नॉर्थ-ईस्ट राज्यों के विरोध के बावजूद BJP को क्यों चाहिए सिटीजनशिप बिल ?

नॉर्थ-ईस्ट राज्यों के विरोध के बावजूद BJP को क्यों चाहिए सिटीजनशिप बिल ?
सिटीजनशिप बिल का नार्थ-ईस्ट में है भारी विरोध (File Photo)

इस बिल में पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी या ईसाई समुदाय के अवैध घुसपैठियों को भारतीय नागरिकता देने का प्रावधान है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 4, 2019, 4:47 PM IST
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एक तरफ जहां पूर्वोत्तर के राज्यों में लगातार सिटीजनशिप बिल-2016 (नागरिकता संशोधन विधेयक) का विरोध हो रहा है, वहीं दूसरी तरफ पीएम नरेंद्र मोदी ने साफ़ कर दिया है कि वो राज्यसभा में लटके इस बिल को पास करने के लिए प्रतिबद्ध हैं. पीएम ने 3 फरवरी को जम्मू के विजयपुर में एक रैली को संबोधित करते हुए कहा कि वो मां भारती के उन सभी बच्चों के साथ खड़े रहेंगे जिन्हें पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश में परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है. उधर, नॉर्थ-ईस्ट राज्यों की सभी राजनीतिक पार्टियों ने इस बिल का खुलकर विरोध कर दिया है.

मोदी ने क्या कहा ?
पीएम ने रैली में साफ़ कहा कि पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश में मां भारती की ऐसी अनेक संताने हैं जिन पर अत्याचार हुआ है. वो कभी हमारे गणतंत्र का हिस्सा थे, हमें अविभाजित भारत (1947.से पहले) के ऐसे अपने भाइयों की रक्षा, उनके लिए न्याय और उनके नागरिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध हैं.

नागरिकता (संशोधन) विधेयक 2016 क्या कहता है ?
नागरिकता संशोधन विधेयक, 2016 के माध्यम से सरकार अवैध घुसपैठियों की परिभाषा की फिर से व्याख्या करना चाहती है. इसके जरिए नागरिकता अधिनियम, 1955 में संशोधन कर पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी या ईसाई समुदाय के अवैध घुसपैठियों को भारतीय नागरिकता देने का प्रावधान है. हालांकि इस विधेयक में पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश में उत्पीड़न का शिकार मुस्लिम अल्पसंख्यकों (शिया और अहमदिया) को नागरिकता देने का प्रावधान नहीं है. इसके आलावा, इस विधेयक में 11 साल तक लगातार भारत में रहने की शर्त को कम करते हुए 6 साल करने का भी प्रावधान है. इसके उलट नागरिकता अधिनियम, 1955 के मुताबिक वैध पासपोर्ट के बिना या फर्जी दस्तावेज के जरिए भारत में घुसने वाले लोग अवैध घुसपैठिए की श्रेणी में आते हैं.



आखिर NRC के साथ-साथ सिटीजनशिप बिल कैसे ?
गौरतलब है कि नागरिकता संशोधन विधेयक, 2016 गैर मुस्लिमों को भारतीय नागरिकता देने की बात करता है जबकि NRC (राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर) इसके ठीक उलट काम को अंजाम दे रहा है. NRC के तहत 24, मार्च 1971 से भारत में अवैध रूप से रह रहे सभी धर्म के लोगों को सामने लाकर उन्हें वापस उनके देश भेजना है. अब नागरिकता संशोधन विधेयक पास होता है तो मुसलमानों को छोड़ दें तो किसी और धर्म के लिए NRC का कोई मतलब ही नहीं रह जाएगा.



इसके बाद देशों से भारत में रह रहे सभी गैर-मुस्लिम नागरिकता के लिए योग्य हो जाएंगे और उन्हें वापस नहीं भेजा जा सकेगा. पूर्वोत्तर में एनडीए के सहयोगी इस विधेयक का विरोध इस लिए कर रहे हैं क्योंकि वे इसे अपनी सांस्कृतिक, सामाजिक और भाषाई पहचान के साथ खिलवाड़ समझते हैं. जिसके लिए ये दल निरंतर संघर्ष करते आए हैं. इन दलों की दूसरी बड़ी चिंता यह भी है कि नागरिकता संशोधन विधेयक, 2016 लागू होने से NRC के तहत चिन्हित अवैध शरणार्थी या घुसपैठिओ संबंधी अपडेट कोई मायने नहीं रखेंगे. तीसरा बड़ा मुद्दा यहा है कि यह विधेयक धर्म के आधार पर नागरिकता प्रदान करने की बात करता है. जबकि NRC में एक निश्चित समय सीमा के बाद से भारत में अवैध तौर पर रह रहे सभी अवैध घुसपैठियों की पहचान कर वापस भेजने की बात है.

