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फलस्तीन की वायरल हो रही इस तस्वीर की वजह...

News18Hindi
Updated: May 16, 2018, 2:52 PM IST
फलस्तीन की वायरल हो रही इस तस्वीर की वजह...
14 मई को गाज़ा पट्टी पर इज़राइल ने टियरगैस से हमला किया (तस्वीर - AP)

अमेरिका ने दिसंबर में घोषणा की थी कि वह येरूशलम को इज़राइल की राजधानी मानता है. साथ ही यह भी कि वह जल्द ही अपना दूतावास तेल अवीव से येरूशलम शिफ्ट करने वाला है.लगभग छह महीने बाद अमेरिका ने यह कर दिया. जहां एक तरफ अमेरिकी और इज़राइली अधिकारी और नेता नए दूतावास का जश्न मना रहे थे, वहीं 50 मील दूर गाज़ा पट्टी पर आसूं गैस छोड़कर फलस्तीनी प्रदर्शनकारियों को भगाया जा रहा था. जानिए क्या है पूरा मामला...

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हो सकता है कि फेसबुक पर आपने भी इस तस्वीर को देखा हो जिसमें असला बारूद के धुएं से लोग दूर भाग रहे हैं. दरअसल यह इज़राइल-फलस्तीन के गाज़ा सीमा की तस्वीर है जहां 14 मई को इज़राइली सैनिक, फलस्तीनियों प्रदर्शनकारियों पर आसूंगैस बरसा रहे हैं. इस हमले में 50 से ज्यादा लोग मारे गए और कई हज़ार घायल हुए. बताया जाता है कि इनमें से कई प्रदर्शनकारी निहत्थे थे जबकि कुछ के हाथों में पत्थर थे. इस मुठभेड़ में किसी इज़राइली की मौत की खबर नहीं है.

अब चलते हैं इसी गाज़ा सीमा से 60 मील दूर इज़राइल स्थित येरूशलम में जहां अमेरिका ने अपने दूतावास का शुभांरभ किया. इज़राइल और अमेरिका के नेताओं (दोनों देशों के प्रमुख समेत) ने दूतावास के खुलने के मौके को महान दिन बताया है. यही दूतावास है उस हिंसा की वजह जो गाज़ा सीमा पर हो रही है और जिसमें 50 से ज्यादा लोग अपनी जान गंवा चुके हैं. जहां एक तरफ अमेरिका और इज़राइल की सरकार जश्न मना रही थी, वहीं गाज़ा पट्टी पर गोलियां चल रही थीं.

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(तस्वीर - AP)


दरअसल गाज़ा सीमा पर फलस्तीनियों का विरोध पिछले सात हफ्ते से चल रहा है. इस विरोध के पीछे गाज़ा पट्टी स्थित कट्टर इस्लामिक संगठन हमस का हाथ है जो हफ्तों से उन हजारों फलस्तनियों के लौटने के हक की मांग कर रहा है जिन्हें इज़राइल राष्ट्र के निर्माण के बाद अपना घर और इलाका छोड़ना पड़ा. इसके अलावा हजारों फलस्तीन उस जमीनी, समुद्री, हवाई नाकेबंदी का भी विरोध कर रहे हैं जो इज़राइल और मिस्र ने गाज़ा पर 2007 से लागू कर रखा है. इन सबके बीच अमेरिका का येरूशलम में दूतावास स्थापित करना आग में घी डालने जैसा हो गया.




हुआ यूं कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दिसंबर में घोषणा की कि उनका देश येरूशलम को इज़राइल की राजधानी की मान्यता देता है. साथ ही उन्होंने सालों से अटके उस कदम को भी उठाने का फैसला लिया जिसके तहत इज़राइल के तेल अवीव स्थित अमेरिकी दूतावास अब येरूशलम शिफ्ट हो जाएगा. इसी घोषणा को अमली जामा पहनाते हुए मई में अमेरिका ने अपना दूतावास येरूशलम में स्थापित किया. वैसे फलस्तीन और इज़राइल सीमा पर माहौल इस घोषणा के बाद से ही संगीन बना हुआ था.

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इवांका ट्रंप, जेरूशलम में अमेरिकी दूतावास के उद्घाटन समारोह में मौजूद थीं (तस्वीर - AP)


दरअसल 1995 में जब बिल क्लिंटन राष्ट्रपति थे, तब अमेरिकी कांग्रेस ने तेल अवीव से दूतावास को येरूशलम शिफ्ट करने के कानून को पास कर दिया था. यह काम वैसे तो 1999 तक हो जाना चाहिए था. लेकिन इसी कानून के एक प्रावधान के तहत क्लिंटन के बाद आए हर राष्ट्रपति, राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर इस काम को छह महीने आगे टालने के निर्देश देते रहे. खुद ट्रंप ने पिछले साल जून में ऐसा ही काम किया था.

