SC/ST एक्ट से क्यों नाराज हैं सवर्ण?

सुप्रीम कोर्ट ने इस एक्ट से जुड़ा एक फैसला इसी साल मार्च में दिया, जिसके बाद एक्ट में बहुत से बदलाव आ गये थे. इसके बाद सरकार ने अगस्त के महीने में इस एक्ट पर एक संशोधन बिल लाकर इसे इसके 1989 वाले रूप में ही लागू कर दिया है.

News18Hindi
Updated: September 6, 2018, 2:51 PM IST
SC/ST एक्ट से क्यों नाराज हैं सवर्ण?
SC/ST एक्ट के विरोध में देश भर की कई जगह हिंसक प्रदर्शन हो रहे हैं.
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Updated: September 6, 2018, 2:51 PM IST
अनुसूचित जाति-जनजाति के लोगों पर होने वाले भेदभाव को रोकने के मकसद से अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार रोकथाम) अधिनियम, 1989 में बनाया गया था. यह एक्ट SC / ST समुदायों को अत्याचारों से बचाने के लिए लाया गया था. सुप्रीम कोर्ट ने इस एक्ट से जुड़ा एक फैसला इसी साल मार्च में दिया, जिसके बाद एक्ट में बहुत से बदलाव आ गये थे. इसके बाद सरकार ने अगस्त के महीने में इस एक्ट पर एक संशोधन बिल लाकर इसे इसके 1989 वाले रूप में ही लागू कर दिया है. इसके बाद से सवर्ण जातियां केंद्र सरकार के इस कदम का विरोध कर रही हैं. ये है पूरा मामला -

पहले भी होता था ऐसा ही एक्ट
1955 के प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स एक्ट के बावजूद सालों तक न तो छुआछूत का स्तर देश में कम हुआ था और न ही दलितों पर अत्याचार और उनसे भेदभाव रुका था. जबकि भारतीय संविधान नागरिकों को समानता का मौलिक अधिकार देता है. यह भेदभाव इसका उल्लंघन करता है. अनुमानत: यह समुदाय देश में कुल आबादी का चौथाई है. आजादी के तीन दशक बाद भी उनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति तमाम मानकों पर बेहद खराब थी.

इस एक्ट में SC/ ST समुदायों को मिली थी कई तरह की सुविधाएं

SC/ ST Act, 1989 में यह प्रावधान थे -
1. जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल करने पर तुरंत मामला दर्ज होता था.

2. इनके खिलाफ मामलों की जांच का अधिकार इंस्पेक्टर रैंक के पुलिस अधिकारी के पास भी था.
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3. केस दर्ज होने के बाद तुरंत गिरफ्तारी का प्रावधान था.

4. ऐसे मामलों की सुनवाई केवल स्पेशल कोर्ट में ही होती थी. साथ ही अग्रिम जमानत भी नहीं मिलती थी. सिर्फ हाईकोर्ट से ही जमानत मिल सकती थी.

एससी-एसटी एक्ट 1989 में पीड़ित दलितों के लिए आर्थिक मदद और सामाजिक पुनर्वास की व्यवस्था भी की गई थी. इसमें यह भी प्रावधान था कि मामले की जांच और सुनवाई के दौरान पीड़ितों और गवाहों की यात्रा और जरूरतों का खर्च सरकार की तरफ से उठाया जाए. प्रोसिक्यूशन की प्रक्रिया शुरू करने और उसकी निगरानी करने के लिए अधिकारी नियुक्त किया जाए.

सुप्रीम कोर्ट ने कर दिए थे कई बदलाव
सुप्रीम कोर्ट ने 21 मार्च, 2018 में दिए अपने फैसले में कहा था कि सरकारी कर्मचारियों की गिरफ्तारी सिर्फ सक्षम अथॉरिटी की इजाजत के बाद ही हो सकती है. इसके अलावा जो लोग सरकारी कर्मचारी नहीं हैं, उनकी गिरफ्तारी जांच के बाद SSP की इजाजत से हो सकेगी.

बेगुनाह लोगों को बचाने के लिए कोई भी शिकायत मिलने पर तुरंत मुकदमा दर्ज नहीं किया जायेगा. कोर्ट के इस आदेश और नई गाइडलाइंस के बाद से इस समुदाय के लोगों का कहना है कि ऐसा होने के बाद उन पर अत्याचार बढ़ जायेगा. कुछ लोगों ने इसे संसदीय कार्यों में कोर्ट का हस्तक्षेप भी बताया था.

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद कई दलित संगठनों ने मिलकर 2 अप्रैल को भारत बंद किया था. इसके दौरान देश भर में कई जगह हिंसा भी हुई थी और करीब एक दर्जन लोगों की जान चली गई थी. साथ ही केंद्र सरकार का भी इस दौरान बहुत विरोध हुआ था. दलित संगठनों ने इस फैसले के लिए केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहराया था. और इसमें 9 अगस्त तक संशोधन न होने की स्थिति में दलितों ने फिर से आंदोलन करने की बात कही थी.

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पिटिशन भी दायर किया था. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में आगे की सुनवाई से पहले कोई भी स्टे देने से मना कर दिया था. जिसके बाद सरकार ने इस मामले में SC/ ST Act पर संशोधन विधेयक लाने का फैसला किया था.

दलित भारत में कुल जनसंख्या के एक-चौथाई के करीब हैं. इसलिए कांग्रेस समेत ज्यादातर विपक्षी दल इसके सपोर्ट में थे. इसके बाद से फिर SC/ ST Act, 1989 वाली स्थिति कायम हो गई है. जिसमें -

1. FIR से पहले नहीं होगी जांच
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि SC/ ST Act, 1989 के अंतर्गत आने वाले मामलों में पहले DSP स्तर का अधिकारी जांच करे फिर मामले की FIR दर्ज हो लेकिन इसके बाद इसे हटा दिया गया और पहले की स्थिति ही कायम कर दी गई है. जिसमें तुरंत FIR दर्ज करने का प्रावधान है. अब इस मामले की जांच इंस्पेक्टर रैंक के पुलिस अधिकारी करेंगे.

2. बिना इजाजत किया जा सकेगा गिरफ्तार
पहले जिसके खिलाफ इस एक्ट के तहत शिकायत की गई है उसे तुरंत गिरफ्तार किया जा सकता था. लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद से यह स्थिति बदल गई थी और जांच के बाद गिरफ्तारी होनी थी. बल्कि अगर जिसके खिलाफ शिकायत की गई है वह सरकारी कर्मचारी है तो उसके ऊपर के अधिकारी की अनुमति के बाद ही गिरफ्तारी हो सकती थी. इसको भी नए संशोधन बिल से बदलकर यथास्थिति में पहुंचा दिया गया है.

3. अग्रिम जमानत पर फिर लग गई रोक
सुप्रीम कोर्ट ने sc/ st एक्ट के तहत आने वाले फर्जी मामलों का जिक्र करते हुए, इस एक्ट के तहत आने वाले मामलों में सुनवाई के आधार पर अग्रिम जमानत की व्यवस्था भी की थी. जिसे अब खत्म कर दिया गया है. लेकिन नियमित जमानत मिल सकेगी.

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