नार्थ-ईस्ट में है भारी विरोध
2019 लोकसभा चुनावों के लिए बीजेपी ने नॉर्थ ईस्ट डेमोक्रेटिक अलायंस (NEDA) के सहारे चुनावों में उतरने का सपना देखा है. हालांकि ये नागरिकता संशोधन विधेयक वाले मामले पर बीजेपी फंसती नज़र आ रही है. बिहार में बीजेपी की सहयोगी जेडीयू समेत पूर्वोत्तर के घटक दल इस बिल का कड़ा विरोध कर रहे हैं. इस बिल को लेकर 29 जनवरी को पूर्वोत्तर के 11 राजनीतिक दलों के साथ एक बैठक थी जिसमें बीजेपी को कड़े विरोध का सामना करना पड़ा है.

इस मुद्दे पर बीजेपी की सहयोगी कर रही असम गण परिषद (AGP) पहले ही अपना समर्थन वापस ले चुकी है. विधेयक के विरोध में हुई इस बैठक में मेघालय के मुख्यमंत्री और नेशनल पीपुल्स पार्टी (NPP) के अध्यक्ष कोनराड संगमा और मिजोरम में मुख्यमंत्री और मिजो नेशनल फ्रंट (MNF) के नेता जोरमथांगा ने हिस्सा लिया. इनके अलावा इस बैठक में जेडीयू ने केसी त्यागी समेत नागालैंड की नेशनल डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी (NDPP), त्रिपुरा की इंडीजीनस पिपुल्स फ्रंड ऑफ त्रिपुरा (IPFT), सिक्किम की सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट (SDF), के अलावा अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड और मणिपुर से NPP के नेता शामिल हुए. मिजोरम के मुख्यमंत्री और मिजो नेशनल फ्रंट के मुखिया जोरमथांगा ने कहा कि यह बिल हमारे लिए खतरनाक और हानिकारक है. उन्होंने भाजपा के साथ अपने गठबंधन को लेकर भी चेतावनी दी. एजीपी प्रमुख अतुल बोरा ने सभी परियों के इस बैठक को ऐतिहासिक करार दिया। असम गण परिषद् ने लोकसभा में सिटिजनशिप बिल पास होने के बाद इस महीने भाजपा से गठबंधन तोड़ लिया था.



इन नेताओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से मिलकर नागरिकता संशोधन विधेयक पर अपना विरोध दर्ज कराने की बात कही. इसके अलावा जेडीयू नेता केसी त्यागी ने कहा कि एनडीए की अन्य सहयोगी शिवसेना और आकाली दल भी इस विधेयक के खिलाफ हैं. यदि कांग्रेस राज्यसभा में इस विधेयक के विरोध में वोट करती है तो यह पास नहीं होगा. मेघालय के मुख्यमंत्री कोनार्ड संगमा इस बिल का विरोध करने वाले शुरूआती लोगों में शामिल थे. उन्होंने कहा कि सभी पार्टियां अपने-अपने राज्यों में विरोध कर रही थी. हमने उन्हें साथ आकर एक आवाज में बात उठाने को कहा है. कोनार्ड की एनपीपी और भाजपा ने पिछले साल मिलकर मेघालय में सरकार बनाई थी. मीटिंग में दो प्रस्ताव पास हुए, पहला कि अगर यह बिल राजयसभा में पास हो गया तो एक प्रतिनिधि मंडल राष्ट्रपति से मुलाकात करेगा और प्रधानमंत्री से भी इस मुद्दे पर चर्चा करेगा. दूसरा सभी पार्टियां एक कमेटी बनाएगी जो इस बिल के खिलाफ जनभावना को एक करेगी.