येरूशलम शहर इतना विवादित स्थान है कि वहां दूतावास का स्थानांतरण करना अशांति को निमंत्रण देना जैसा है. अब ट्रंप ने अमेरिकी चुनाव के दौरान यहूदी वोटरों से किए वादे को निभाने के लिए वह कदम उठाया है. अमेरिका पहला देश है जिसने येरूशलम को इज़राइल की राजधानी की मान्यता दी है. हालांकि अंतरराष्ट्रीय कानून भी विवादों के चलते येरूशलम को राजधानी मानने से बचता आया है.


क्यों है येरूशलम को लेकर विवाद 

दरअसल येरूशलम, खासतौर पर इस शहर का पूर्वी हिस्सा इज़राइल और फलस्तीन के बीच विवाद की अहम जड़ है. बल्कि इस शहर को लेकर इज़राइल का सामना सिर्फ फलस्तीन से ही नहीं, तमाम अरब और मुस्लिम देशों से भी है. पूर्वी येरूशलम पर धार्मिक वजहों से दुनियाभर की नज़र रहती है. यहां यहूदी, इस्लाम और ईसाई धर्म के अहम धार्मिक स्थल हैं. ईसाई मानते हैं कि शहर के इसी हिस्से में ईसा मसीह को सूली पर चढ़ाया गया था. यहीं वह फिर से अवतरित हुए थे. वहीं इस्लाम धर्म में मान्यता है कि यहीं से पैगंबर मोहम्मद ने जन्नत की यात्रा की थी. यहीं पर यहूदियों की पवित्र दीवार भी है. उनके बीच ये मान्यता है कि यहीं से पूरी दुनिया का निर्माण हुआ था. इन धार्मिक वजहों ने ही इस जगह को राजनीतिक दृष्टि से भी दुनिया के केंद्र बिंदू में लाकर रख दिया है.

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दूतावास के बाहर विरोध करने वालों को इज़राइल पुलिस द्वारा हटाया गया (तस्वीर - AP)


फलीस्तीन भी येरूशलम के पूर्वी हिस्से को अपनी राजधानी मानता है

इस संघर्ष की शुरुआत दूसरे विश्व युद्ध के बाद से हुई, जब यूरोप में खुद पर हो रहे अत्याचारों से पीछा छुटाने के लिए कई यहूदी मध्य पूर्व के फलस्तीन हिस्से में भाग आए. यहूदी यहां अपना एक अलग देश बसाना चाहते थे लेकिन ये पहले से ही अरब और मुस्लिम बाहूल्य इलाका था, इसलिए यहां ज़मीन को लेकर खींचातानी शुरू हो गई, जो अब तक जारी है. 1948 में इज़राइल राष्ट्र का निर्माण हुआ. इस देश ने येरूशलम के पश्चिमी हिस्से में संसद स्थापित की.

1967 में हुए युद्ध में इज़राइल ने पूर्वी येरूशलम पर भी कब्ज़ा कर लिया. उसे अपनी राजधानी घोषित कर दिया. लेकिन फलीस्तीन समेत कई मुस्लिम देशों ने इसे मानने से इंकार कर दिया. फलस्तीन इस शहर के पूर्वी हिस्से को भविष्य में बनने वाले अपने राज्य की राजधानी मानता है. इतने संवेदनशील विवाद की वजह से अंतरराष्ट्रीय कानून येरूशलम को इज़राइल की राजधानी की मान्यता नहीं दे रहा.

इसीलिए तेल अवीव में हैं दूतावास 

अंतरराष्ट्रीय मान्यता के नहीं मिलने की वजह से ही अभी तक इज़राइल में जितने भी दूतावास हैं, वह येरूशलम में न होकर इस देश के एक और अहम शहर तेल अवीव में होते आए हैं. ट्रंप के येरूशलम में दूतावास ले जाने के फैसले से दुनियाभर के अरब और मुस्लिम देश नाराज़ हैं. अमेरिका को हिंसा की चेतावनी भी दी गई है. सिर्फ अरब ही नहीं, संयुक्त राष्ट्र ने ट्रंप के इस कदम की आलोचना की थी, वहीं कहा जा रहा है कि ऐसा करके ट्रंप आग से खेल रहे हैं.

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First published: May 16, 2018, 2:52 PM IST
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