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चीन के खिलाफ पाकिस्तान से उम्मीद क्या नेहरू का ग़लत जजमेंट था?

चीन के खिलाफ पाकिस्तान से उम्मीद क्या नेहरू का ग़लत जजमेंट था?

भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू.

भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू.

इतिहास (History) के पन्नों से एक ऐसा किस्सा, जो भारत और चीन के बीच सीमा विवाद (India-China Border Dispute) और तनाव की शुरूआती कहानी बयान करती है. चीन युद्ध (India-China War) से पहले किस तरह भारत ने अपना पक्ष मज़बूत करने की कवायद की थी.

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    चूंकि भारत और चीन के बीच महीनों से सीमा पर तनाव (India-China Border Tension) की स्थिति बनी हुई है इसलिए इस बीच नेहरू की जयंती (Nehru Birth Anniversary) आई तो करीब 60 साल पहले के भारत चीन युद्ध से जुड़ी यादें फिर ताज़ा हो रही हैं. उस समय भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू (Jawaharlal Nehru) ने चीन के खिलाफ युद्ध में बढ़त हासिल करने के लिए पाकिस्तान की मदद लेने की कोशिश की थी. जी हां, तब भी भारत और पाकिस्तान (India-Pakistan Relations) दोस्त देश नहीं थे और न ही पाकिस्तान में उन दिनों लोकतंत्र (Democracy) बहाल हो सका था. इसके बावजूद नेहरू ने अपने विश्वास पर विश्वास किया था.

    भारत और पाकिस्तान के बंटवारे के दौरान और उसके बाद करीब डेढ़ दो सालों तक दोनों देश युद्ध की स्थिति में रहे और इसी दौरान कश्मीर को लेकर एक बड़ा मसला खड़ा हो गया था. कश्मीर दोनों देशों ही नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया की राजनीति में शक्ति केंद्र का मुद्दा बन चुका था. इस बीच, नेहरू का पॉलिटिकल जजमेंट कैसे नाकाम साबित हुआ और इसके मायने क्या रहे?

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    जब अचानक पाकिस्तान पहुंचे थे नेहरू!
    यह बात 1960 के आखिरी दिनों की थी, जब नेहरू अचानक पाकिस्तान के मुर्री और पिंडी की गुप्त यात्रा पर चले गए थे और तब वहां के राष्ट्रपति अयूब खान से मुलाकात की थी. चीन की तरफ से सीमा को लेकर खतरा और तनाव बढ़ रहा था इसलिए नेहरू को युद्ध की आशंका दो साल पहले से ही थी. इसी सिलसिले में नेहरू ने खान के साथ चीन को लेकर बातचीत की थी.

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    नेहरू के यादगार कोट.


    नेहरू ने भारत और चीन के कुछ खुफिया नक्शे खान को दिखाकर यह मदद चाही थी कि पाकिस्तान की खुफिया रिपोर्टों के अनुसार चीन की सेना की पोज़ीशन पाकिस्तान बॉर्डर के पास किस तरह की थी. इस बातचीत पर खान के निर्देश के बाद पाकिस्तान के विदेश सचिव ने इस बारे में कोई भी जानकारी होने से मना किया था.

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    नेहरू ने क्यों मांगी थी पाक से मदद?
    चीन की सीमा हथियाने की नापाक कोशिशों को जवाब देने के लिए नेहरू ने पाकिस्तान से मदद मांगी और वो भी तब, जब पाक के साथ ही सीमा को लेकर विवाद जारी था. इस बारे में खुद नेहरू ने राज्य सभा में कहा था कि 'भले ही दो देशों के बीच मतभेद थे और कश्मीर एक बड़ा मुद्दा था, लेकिन चीनी हमले के मद्देनज़र पड़ोसी देशों की एकरूप नीति को मज़बूत करने के विचार से पाकिस्तान का साथ आना फायदेमंद होता.'

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    राज्य सभा में 3 मई 1962 को नेहरू अपनी इस कोशिश के बारे में पूरा ब्योरा दे रहे थे और अगले ही दिन 4 मई को उन्होंने यह भी बताया कि भारत और चीन के बीच सीमा विवाद और पाकिस्तान के कब्ज़े वाले कश्मीर के विवाद पर चर्चा शुरू हुई. इस पूरे किस्से का ज़िक्र करते हुए वरिष्ठ प​त्रकार पी रमन ने अपने लेख में कहा कि इसके बाद 22 अगस्त 1962 को नेहरू ने राज्य सभा में ही अपनी कोशिश के नाकाम होने की पुष्टि भी की थी.

    यह बहुत चौंकाने वाली खबर है लेकिन वास्तविकता है कि पाकिस्तान की सरकार चीन की तरफ झुक चुकी है. जिस देश ने साम्यवाद (कम्युनिज़्म) के सिद्धांत के खिलाफ खड़े रहने में अपनी पहचान बनाई, वो आखिर में चीन के साथ मिलीभगत करने की कोशिश में जुट गया.


    कितना गलत था नेहरू का जजमेंट?
    सालों पुराने संसदीय दस्तावेज़ों के आधार पर रमन ने अपने लेख में यह भी बताया कि नेहरू ने चीन के साथ युद्ध से जुड़ी तमाम जानकारियां संसद में दी थीं. भारत और चीन के बीच तनाव से पहले नेहरू पर विपक्ष ने ये आरोप भी लगाए थे कि कश्मीर को लेकर नेहरू सरकार कोई एक्शन नहीं लेती थी. तब नेहरू ने लोकसभा में बताया था कि लद्दाख में जोजिला पास पाकिस्तान ने 1948 में अपने कब्ज़े में ले लिया था, लेकिन भारतीय सेना ने साहस दिखाते हुए उसे वापस हासिल किया.

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    नेहरू के यादगार कोट.


    पाकिस्तान के सीमा कब्ज़ाने के मंसूबे से वाकिफ होते हुए भी उसी फितरत के दूसरे देश के खिलाफ पाक की मदद लेने के अति विश्वास पर नेहरू की आलोचना हुई, लेकिन उन्होंने अपनी 'इंस्टिंक्ट' को तरजीह देने की बात कही थी.undefined

    Tags: India china tension, India pakistan, Jawaharlal Nehru, PM Nehru

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