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भारत ने खरीदे थे 100 से ज़्यादा AN-32, लेकिन अपग्रेड नहीं हो सके विमान

प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

भारत के पास 100 से ज़्यादा AN-32 विमान हैं जो देश की वायु सेना की फ्रंटलाइन ताकत माने जाते हैं. यूक्रेन, रूस और भारत के बीच उलझे रिश्तों की भेंट कैसे चढ़ा AN-32 विमान अपग्रेड करने का कार्यक्रम? और खस्ताहाल हो चुके AN-32 विमानों की बदहाली में क्या है पाकिस्तान कनेक्शन?

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    असम के जोरहाट से भारतीय वायुसेना का AN-32 विमान उड़ता है. बीते 3 जून को चीन की सीमा के पास अरुणाचल प्रदेश के एडवांस्ड लैंडिंग ग्राउंड के करीब उड़ता देखा जाता है. फिर अचानक गायब हो जाता है और कुछ दिनों बाद इस विमान का मलबा मिलने की अपुष्ट खबरें आती हैं लेकिन विमान में सवार वायु सेना के 13 सदस्यों और विमान का कोई ठीक ठीक सुराग नहीं मिलता.

    पढ़ें : AN-32 क्रैश में सभी 13 लोगों की मौत

    1986 : वायुसेना का एक AN-32 विमान सोवियत यूनियन से उड़ान भरता है. ओमान के रास्ते आ रहा यह विमान अरब सागर क्षेत्र में रहस्यमयी ढंग से गायब हो जाता है. विमान और उसमें सवारों का कोई सुराग नहीं मिलता.

    2016 : एक और AN-32 चेन्नई से उड़ता है. अंडमान निकोबार की तरफ जा रहा यह विमान बंगाल की खाड़ी के क्षेत्र में गायब हो जाता है. इस विमान में 29 लोग सवार थे लेकिन विमान का कभी पता नहीं चल पाता.

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    यही नहीं, विमान गायब हो जाने की इन दो घटनाओं के बीच में दो AN-32 विमानों के क्रैश होने की घटनाएं 1989 और 2009 में होती हैं. इन हादसों में क्रू सदस्यों और यात्रियों की मौत होती है. आखिर ये AN-32 विमान किस तरह के संकट में हैं? क्यों और कबसे? ऐसे कई सवाल खड़े होते हैं.

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    उड़ान भरता भारतीय वायु सेना का विमान. फाइल फोटो.


    तस्वीर ये है कि भारतीय वायुसेना के पास 100 से ज़्यादा AN-32 विमान हैं जो देश की वायु सेना की फ्रंटलाइन ताकत माने जाते हैं. ये AN-32 विमान लॉन्च के वक्त सबसे पहले भारत ने सोवियत यूनियन से खरीदे थे, जिनका निर्माण यूक्रेन ने किया था. और यहीं से ये कहानी बिगड़ना शुरू हुई थी.

    पुराने और खस्ताहाल हैं ये विमान!
    2009 में हुए विमान हादसे के बाद भारत ने यूक्रेन के साथ करीब 2760 करोड़ रुपये की एक डील की थी, जिसके तहत AN-32 विमानों को अपग्रेड किया जाना था. 30 साल से ज़्यादा पुराने हो चुके इन विमानों की ज़िंदगी और 40 सालों तक बढ़ाने के ​मकसद से ये काम होना था. इस डील ने इतना तो साबित किया ही कि इन विमानों की हालत क्या थी! लेकिन ये डील कैसे एक के बाद एक मुश्किलों में फंसकर खटाई में पड़ी? इसकी कहानी हैरान करने वाली है.

    पहली दिक्कत था यूक्रेन
    इस डील के तहत 40 AN-32 विमानों को अपग्रेड किए जाने के लिए यूक्रेन भेजा गया. अप्रैल 2015 में तमाशा तब हुआ जब पांच विमान खो गए! जी हां, यूक्रेन ने गैरजिम्मेदारी के साथ कहा था कि खो गए. ये यूक्रेन की अयोग्यता का सबूत था लेकिन भारतीय वायु सेना के लिए ये मज़ाक सहन करने वाला नहीं था. 'हमारे विमान ढूंढ़ो', यूक्रेन को अल्टीमेटम दिया गया. आखिरकार, ये विमान एक सिविल एविएशन प्लांट में पाए गए और फिर जैसे-तैसे ये विमान भारत को लौटाए गए.

