क्या अगले कुछ महीनों में Covid vaccine का तीसरा डोज लेना होगा?

हमारा इम्यून सिस्टम उस वैक्सीन को याद रखता है, जो शरीर को पहले दिया जा चुका है (Photo- news18 English via AFP)

हमारा इम्यून सिस्टम उस वैक्सीन को याद रखता है, जो शरीर को पहले दिया जा चुका है (Photo- news18 English via AFP)

संक्रामक रोग व‍िशेषज्ञ एंथनी फाउची (Anthony Fauci) ने सालभर के भीतर कोविड-19 वैक्सीन के बूस्टर डोज (booster dose of Covid-19 vaccine) की जरूरत बताई. ये डोज एक खास फॉर्मूला पर काम करता है, जिसे इम्युनोलॉजिकल मैमोरी (immunological memory) कहते हैं.

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कोरोना की दूसरी लहर (second wave of coronavirus) अब तक भारत के अलग-अलग राज्यों में तबाही लाए हुए है. इसी बीच खबर आ रही है कि ब्रिटेन में ट्रिपल म्यूटेंट कोरोना वायरस (triple mutant coronavirus found in Britain) मिला, जो पहले से ज्यादा संक्रामक है. इसके साथ ही एक बार फिर से कोरोना वैक्सीन के बूस्टर डोज की बात जोर पकड़ने लगी. अमेरिकी संक्रामक रोग व‍िशेषज्ञ एंथनी फाउची ने हाल ही में बूस्टर डोज (booster dose of Covid-19) की जरूरत बताते हुए कहा कि शायद सालभर के भीतर ही इसकी जरूरत पड़ जाए.

क्या कहना है विशेषज्ञों का 

नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ एलर्जी एंड इन्फेक्शियस डिजीज (NIAID) के निदेशक फाउची ने कहा कि कोरोना से जंग के लिए बूस्टर डोज अहम होगी. कुछ इसी तरह का बयान फाइजर के सीईओ अल्बर्ट बाउर्ला ने भी दिया. उनके मुताबिक अगले 8 से 12 महीने में वैक्सीन की बूस्टर डोज की जरूरत हो सकती है. फाइजर ने इसपर काम भी शुरू कर दिया है.

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नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ एलर्जी एंड इन्फेक्शियस डिजीज के निदेशक एंथनी फाउची (news18 English file photo)

इस फॉर्मूला पर होता है काम 

असल में बूस्टर डोज एक खास तरीके पर काम करते हैं, जिसे इम्युनोलॉजिकल मैमोरी कहते हैं. हमारा इम्यून सिस्टम उस वैक्सीन को याद रखता है, जो शरीर को पहले दिया जा चुका है. ऐसे में तयशुदा समय के बाद वैक्सीन की छोटी खुराक यानी बूस्टर का लगना इम्यून सिस्टम को तुरंत सचेत करता है और वो ज्यादा बेहतर ढंग से प्रतिक्रिया करता है.

रिसर्च के दौरान कई दशक पहले मिली थी जानकारी 



साठ के दशक में विशेषज्ञ इस नतीजे पर पहुंचे थे. तब देखा गया कि एक ही बार में वैक्सीन की बड़ी खुराक देने पर शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता इस ढंग से प्रतिक्रिया नहीं करती है. वहीं खुराक को अगर छोटे-छोटे हिस्सों में कुछ-कुछ समय के बाद दिया जाए तो शरीर में ज्यादा बेहतर ढंग से एंटीबॉडी विकसित हो पाती है.

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नया स्ट्रेन आने पर भी बूस्टर की जरूरत हो सकती है 

म्यूटेशन की अवस्था में भी बूस्टर डोज जरूरी हो जाता है, जैसा कि कोरोना वायरस के मामले में दिख रहा है. यानी वायरस समय के साथ म्यूटेट होने लगें यानी नया बदलाव पाकर वे ज्यादा घातक हो जाएं तो ऐसे में पुराने डोज से बनी एंटीबॉडी काम नहीं करती है. तब म्यूटेट हुए वायरस के मुताबिक पुराने फॉर्मूला में ही थोड़े बदलाव होते हैं और ये बूस्टर लेना जरूरी होता है.

booster dose of covid vaccine
म्यूटेट हुए वायरस के मुताबिक पुराने फॉर्मूला में ही थोड़े बदलाव होते हैं - सांकेतिक फोटो (pixabay)

मुख्य डोज को क्या कहते हैं 

फिलहाल दुनिया में ज्यादातर कोरोना वैक्सीन जो दी जा रही हैं, उनके दो डोज कुछ समय के अंतराल पर मिल रहे हैं. ये दोनों डोज मिलकर प्राइम डोज कहलाएंगे. इनके बाद भी अगर कोई डोज सालभर या उससे भी ज्यादा समय के बाद लगवाने को कहा जाए तो उसे बूस्टर कहा जाएगा.

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बूस्टर अलग-अलग तरह से करता है काम 

अलग-अलग बीमारियों के लिए बूस्टर डोज अलग तरह से काम करता है. जैसे बच्चों की बीमारियों में, जैसे काली खांसी के लिए बूस्टर जल्दी लगते हैं. वहीं टिटनेस के लिए WHO कहता है कि इसका बूस्टर 10 सालों में लिया जाना चाहिए क्योंकि शरीर की प्रतिरोधक क्षमता घट चुकी होती है.

booster dose of covid vaccine
हेट्रोलॉगस प्राइम बूस्टिंग में दो अलग-अलग वैक्सीन के डोज लिए जाते हैं- सांकेतिक फोटो

बूस्टर के दौरान एक खास प्रयोग भी हो रहा है

इसमें टीके का प्राइम डोज किसी और वैक्सीन निर्माता कंपनी से लगवाया गया और बूस्टर डोज किसी और का. इसे से हेट्रोलॉगस प्राइम बूस्टिंग कहा जाता है. इसके तहत एक वैक्सीन लेने के बाद बूस्टर में किसी दूसरे ब्रांड की वैक्सीन लेने पर एंटीबॉडी ज्यादा प्रभावी हो जाती हैं.

स्पेन में दो वैक्सीन के मिक्स डोज लेने पर प्रयोग

न्यूज एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक, इसे लेकर स्पेन में सरकारी संस्थान कार्लोस III हेल्थ इंस्टीट्यूट (Carlos III Health Institute) में एक स्टडी हुई. इसके तहत ट्रायल में शामिल लोगों को पहला डोज एस्ट्राजेनेका का दिया गया, जबकि दूसरा फाइजर का. 670 लोगों पर हुई इस स्टडी में दिखा कि ऐसे लोगों में एंटीबॉडी समान वैक्सीन के दो डोज लेने वालों की तुलना में कई गुना बढ़ गई. ब्रिटेन में भी इसे लेकर स्टडी हो रही है, हालांकि उसके नतीजे अभी उतने स्पष्ट नहीं हो सके हैं.

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