आखिर क्यों ताइवान के साथ किसी भी देश के रिश्तों पर भड़कता है चीन

आखिर क्यों ताइवान के साथ किसी भी देश के रिश्तों पर भड़कता है चीन
ताइवान खुद को स्वतंत्र देश मानता है तो चीन उसको अपना एक प्रांत

अमेरिका के हेल्थ मिनिस्टर ताइवान के दौरे पर क्या पहुंचे, चीन भड़क उठा. दरअसल चीन कतई ये बर्दाश्त नहीं करता कि दुनिया का कोई भी मुल्क ताइवान को एक अलग देश मानते हुए उसके साथ राजनयिक रिश्ते बनाए. वो ताइवान को अपना प्रांत मानता है. जानते हैं कि ताइवान और चीन के अजीब से रिश्तों के बारे में

  • News18Hindi
  • Last Updated: August 10, 2020, 6:19 PM IST
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चीन फिर ताइवान को लेकर अमेरिका पर भड़का हुआ है. दरअसल अमेरिकी स्वास्थ्य मंत्री ताइवान के दौरे पर हैं. इसने चीन को आगबबूला कर दिया है. आखिर चीन और ताइवान के रिश्ते क्या हैं, जो लोगों की समझ में नहीं आते. ताइवान खुद को एक आजाद देश कहता है लेकिन चीन उसको अपना अंग मानता है. दोनों के रिश्ते अगर आप समझने की कोशिश करें तो वो इतने जटिल हैं कि एकबारगी आपकी सिर ही घुमा देंगे.

वैसे चीन को ये कतई पसंद नहीं है कि कोई भी देश ताइवान को संप्रभु देश मानते हुए उसके साथ रिश्ते बनाए. इसलिए दुनियाभर के बहुत गिने-चुने देशों के साथ ही ताइवान के रिश्ते हैं. चीन के दबाव के चलते ही वो संयुक्त राष्ट्र संघ का भी सदस्य नहीं है. अगर कोई देश ताइवान के साथ राजनयिक रिश्ता बनाना चाहता है तो ये बात चीन को बहुत नागवार गुजरती है.

चीन का कहना है कि चीन केवल एक देश है, और जो असल देश है वो पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चीन यानि पीआरसी है. वो हमेशा से ताइवान को खुद का अभिन्न अंग मानता रहा है.



उसने ताइवान को धमकी दे रखी है कि वो खुद को स्वतंत्र देश घोषित नहीं कर सकता. अगर उसने ऐसा किया तो वो उसके खिलाफ बल प्रयोग से भी नहीं हिचकिचाएगा. साथ-साथ चीन उस पर वन चाइना पॉलिसी के तहत डोरे भी डालता रहता है. उससे कहता है कि वो चीन की संप्रुभता स्वीकार कर ले बदले में पूरी स्वायत्ता हासिल कर ले. लेकिन ताइवान ने हमेशा इससे दृढता से इनकार किया है.
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चीन एक काम और करता है. दुनियाभर में उसने साफ कर दिया है कि जो भी देश उससे रिश्ता रखना चाहते हैं, उन्हें ताइवान से संबंध तोड़ने होंगे.

ताइवान में केवल 15 देशों के दूतावास
इसी के चलते ताइवान में केवल 15 देशों के ही दूतावास हैं. इसके अलावा एक कौंसुलेट और 53 देशों के प्रतिनिधियों के आफिस हैं. वहीं ताइवान ने भी दुनिया के 15 देशों में ही दूतावास खोले हैं. दो देशों में उसके कौंसुलेट हैं तो 89 देशों में रिप्रेजेंटेशन है. यहां तक की भारत में भी ना तो ताइवान का कोई दूतावास है और ताइवान की राजधानी में भारत का दूतावास.

चीन से तनावपूर्ण रिश्तों के चलते आमतौर पर दुनिया के देशों के ताइवान के राजनयिक रिश्ते नहीं हैं. उसकी राजधानी में मुश्किल से 15 देशों के दूतावास हैं लेकिन इसमें कोई बड़ा देश नहीं है


कौन हैं ये छोटे-छोटे देश
जिन देशों के दूतावास ताइवान की राजधानी ताइपे में हैं, वो ये हैं- एलाइज, इस्वातिनी, ग्वाटेमाला, हैती, होली सी, होंडूरास, मार्शल आइलैंड्स, नौरू, निकारागुआ, पलाऊ, पैरागुए, सेंट किस्ट एंड नेविस, सेंट लूसिया, तुवालु और सेंट विंसेंट एंड ग्रेनाडिनेस. शायद इसमे से बहुत से देशों का नाम आपने सुना भी नहीं होगा. क्योंकि इनमें से ज्यादातर दक्षिण पैसिफिक सी में बसे छोटे-छोटे द्वीपीय देश हैं. लेकिन इन सभी देशों पर अब चीन पहुंचकर मोटे निवेश के लुभावने प्रस्ताव रख रहा है और उनसे कह रहा है कि वो ताइवान को एक देश के तौर दी गई मान्यता को खत्म कर दें.

ताइवान पर चीन ने बढ़ाया दबाव
हाल में चीन ने इस द्वीप पर आर्थिक, सैनिक और कूटनीतिक दबाव भी बढ़ा दिया है. चीन का मानना है कि ताइवान उसका क्षेत्र है. चीन का कहना है कि ज़रूरत पड़ने पर ताक़त के ज़ोर उस पर कब्ज़ा किया जा सकता है.