    दूसरी दिक्कत थी यूक्रेन की अंदरूनी समस्याएं
    बता दें कि यूक्रेन में सामाजिक और आर्थिक दिक्कतों के चलते अंदरूनी समस्याएं खड़ी हुईं. यूक्रेन की इन अंदरूनी समस्याओं के चलते परेशानी भारत को हुई. बाकी बचे 64 AN-32 विमानों को आखिरकार वायु सेना के कानपुर बेस में अपग्रेड किए जाने का निश्चय हुआ. यूक्रेन से टेक्नोलॉजी मंगाकर ये काम होना था लेकिन फिर यूक्रेन के मजदूरों ने अपनी नौकरियां छोड़ दीं और यूक्रेन से स्पेयर पार्ट्स मिलने भी बंद हो गए.

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    यूक्रेन ने फिर गैरज़िम्मेदारी दिखाते हुए कहा कि वह इस मामले में कुछ नहीं कर सकता था. इस पूरे मामले पर वित्तीय पोर्टल ज़ीरो हेज ने लिखा था 'हैरानी तो ये है कि भारत के प्रति यूक्रेन के इस रवैये का कारण कहीं ये तो नहीं है कि भारत रूस पर मंज़ूरियां नहीं थोप रहा है!' यानी कि हुआ ये कि भारत ने रूस की मंज़ूरियों को ठुकराया, तो यूक्रेन ने हज़ारों करोड़ के सौदे से मुंह फेर लिया.

    फिर जारी रहा समस्याओं का दौर
    AN-32 विमानों के अपग्रेडेशन के लिए भारत ने अपने स्तर पर तमाम कोशिशें कीं लेकिन अलग-अलग कारणों से निराशा ही हाथ लगती रही. इधर, यूक्रेन और रूस के बीच रिश्ते खराब होते रहे, जिनका असर भारत के AN-32 विमानों के अपग्रेड कार्यक्रम पर सीधे तौर पर पड़ रहा था.

    न्यूज़ीलैंड बेस्ड रक्षा विशेषज्ञ के हवाले से बिज़नेस टुडे के एक लेख में कहा गया है कि 'रूस और यूक्रेन के बीच जारी विवाद ने तो AN-32 विमानों के सुधार कार्यक्रम की कमर तोड़ने में मुख्य भूमिका निभाई ही, लेकिन भारत के रक्षा विभाग की नौकरशाही भी कम दोषी नहीं रही. रक्षा विभाग में ज़्यादातर सिविल मामलों के विशेषज्ञ ब्यूरोक्रेट रहे, जिन्हें रक्षा और सैन्य मामलों के बारे में कोई समझ नहीं थी. आदेशों, खरीदी और हथियारों के उत्पादन जैसी तमाम प्रणालियों में रक्षा मंत्रालय की लेतलाली ज़िम्मेदार रही'.

    उधर, यूक्रेन का अव्यावहारिक रवैया दूसरे सौदों में भी निराशाजनक बना रहा. युद्धपोतों के निर्माण के एक कार्यक्रम को लेकर भारत और रूस के बीच होने वाले सौदों में भी यूक्रेन ने खेल खराब करने में कोई कसर नहीं छोड़ी.

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    और आखिरकार पाकिस्तान कनेक्शन
    भारत के AN-32 विमानों के मामले के दरमियान यूक्रेन और पाकिस्तान के बीच रक्षा संबंधी रिश्ते पनप रहे थे. भारत और रूस के बीच संधियों के बीच दोनों के दुश्मनों यूक्रेन और पाकिस्तान के बीच रिश्ते बनने से नए किस्म की अड़चनें पैदा हो रही थीं. 1996 और 2002 में यूक्रेन ने पाकिस्तान के साथ बड़े रक्षा सौदे किए थे. पाकिस्तान की ज़मीन पर यूक्रेन अपना बड़ा रक्षा उद्योग खड़ा कर रहा था. पाकिस्तान में यूक्रेन वायु रक्षा हथियारों के परीक्षण और सौदे के लिए भी ज़मीन तैयार करने में लगा था.

    पाकिस्तान और वहां पनपने वाले आतंकवाद को ज़ाहिर तौर पर समर्थन दे रही यूक्रेन की अर्थव्यवस्था और नीतियों के बीच भारत के लिए मुश्किल खड़ी थी कि वह यूक्रेन के साथ किसी भी किस्म के रक्षा समझौते को लेकर पूरी सतर्कता बरते. और यह स्थिति अब तक बनी हुई है. ऐसे में भारत को सचेत रहते हुए आगे की नीतियां तैयार करने की ज़रूरत होगी. लेकिन, इस पूरी कहानी के बाद सच्चाई ये है दशकों पुराने और खस्ताहाल हो चुके AN-32 विमान अपनी बदकिस्मती पर आंसू बहा रहे हैं.

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