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कश्मीर पर पाकिस्तान की तमाम कोशिशों के बावजूद क्यों खामोश हैं खाड़ी देश?

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Updated: October 26, 2019, 4:45 PM IST
कश्मीर पर पाकिस्तान की तमाम कोशिशों के बावजूद क्यों खामोश हैं खाड़ी देश?
भारत सरकार द्वारा जम्मू और कश्मीर से आर्टिकल 370 निष्प्रभावी कर राज्य का पुनर्गठन किया गया है.

पाकिस्तान (Pakistan) की हायतौबा के बावजूद खाड़ी देशों में कश्मीर को लेकर लगभग खामोशी देखी गई. सऊदी अरब, कुवैत, कतर, बहरीन और ओमान ने पाकिस्तान की तमाम कोशिशों के बावजूद एक बयान तक जारी करना जरूरी नहीं समझा.

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  • Last Updated: October 26, 2019, 4:45 PM IST
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भारत सरकार (Indian government) द्वारा जम्मू और कश्मीर (jammu and kashmir) को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले संवैधानिक प्रावधान आर्टिकल 370 (Article 370) को निष्प्रभावी करने के बाद पाकिस्तान ने पूरी दुनिया में हायतौबा मचाया. पाकिस्तान ने विश्व के लगभग सभी फोरम में कश्मीर मुद्दे को उठाते हुए उसके वैश्वीकरण का प्रयास किया. हद को तब हुई जब संयुक्त राष्ट्र की आम बैठक में पाकिस्तान ने कश्मीर मुद्दे को मुस्लमानों से जोड़ने की कोशिश की. हालांकि पाकिस्तान की हायतौबा के बावजूद खाड़ी देशों में कश्मीर को लेकर लगभग खामोशी देखी गई. इतना ही नहीं सऊदी अरब ने कश्मीर को मुस्लमानों का मुद्दा मानने से भी इंकार कर दिया. साथ ही पाकिस्तान को यह हिदायत दी कि वह कश्मीर को मुसलमानों से जुड़ने की कोशिश न करे.

सऊदी अरब के अतिरिक्त अन्य खाड़ी देशों जैसे- कुवैत, कतर, बहरीन और ओमान ने पाकिस्तान की तमाम कोशिशों के बावजूद एक बयान तक जारी करना जरूरी नहीं समझा. इतना ही नहीं संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने जम्मू कश्मीर को भारत का आंतरिक मामला बताया. यूएई ने कहा कि जम्मू-कश्मीर के विशेषाधिकार खत्म करना पूरी तरह से भारत का अपना अंदरूनी मामला है.

यूएई ने जम्मू और कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाना भारत का अंदरूनी मामला बताया है.


सऊदी अरब और भारत के बीच गहरे द्विपक्षीय संबंध

सऊदी अरब और भारत के बीच द्विपक्षीय संबंध हाल के कुछ वर्षों में बहुत तेजी से प्रगाढ़ हुए हैं. कुछ महीने पहले सऊदी अरब ने भारत के बाजार में 86 अरब डॉलर निवेश करने का समझौता हुआ है. हालांकि पाकिस्तान के साथ भी सऊदी अरब के बहुत पहले से गहरे संबंध रहे हैं. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने जम्मू-कश्मीर में भारत द्वारा उठाए गए कदम की शिकायत सऊदी अरब से की थी.

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान संयुक्त राष्ट्र की बैठक में शामिल होने से पहले सऊदी अरब गए और वहीं से सऊदी प्रिंस के विमान से अमेरिका गए. सऊदी प्रिंस से मुलाकात के दौरान इमरान खान ने कश्मीर मुद्दे को उठाया. सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार इस मुलाकात के दौरान सऊदी प्रिंस सलमान ने इमरान खान को संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर मुद्दे को उठाने से मना किया था, लेकिन जब इमरान ने यूएन की बैठक में कश्मीर के मुद्दे को न केवल उठाया, बल्कि उसे मुसलमानों से जोड़कर मामले को तूल देने का भी प्रयास किया.

सऊदी अरब ने जम्मू और कश्मीर को मुसलमानों का मुद्दा मानने से इनकार कर दिया है.

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इमरान से नाराज प्रिंस ने वापस बुलाया अपना प्लेन
इमरान की इस कोशिश से सऊदी प्रिंस इतने नाराज हुए कि उन्होंने अपना प्लेन वापस बुला लिया और इमरान खान को कमर्शियल फ्लाइट से स्वदेश वापस आना पड़ा. आखिर खाड़ी देशों द्वारा भारत का समर्थन करने के पीछे की असली वजह आर्थिक है. खाड़ी देशों का भारत के साथ 100 अरब डॉलर वर्षिक से भी ज्यादा का व्यापार होता है.

सऊदी अरब ने भारत में 86 अरब डॉलर निवेश करने का ऐलान किया है.


