Budget 2021: क्यों पहले सुबह की बजाए शाम 5 बजे पेश होता था बजट?

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के आम बजट भाषण की शुरुआत हो चुकी है (Photo- news18 English via Reuters)

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के आम बजट भाषण की शुरुआत हो चुकी है (Photo- news18 English via Reuters)

ब्रिटिश इंडिया के दौरान आम बजट (budget) पेश करने की रवायत हुई और उन्हीं की सुविधा के लिए इसका समय शाम 5 बजे रखा गया. इससे लंदन में हाउस ऑफ कॉमन्स (House of Commons in London) के सांसद इसे आराम से सुना पाते थे.

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 2, 2021, 1:09 AM IST
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Union Budget 2021: वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के आम बजट भाषण की शुरुआत हो चुकी है. ये हमेशा की तरह पहली फरवरी की सुबह 11 बजे शुरू हुआ, हालांकि हमेशा से ऐसा नहीं था. पहले आम बजट फरवरी के आखिरी दिन पेश होता था, और वो भी शाम के 5 बजे. ये चलन साल 1924 में अंग्रेज वित्त विशेषज्ञ बेसिल ब्लेकेट ने शुरू किया, जो साल 1999 तक जारी रहा.

शाम का बजट क्यों था

भारतीय समयानुसार शाम को 5 बजे संसद की किसी कार्रवाई का चलना काफी अजीब लगता है. तब आखिर ये शाम की परंपरा क्यों डली? इसके पीछे था ब्रितानी राज. दरअसल तब गुलाम देश में बजट भी स्वतंत्र नहीं होता था. लिहाजा सबकुछ अंग्रेजों की सुविधा से हुआ करता.

भारत और ब्रिटेन के समय का फर्क कारण
भारत और ब्रिटेन में समय का फर्क 5 से 6 घंटों का है. हम समय में उनके इन कुछ घंटों तक आगे रहते हैं. ऐसे में हमारे यहां जब शाम के 5 बजते, तब ब्रिटिश राजधानी लंदन में सुबह के लगभग 11 बजे होते. ब्रिटिश संसद में हाउस ऑफ कॉमन्स के नेता आराम से तैयार होकर रेडियो पर बजट सुन पाते थे. ये एक बड़ी वजह रही कि हमारे ही बजट का समय उनकी सुविधा के मुताबिक हो गया.

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तब गुलाम देश में बजट भी स्वतंत्र नहीं होता था- सांकेतिक फोटो


स्टॉक एक्सचेंज भी एक वजह



एक वजह ये भी थी कि समय के फर्क से लंदन स्टॉक एक्सचेंज पर फर्क पड़ता था. अगर हम अपने 11 बजे बजट की कार्रवाई शुरू करते तो ब्रिटेन में तब सुबह के 5 बजे होते. इस समय स्टॉक एक्सचेंज बंद रहता था और बजट के मुताबिक कोई हलचल नहीं हो पाती थी. यही देखते हुए ब्रिटिश इंडिया के बजट का समय शाम 5 बजे कर दिया गया.

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फरवरी के बाद अंग्रेज कर्मचारी आराम करने चले जाते

अब बात करते हैं कि फरवरी के आखिरी दिन बजट रखने का क्या अर्थ था! दरअसल बजट की तैयारी काफी खून-पसीना मांगती है. इससे जुड़े कर्मचारी लगातार जागकर काम करते हैं और तब जाकर बजट तैयार होता है. तो इन कर्मचारियों-अधिकारियों को आराम देने के लिए इसे फरवरी के आखिरी दिन पेश किया जाने लगा ताकि अगले दिन और महीने की शुरुआत में बजट से जुड़े लोग छुट्टी लेकर आराम कर सकें. तब अधिकतर ऐसा होता था कि बजट के तुरंत बाद संबंधित लोग लंबी छुट्टियों पर चले जाते थे.

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बजट की तैयारी काफी खून-पसीना मांगती है- सांकेतिक फोटो (pixabay)


फिर हुआ ऐसा कि देश की आजादी के बाद भी परंपरा चलती रही

नेताओं को इसमें सुधार का खयाल तो आया होगा लेकिन बदलाव के लिए और भी कई चीजें लगातार सामने खड़ी रहीं. शाम 5 बजे बजट के बाद वित्त मंत्री को मीडिया का जवाब भी देना होता था. ये सारी कार्रवाई खत्म होते-होते आधी रात हो जाया करती. बजट जैसी लंबी प्रक्रिया के बाद ये काफी थकाने वाला काम होता. तब नेताओं के बीच बजट पेश करने के समय को लेकर चर्चा होने लगी थी.

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भूतपूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा उस दौरान वाजपेयी सरकार में वित्त प्रमुख थे. उस समय वित्त सचिव विजय केलकर थे. उनका भी यही मानना था कि सुबह ही बजट आए तो बेहतर होगा. ये साल 1999 की बात है. उसी साल की जनवरी में समय के बदलने पर चर्चा हुआ और शुरुआत भी हो गई. तब 27 फरवरी को सुबह 11 बजे साल 1999-2000 का बजट पारित हुआ. इसी तरह से महीने में भी बदलाव हो गया.

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अब चर्चा ये है कि बजट फरवरी की बजाए जनवरी में ही पेश किया जा सकता है. इससे होगा ये कि मार्च खत्म होने से पहले सबके पास, जिसमें आम आदमी से लेकर कंपनियां भी शामिल हैं, बजट को लेकर स्पष्टता होगी. खासकर कॉर्पोरेट तय कर सकेंगे कि उन्हें किस तरह से अपना सालाना बजट तैयार करना है.
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