सांकेतिक तस्वीर)

चीन (China) ने बताया था कि देश में कोरोना वायरस (Coronavirus) का पहला मामला 31 दिसंबर, 2019 को सामने आया. पहले मामलों में निमोनिया और बुखार जैसे लक्षण वाले कई लोग थे. हालांकि, चीन (China) के ही शोधकर्ताओं का कहना है कि चीन में संक्रमण का पहला मामला 1 दिसंबर को सामने आ गया था.

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 14, 2020, 4:20 PM IST
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कोरोना वायरस (Coronavirus) अब तक दुनिया भर में 19 लाख से ज्‍यादा लोगों को संक्रमित कर चुका है. इनमें 1 लाख से ज्‍यादा लोगों की मौत हो चुकी है. अकेले अमेरिका में ही 5 लाख से ज्‍यादा संक्रमित हैं. वहीं, संक्रमण फैलने की शुरुआत वाले चीन में अब तक 82,249 लोग इस वायरस की चपेट में आ चुके हैं. संक्रमण की शुरुआत चीन के हुबेई प्रांत के वुहान शहर से हुई थी. बताया जाता है कि कोरोना वायरस वुहान की एक मांस और मछली बाजार से फैलना शुरू हुआ. ऐसे में ये पता करना काफी मुश्किल हो जाता है कि इसका पहला शिकार कौन बना था.  चीन (China) ने बताया था कि संक्रमण का पहला मामला 31 दिसंबर, 2019 को सामने आया. पहले मामलों में निमोनिया और बुखार जैसे लक्षण वाले कई लोग थे. हालांकि, चीन के ही शोधकर्ताओं का मानना है कि वहांं संक्रमण का पहला मामला 1 दिसंबर को ही सामने आ गया था.

पहले संक्रमित बुजुर्ग कभी नहीं गए थे मछली बाजार
चीन वुहान के मांस व मछली बाजार को संक्रमण का केंद्र (Epicenter) मानता है. वहीं, अमेरिका (US) की जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी के आंकड़ों के मुताबिक, चीन के 90 फीसदी से ज्‍यादा मामले वुहान में ही पाए गए. लैंसेट मेडिकल जर्नल की रिपोर्ट इस मामले में बिलकुल अलग तस्‍वीर पेश करती है. लैंसेट के मुताबिक, कोरोना वायरस का इस बाजार से कोई संबंध ही नहीं है.

चीन के शोधकर्ताओं की ओर से प्रकाशित इस शोध के अनुसार कोरोना वायरस से संक्रमित पहले व्यक्ति का मामला 1 दिसंबर, 2019 को दर्ज हुआ. यह व्यक्ति वुहान के मछली थोक बाजार के संपर्क में आया ही नहीं था. वुहान के जिनिनटान अस्पताल की एक वरिष्ठ डॉक्टर और रिपोर्ट तैयार करने वाले शोधकर्ताओं में से एक वू वेनजुआन ने बताया कि यह बुजुर्ग अल्‍जाइमर का मरीज था. मछली बाजार उसके घर से काफी दूर है. भूलने की बीमारी के कारण ये बुजुर्ग कभी बाहर गया ही नहीं था.
चीन में कोरोना वायरस के पेशेंट जीरो को लेकर सरकार और स्‍वास्‍थ्‍य विशेषज्ञ एकराय नहीं हैं.




उत्‍पत्ति को लेकर एकराय नहीं हैं विशेषज्ञ-प्रशासन
शोधकर्ताओं ने बताया कि इस बुजुर्ग के बाद तीन अन्य लोगों में संक्रमण के लक्षण दिखाई दिए. उनमें से भी दो कभी मांस व मछली बाजार नहीं गए थे. शोधकर्ताओं ने पाया कि संक्रमण के शुरुआती चरण में अस्पताल में दाख़िल हुए 41 मरीजों में 14 लोग कभी मछली बाजार नहीं गए थे. वहीं, चीन के डॉ. ली वेनलियांग ने भी दिसंबर के शुरुआत में ही कोरोना वायरस की चेतावनी दे दी थी. इसके बाद उन पर अफवाह फैलाने का आरोप लगाकर जेल में डाल दिया गया.

कुछ समय बाद डॉ. ली वेनलियांग कोरोना वायरस के इलाज के दौरान अस्‍पताल में मौत हो गई थी. वुहान में हालात संभलने के बाद चीन की सरकार ने डॉ. वेनलियांग के परिवार से माफी भी मांग थी. कोरोना वायरस को फैले करीब पांच महीने के बाद भी कोरोना वायरस की उत्पत्ति को लेकर चीन के प्रशासन और विशेषज्ञों के बीच एकराय नहीं है. कोरोना वायरस के 'पेशेंट जीरो' यानी पहले मरीज को लेकर तो जबरदस्‍त विरोधाभास है यानी पहले मरीज का कोई पता नहीं है.

पहले मरीज को ढूंढ निकालने से मिलती है ये मदद
पेशेंट जीरो या इंडेक्‍स केस या पहला मरीज वो होता है, जो किसी वायरस या बैक्‍टीरिया से सबसे पहले संक्रमित होकर बीमार पडा हो. दरअसल, स्‍वास्‍थ्‍य विशेषज्ञों का मानना है कि पेशेंट जीरो का पता लग जाने पर संक्रमण फैलने की शुरुआत का सटीक जवाब मिल जाता है. साथ ही यह भी पता लगाना आसान हो जाता है कि संक्रमण कहां से और कैसे फैलना शुरू हुआ. इस जानकारी के उपलब्‍ध होने पर लोगों को संक्रमित होने से बचाने में काफी मदद मिल जाती है.