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कोरोना में बहुत अच्छा रिकॉर्ड
ताइवान में इन दिनों साइ-इंग-वेन राष्ट्रपति हैं. उनसे चीन के संंबंध बहुत तल्खी भरे हैं. कोरोना के दौर में बार बार ताइवान का नाम सुर्खियों में आया था, क्योंकि उसने बहुत अच्छी तरह से इसे नियंत्रित किया था. पूरे ताइवान में अब तक कोरोना के केवल 480 मामले रिकार्ड किए गए. महज 07 लोगों की मौत हुई. यहां तक कि चीन के ही चलते वो वर्ल्ड हेल्थ आर्गनाइजेशन का भी सदस्य नहीं है.

पिछले कुछ दशकों में ताइवान ने तकनीक, व्यापार और चिकित्सा क्षेत्र में बड़ी छलांग मारी है. दुनिया के तमाम देश कोरोना मामले में उसकी नियंत्रण करने की पॉलिसी के कायल हो गए


अमेरिकी स्वास्थ्य मंत्री के दौरे से चीन को और मिर्ची लगी
फिलहाल चीन और अमेरिका के संबंधों में जितनी कड़वाहट घुल चुकी है. उसमें अमेरिकी स्वास्थ्य मंत्री अलेक्स का दौरा और कसेलापन बढ़ाएगा. क्योंकि चीन के कहने पर ही 1979 में अमेरिका ने ताइवान के साथ अपने राजनयिक संबंधों को प्रगाढ़ता नहीं दी थी बल्कि एक कदम पीछे खींच लिया था. 1979 में चीन का समर्थन करते हुए अमरीका ने ताइवान के साथ अपने आधिकारिक संबंध तोड़ लिए थे. भारत से भी यही कहा जा रहा है कि वो ताइवान से अपने रिश्ते और बेहतर करे.

ताइवान ने व्यापार, तकनीक में शानदार काम किया
ताइवान खुद को रिपब्लिक ऑफ चीन यानि आरओसी भी कहता है. अब अमेरिका इस गणतांत्रिक द्वीप के साथ अपने रिश्ते मज़बूत कर रहा है. हथियारों की बिक्री भी बढ़ा रहा है. वैसे अगर देखा जाए तो पिछले कुछ दशकों में तकनीक समेत कई क्षेत्रों में ताइवान ने गजब का काम किया है. ताइवान का व्यापार बहुत शानदार रहा है. उसने बहुत तरक्की की है.

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चीन ने ताइवान को अपना अलग प्रांत माना
चीन ने ताइवान को हमेशा से अपने ऐसे प्रांत के रूप में देखा है जो उससे अलग हो गया. चीन मानता रहा है कि भविष्य में ताइवान चीन का हिस्सा बन जाएगा. जबकि ताइवान की एक बड़ी आबादी अपने आपको एक अलग देश के रूप में देखना चाहती है. यही वजह रही है दोनों के बीच तनाव की.

चीन चाहता है कि ताइवान वन चाइना पॉलिसी को स्वीकार कर ले इसके बदले वो स्वायत्त रहकर अपना कामकाज करता रहे


क्या है कहानी
वर्ष 1642 से 1861 तक ताइवान नीदरलैंड्स की कॉलोनी था. उसके बाद चीन का चिंग राजवंश वर्ष 1683 से 1895 तक ताइवान पर शासन करता रहा. लेकिन साल 1895 में जापान के हाथों चीन की हार के बाद ताइवान, जापान के हिस्से में आ गया. 1945 में जिस ताइहोकु हवाई अड्डे पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस का हवाई जहाज दुर्घटनाग्रस्त माना जाता है. वो उस समय जापान के ही नियंत्रण में था. बाद में ताइवान के क्षेत्र में चला गया.

दूसरे विश्व युद्ध में जापान की हार के बाद अमेरिका और ब्रिटेन ने तय किया कि ताइवान को उसके सहयोगी और चीन के बड़े राजनेता और मिलिट्री कमांडर चैंग काई शेक को सौंप देना चाहिए.

चैंग भागकर ताइवान चले गए, वहां शासन किया
चैंग की पार्टी का उस वक़्त चीन के बड़े हिस्से पर नियंत्रण था. लेकिन कुछ सालों बाद चैंग काई शेक की सेनाओं को कम्युनिस्ट सेना से हार का सामना करना पड़ा. तब चैंग और उनके सहयोगी चीन से भागकर ताइवान चले आए और कई वर्षों तक 15 लाख की आबादी वाले ताइवान पर उनका प्रभुत्व रहा.
तब चैंग और उनके सहयोगी चीन से भागकर ताइवान चले आए और कई वर्षों तक 15 लाख की आबादी वाले ताइवान पर उनका प्रभुत्व रहा.

अमेरिका को ताइवान का अच्छा दोस्त माना जाता है
अमेरिका को ताइवान का सबसे अहम और एकमात्र दोस्त माना जाता रहा है. दूसरे विश्व युद्ध से साल 1979 तक दोनों देशों के संबंध बेहद घनिष्ठ रहे. फिर वर्ष 1979 में तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने चीन से रिश्ते प्रगाढ़ करने की पहल करते हुए ताइवान के साथ अपने राजनयिक संबंध तोड़े.हालांकि तब अमरीकी कांग्रेस ने इसके जवाब में 'ताइवान रिलेशन एक्ट' पास किया जिसके तहत तय किया गया कि अमरीका, ताइवान को सैन्य हथियार सप्लाई करेगा और अगर चीन ताइवान पर किसी भी तरह का हमला करता है तो अमेरिका उसे बेहद गंभीरता से लेगा.
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