बीजेपी क्यों अड़ी हुई है ?
दरअसल असम में NRC के जरिए बीजेपी ने ये जताने की कोशिश की है कि अवैध घुसपैठियों की समस्या से जुड़े उसके वादों को लेकर वो काफी गंभीर है. केंद्र की बीजेपी सरकार के इस कदम को जबरदस्त समर्थन हासिल हुआ है. बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह और पीएम नरेंद्र मोदी लगातार बांग्लादेश से आए मुस्लिम घुसपैठियों देश की सुरक्षा के लिए खतरा बताते रहे हैं और इस मुद्दे को भावनात्मक रूप भी देने की कोशिश हुई है.



दूसरी तरफ बीजेपी ने ही 2014 लोकसभा चुनावों के घोषणापत्र में सत्ता में आने पर पाकिस्तान जैसे देशों में उत्पीड़न का शिकार होकर भारत आने वाले हिंदू शरणार्थियों को नागरिकता देने का वादा किया था जो अभी तक पूरा नहीं हो पाया है. पूर्वोत्तर में लोकसभा की 25 सीटें आती हैं, और यूपी जैसे बड़े राज्य में सपा-बसपा गठबंधन के बाद इन 25 सीटों पर बीजेपी की नज़र है. दरअसल बीजेपी उत्तर और पश्चिम भारत में होने वाले संभावित नुकसान की भरपाई इन सीटों से करना चाहती है. लेकिन बीजेपी के इस प्लान को धक्का लग सकता है क्योंकि नागरिकता संशोधन विधेयक का विरोध कर रहे अधिकतर क्षेत्रीय दल अपने-अपने राज्यों में बीजेपी के साथ मिलकर सरकार चला रहे हैं.

मिजोरम के उदाहरण से समझें
26 जनवरी को मिजोरम के सबसे बड़े स्टूडेंट ऑर्गनाइजेशन MZP (Mizo Zirlai Pawl) के नेतृत्व में नागरिकता बिल के विरोध में प्रोटेस्ट हुआ जिसमें 30 हज़ार से ज्यादा लोगों ने हिस्सा लिया. इस प्रदर्शन में लोगों को 'Hello China, Bye Bye India' जैसे नारे लगाते हुए सुना गया. मिजोरम की दिक्कत हिंदू माइग्रेंट से जुड़ी हुई नहीं है बल्कि ये चकमा नाम की एक ट्राइबल कम्युनिटी से जुड़ी है जो ज्यादातर बौद्ध हैं.

चकमा कम्युनिटी बांग्लादेशी सीमा से जुड़े चिटगांव इलाके की पहाड़ियों के आस-पास रहती है. ये इलाका मिजोरम के साथ अंतरराष्ट्रीय बॉर्डर भी साझा करता है. यहां चकमा लोगों की तादात 1 लाख के आस-पास है जबकि 87% आबादी ईसाई है. मिजोरम में चकमा को भी बांग्लादेश से आई हुई घुसपैठिया कम्युनिटी माना जाता है, हालांकि चकमा का दावा है कि वो हमेशा से भारतीय ही हैं. चकमा और मिजो के बीच जातीय संघर्षों का भी इतिहास रहा है. मिजोरम की बड़ी आबादी चकमा को बाहरी मानती है और ऐसी कई घटनाएं देखने को मिली हैं जिसमें चकमा लोगों को वोटर आईकार्ड बनवाने और कॉलेजों में पढ़ने से रोका जाता रहा.



मिज़ो कम्युनिटी संगठनों का कहना है कि वो चकमा जो कानूनन भारतीय हैं उनसे दिक्कत नहीं है लेकिन घुसपैठ कर रह रहे चकमा लोगों को मिजोरम छोड़ना ही होगा. अगर चकमा इसी तरह बढ़ते रहे तो एक दिन मिजो इस राज्य में अल्पसंख्यक हो जाएंगे. MZP का कहना है कि बिल से घुसपैठिये चकमा लोगों को बढ़ावा मिलेगा और मूल मिजो लोगों में इसे लेकर काफी गुस्सा है. उनका कहना है कि 'हेलो चाइना' के नारे लगाने का मतलब भी यही है कि हम भारत के नागरिक हैं और सुरक्षा के लिए क्या अब हमें चीन की तरफ देखना होगा.
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