इबोला के पहले मरीज के तौर पर गिनी के एक गांव के दो साल के बच्‍चे के तौर पर हुई थी.


हालांकि, अब जीनोम एनालिसिस के क्षेत्र में हुई प्रगति के चलते किसी वायरस की उत्पत्ति के स्रोत का पता लगाना संभव है. इससे ये अनुमान भी लगाया जा सकता है कि बीमारी को फैलाने वाले पहले लोग कौन हैं. इसके अलावा पेशेंट जीरो के संक्रमण की चपेट में आने के कारण और उससे बचाव के उपाय खोजने में स्‍वास्‍थ्‍य विशेषज्ञों को काफी मदद मिल जाती है.

इबोला वायरस का पेशेंट जीरो था दो साल का बच्‍चा
दुनिया को समय-समय पर चपेट में लेने वाली भीषण बामारियों में कुछ के पेशेंट जीरो का पता लग पाया तो कुछ में पहले मरीज की पहचान ही नहीं हो पाई. पश्चिमी अफ़्रीका में 2014 से 2016 तक फैला इबोला का सबसे ज्‍यादा प्रसार हुआ था. इसकी चपेट में आकर 11,000 से ज्‍यादा लोग मारे गए थे और 28,000 से अधिक संक्रमित हुए थे. इस बीमारी को जन्म देने वाले वायरस के बारे में पहली बार 1976 में पता चला था.

इबोला के सभी मामले सिर्फ 10 देशों में ही पाए गए थे. इनमें से ज्‍यादातर पश्चीमी अफ़्रीका में थे. हालांकि, कुछ मामले अमेरिका, ब्रिटेन, स्पेन और इटली में भी मिले थे. शोधकर्ताओं ने पता लगाया कि इबोला प्रकोप की शुरुआत गिनी के दो साल के लड़के से हुई. माना गया कि उसमें इबोला का संक्रमण चमगादड़ों से हुआ. बताया गया कि ये छोटा बच्‍चा अपने घर के बाहर एक पेड़ के नीचे खेलता था और उस पेड़ पर चमगादड़ों का झुंड रहता था.

खाना बनाने वाली महिला ने फैलाया था टायफाइड
गिनी के इस बच्‍चे के अलावा न्‍यूयॉर्क में 1906 में फैले टायफाइड संक्रमण के पहले मरीज के तौर पर मैरी मेलन की पहचान हुई थी. इसके बाद उन्‍हें टायफाइड मैरी कहा जाने लगा था. ये उनके लिए काफी शर्मनाक था. दरअसल, वह अमेरिका में आयरलैंड से आकर बसी थी और न्यूयॉर्क के धनी परिवारों में खाना बनाती थीं. वह जिन घरों में खाना बनाती थी, उनमें सभी परिवारों में टायफाइड का संक्रमण हुआ था.

न्‍यूयॉर्क में 1906 में फैले टायफाइड संक्रमण के पहले मरीज के तौर पर मैरी मेलन की पहचान हुई थी. उन्‍हें टायफाइड मैरी कहा जाने लगा था.


आश्‍चर्यजनक तरीके से उनमें कभी संक्रमण के लक्षण नजर नहीं आए. इस वजह से अनजाने में वह एक के बाद एक कई परिवारों में संक्रमण फैलाती चली गईं. मेडिकल साइंस की भाषा में ऐसे लोगों को 'सुपर स्प्रेडर' कहा जाता है. ऐेसा ही एक मामला पंजाब में भी सामने आया था, जहां कोरोना वायरस से संक्रमित विदेश से लौटे एक बुजुर्ग के कारण कई लोगों में संक्रमण फैला था.

पेशेंट जीरो का नाम जाहिर करने के विरोध में विशेषज्ञ
कई स्वास्थ्य विशेषज्ञ किसी बैक्‍टीरिया या वायरस के पहले मरीज का नाम सार्वजनिक करने का विरोध रकते हैं. उनका मानना है कि 'पेशेंट जीरो' के साथ अपराधबोध भी जुड़ा रहता है. बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, बाकी लोग भी उससे अच्‍छा व्‍यवहार नहीं करते हैं. उसे संक्रमण फैलाने का दोषी माना जाता है. ऐसे में कोरोना वायरस के पहले मरीज का अब तक नाम सार्वजनिक नहीं हो पाया है. दरअसल, एक व्‍यक्ति को गलती से एड्स का 'पेशेंट ज़ीरो' मान लिया गया था.

कनाडा के समलैंगिक विमानकर्मी गीटेन डुगास एक ऐसे रोगी थे, जिन्हें सबसे अधिक निंदा झेलनी पड़ी थी. उन्हें 80 के दशक में अमरीका में एचआईवी फैलाने का जिम्‍मेदार ठहराया गया था. इसके 30 साल बाद वैज्ञानिकों ने पाया कि वह HIV के पहले रोगी नहीं हो सकते थे. लॉस एंजेलिस और सैन फ़्रांसिस्को में 80 के दशक में एड्स के फैलने के कारणों की जांच कर रहे सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के शोधकर्ताओं ने कैलिफॉर्निया राज्य से बाहर के किसी भी मामले की चर्चा करने के लिए 'O' (ओ) का इस्तेमाल किया था. अन्य शोधकर्ताओं ने गलती से इसे 0 (जीरो) समझ लिया. इसके बाद पेशेंट जीरो शब्‍द चलन में आ गया.

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