उल्लेखनीय है कि खाड़ी के देशों में भारतीयों की एक बहुत बड़ी संख्या निवास करती है. जिनका वहां की अर्थव्यवस्था के विकास में बड़ा अहम रोल है. खाड़ी देशों में बहुत बड़ी संख्या में भारतीय डॉक्टर, इंजीनियर और व्यवसायी रहते हैं. इसके अलावा टीचरों और मजदूरों की भी एक बहुत बड़ी संख्या खाड़ी देशों में है. एक रिपोर्ट की माने तो यूएई की आबादी में एक तिहाई लोग भारतीय हैं.

यूएई और भारत का द्विपक्षीय वर्षिक कारोबार 50 अरब डॉलर के ऊपर
2018 में यूएई और भारत का द्विपक्षीय कारोबार 50 अरब डॉलर से ऊपर का रहा है. हाल ही के वर्षों में भारत यूएई का दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा कारोबारी साझीदार बन गया है. भारत ने यूएई में लगभग 55 अरब डॉलर का निवेश किया है. भारतीय विदेश मंत्रालय द्वारा जारी एक रिपोर्ट के अनुसार दुबई के रियल स्टेट बाजार में भारतीय सबसे बड़े विदेशी निवेशक हैं.

भारत सरकार द्वारा जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 को निष्प्रभावी किये जाने के बाद, यूएई ने अपने संबंधों को और मजबूत करने का फैसला किया. दुबई के पोर्ट ऑपरेटर डीपी वर्ल्ड ने जम्मू-कश्मीर के विकास के लिए वहां एक लॉजिस्टिक हब तैयार करने की योजना बनाई है. भारत में यूएई के राजदूत अहमद अल बन्ना ने इस संबंध में कहा था कि कश्मीर में इस बदलाव के बाद वहां सामाजिक न्याय और सुरक्षा में बेहतरी आएगी. जिससे इलाके में स्थिरता और शांति को बनाने में मदद मिलेगी.

दुबई के पोर्ट ऑपरेटर डीपी वर्ल्ड ने जम्मू-कश्मीर के विकास के लिए वहां एक लॉजिस्टिक हब तैयार करने की योजना बनाई है.


वहीं, भारत सरकार के आलोचकों का मानना है कि सरकार के इस कदम के बाद कश्मीर की संस्कृति और आबादी में व्यापक बदलाव होगा. जिसके बाद कश्मीर डेमोग्रामी में बदल होगा और राज्य के मुसलमानों की स्थिति में व्यापक बदलाव होगा.

तुर्की ने कश्मीर पर पाकिस्तान का दिया साथ
धार्मिक भावनाओं की वजह से तुर्की की कश्मीर में दिलचस्पी काफी बढ़ गई है. दरअसल, तुर्की पूरी इस्लामी दुनिया में खुद को मुसलमानों का सरपरस्त और नेता बनने की होड़ में शामिल हो गया है. कश्मीर के जरिए तुर्की मुस्लमानों में अपना प्रभाव जमाना चाहता है. तुर्की ने संयुक्त राष्ट्र संघ में पाकिस्तान का खुलकर समर्थन किया है. इसके अलावा ईरानी भी कश्मीर के जरिए इस्लामी जगत में अपना प्रभाव जमाना चाहता है.

पैन इस्लामवाद से प्रेरिक तुर्की ने कश्मीर पर पाकिस्तान का साथ दिया है.


भारत के एक पूर्व राजनयिक का कहना है कि तुर्की-पाकिस्तान के संबंधों के पीछे का कारण पैन-इस्लामवाद की विचार धारा है. वर्तमान समय में एर्दोगन स्वयं में एक उदारवादी इस्लामी नेता के रूप में प्रजेंट कर रहे हैं. एर्दोगन ने तुर्की की धर्मनिरपेक्षता के चरित्र को काफी हदतक बदल कर रख दिया है.

कश्मीर पर भारत के कदम के विरोध में ईरान के 60 छात्रों ने सांकेतिक विरोध जताया है. साथ ही ईरान के राष्ट्रपति हसन रोहानी और विदेश मंत्रालय ने बहुत सावधानी से बयान जारी कर भारत पाकिस्तान के बीच बातचीत और शांति की मांग की.

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने कश्मीर को मुसलमानों का मुद्दा बनाने की कोशिश की है.


हालांकि अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते भारत और ईरान के बीच व्यापार काफी सीमित हो गया है. गौरतलब है कि तुर्की और भारत के बीच लगभग 7 अरब डॉलर का वर्षिक कारोबार है. भारत ने तुर्की द्वारा पाकिस्तान का समर्थन करने पार 2.7 अरब डॉलर के रक्षा सौदे को रद्द कर दिया है.

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First published: October 26, 2019, 1:53 PM IST
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