आखिर क्यों सभी दलों ने कर दिया लद्दाख में चुनाव बहिष्कार का ऐलान

करीब एक साल पहले ही जब लद्दाख को कश्मीर से अलग करके केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया था. तब खुशियां मनाईं गईं थीं,  अब फिजां बदली हुई है.
करीब एक साल पहले ही जब लद्दाख को कश्मीर से अलग करके केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया था. तब खुशियां मनाईं गईं थीं, अब फिजां बदली हुई है.

लद्दाख (Ladakh) में अक्टूबर में बीजेपी समेत सभी दलों और कई संगठनों ने पहाड़ी परिषद चुनाव (hill council elections) के बहिष्कार का फैसला किया है. एक साल पहले ही लद्दाख को जब केंद्र शासित प्रदेश (Central ruling state) बनाया गया था, तब बहुत खुशियां मनाईं गईं थीं तो अब फिजां बदल क्यों गई.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 25, 2020, 9:23 PM IST
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मुश्किल एक साल पहले जब लद्दाख को कश्मीर से अलग करके नया केंद्रशासित प्रदेश बनाया गया था, तब इस क्षेत्र में काफी खुशियां मनाई गईं थीं. लेकिन अब उसकी जगह यहां हालात बदले हुए हैं. क्षेत्र के लोगों ने लद्दाख ऑटोनॉमस हिल डेवलपमेंट काउंसिल (एलएएचडीसी यानी लद्दाख स्वायत्त पर्वत विकास परिषद) के चुनाव के बहिष्कार का ऐलान कर दिया है.

05 अगस्त 2019 को केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर का विशेष संवैधानिक दर्जा समाप्त कर उसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांट दिया था. चुनाव बहिष्कार की वजह कई मुद्दों पर केंद्र सरकार से नाखुशी है. केंद्र की मंशा पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं. लेकिन असल वजह छठी अनुसूची. लद्दाख के लोग अपने इलाके को हर हाल में पूर्वोत्तर के कई इलाकों की तरह छठी अनुसूची में देखना चाहते हैं.

क्यों बहने लगी लद्दाख में असंतोष की हवा
इसी के चलते कारण भाजपा समेत सभी राजनीतिक और धार्मिक संगठनों ने हिल काउंसिल चुनावों के बहिष्कार का ऐलान किया है. आखिर क्या हो गया कि एक साल बीतते बीतते लद्दाख में हवा कुछ अलग बहने लगी. वो कौन सी भी मांग जिसके लिए लेह के लोगों ने चुनाव में शिरकत नहीं करने का फैसला कर डाला. इसके लिए सभी संगठन एक प्लेटफार्म पर आ गए. परिषद की 26 सीटों पर 16 अक्टूबर को चुनाव होने हैं.
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एक संयुक्त बयान में कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, भाजपा के राजनीतिक प्रतिनिधियों और विभिन्न धार्मिक समूहों के नेताओं ने चुनावी प्रक्रिया का बहिष्कार करने का एकमत से फैसला किया.
12 नेताओं द्वारा हस्ताक्षरित बयान में कहा गया है, ‘पीपुल्स मूवमेंट के शीर्ष निकाय ने तब तक लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद (एलएडीएचसी), लेह चुनाव के बहिष्कार का फैसला किया है जबकि लद्दाख और उसके लोगों को बोडो प्रादेशिक परिषद की तरह छठी अनुसूची में जगह संवैधानिक सुरक्षा नहीं दी जाती.

असल वजह है छठी अनुसूची में लद्दाख को नहीं लाना
चुनावों में बहिष्कार के ऐलान को अप्रत्याशित कदम ही कहा जाएगा. दरअसल लोगों के शंकाओं की सूची में तो कई मुद्दे हैं लेकिन असल मुद्दा ये है कि उनके क्षेत्र को छठी अनुसूची में क्यों नहीं लाया गया. साथ ही क्षेत्र की जनसांख्यिकी, भूमि और नौकरियों की सुरक्षा के लिए संवैधानिक उपायों की मांग हो रही है.

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हालांकि ये फैसला ऐसा समय में हुआ है, जबकि यहां से कुछ किलोमीटर दूर भारत और चीन के सैनिक आमने-सामने डटे हैं और इस तनातनी पर पूरी दुनिया की नजर है.

leh ladakh monastery
लद्दाख में अक्टूबर में पहाड़ी परिषद के चुनाव हैं लेकिन यहां के लोग चाहते हैं कि उनके इलाके को पहले छठी अनुूसूची में जगह दी जाए. इसके बाद ही वो चुनावों में शिरकत करेंगे.


लद्दाख में बाहरी लोगों को नहीं चाहते
लद्दाख क्षेत्र की जनसंख्या महज 03लाख है. यहां के लोग कतई नहीं चाहते कि बाहरी लोगों को यहां बसने देने के लिए कोई रास्ता बनाया जाए. इसलिए वो यहां के स्वायत्त परिषद चाहते हैं और छठी अनुसूची में जगह.

केंद्र के रवैये पर उठने लगे हैं सवाल
लद्दाख के लोगों को ये भी लगने लगा है कि सत्तारूढ़ पार्टी की मुख्य दिलचस्पी कश्मीर को केंद्रशासित प्रदेश बनाकर अलग करने की थी. इसीलिए लद्दाख को अलग केद्र शासित प्रदेश बनाने के बाद केंद्र का रवैया उदासीन हो गया.

केंद्र सरकार के लिए बड़ी समस्या बन सकता है ये बॉयकाट
लद्दाख में सभी पार्टियों का ये रुख केंद्र की बीजेपी सरकार के लिए एक बड़ी समस्या बन सकती है. क्योंकि ये तय है कि चुनावों में ऐसी स्थिति में शायद ही यहां से कोई भी मतदान करने के लिए निकले.हालांकि केंद्र सरकार ने पिछले साल दिसंबर में ये संकेत दिया था कि लद्दाख को छठी अनुसूची में नहीं लाया जा सकता.

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क्या होती है छठी अनुसूची?
छठी अनुसूची में भूमि अधिकारों के संरक्षण, मूल निवासी की सामाजिक-सांस्कृतिक और जातीय पहचान का प्रावधान है. इसके लिए उस क्षेत्र के लिए खास कानून होते हैं और उन्हें पूरी स्वायत्तता दी जाती है. जैसा कि नार्थईस्ट के राज्यों असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम में जनजातीय क्षेत्रों में है.
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