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नेपाल के 'अंदरूनी' मामले में टांग अड़ा रहा है चीन.. क्यों और कैसे?

नेपाल और चीन के झंडे.
नेपाल और चीन के झंडे.

किसी देश की एक प्रमुख राजनीतिक पार्टी (Political Party) में कलह होती है और बात यहां तक पहुंचती है कि सरकार गिर जाती है. ऐसे में पड़ोसी देश इसे उस देश का 'अंदरूनी' मामला माने या अपने पक्ष में हवा बनाने की सियासत करे?

  • News18Hindi
  • Last Updated: December 27, 2020, 7:59 AM IST
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सियासत में हर तार एक-दूसरे से जुड़ा होता है. नेपाल में सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी (Nepal Communist Party) की सीवन उधड़ी और पार्टी में दोफाड़ की स्थिति बनी तो चीन की सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी के नेता और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग (China President Xi Jinping) ने नेपाल को राजनीतिक संकट से उबारने के ​लिए कोशिशें शुरू कर दी हैं. जिनपिंग ने एक 'हाई लेवल टीम' नेपाल भेजी है. क्यों? चीन का इसके पीछे क्या मकसद है और भारत का रवैया (India policy on Nepal) इस तरफ क्या है? इन तमाम सवालों के जवाब आपको जानने चाहिए क्योंकि नेपाल के सियासी संकट (Political Crisis of Nepal) का सीधा असर भारत पर पड़ना तय है ही.

पहले ही बताया जा चुका है कि नेपाल में कम्युनिस्ट पार्टी के एक धड़े ने प्रधानमंत्री केपी ओली पर अराजक और निरंकुश होने का आरोप लगाकर जब एक विधेयक पर उनका साथ नहीं दिया तो संसद भंग करने की सिफारिश पीएम ने की और राष्ट्रपति बिद्यादेवी भंडारी ने प्रतिनिधि सभा को भंग कर दिया. कथित तौर पर यह कदम नेपाल के संविधान के उपयुक्त नहीं रहा इसलिए पूरे देश में इस कदम के खिलाफ विरोध प्रदर्शन जारी हैं. वहीं, ओली और कम्युनिस्ट नेता पुष्पकमल दहल 'प्रचंड' के बीच गतिरोध बना हुआ है. इस बीच चीन ने नेपाल के मामले में दखलंदाज़ी की है.

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क्या है चीन की भूमिका का मतलब?
सबसे पहले तो आप यह याद रखें कि ओली और प्रंचड की पार्टी का विलय 2018 में हुआ था और कम्युनिस्ट विचार की दो अलग पार्टियां एक हो गई थीं. लेकिन पिछले कुछ समय से दोनों के बीच गतिरोध बना हुआ था. इधर, दुनिया की बड़ी कम्युनिस्ट ताकत चीन को समझा जाता है और विशेषज्ञों के मुताबिक हर प्रमुख क्षेत्र की कम्युनिस्ट पार्टियों के साथ किसी न किसी तरह से चीन के संबंध रहे हैं. ताज़ा हालात के मद्देनज़र चीन ने नेपाल में कम्युनिस्ट पार्टी के उप मंत्री गुओ येज़ांड के नेतृत्व में चार सदस्यों वाली टीम भेजी है.

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चीनी राष्ट्रपति जिनपिंग के साथ निवर्तमान नेपाली पीएम केपी ओली.


खबरों की मानें तो रविवार को नेपाल पहुंच रही इस चीनी टीम के ज़रिये जिनपिंग नेपाल के हालात का पूरा जायज़ा लेना चाहते हैं. चूंकि नेपाल में मध्यावधि चुनावों का ऐलान कर दिया गया है इसलिए चीन की कोशिश है कि वह अपने समर्थक ओली के पक्ष में कम्युनिस्ट पार्टी को फिर जोड़ सके. हालांकि प्रचंड ने पार्टी के भीतर दो तिहाई बहुमत का दावा कर चुनाव आयोग से कहा है कि उनके नेतृत्व वाले हिस्से को नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के रूप में स्वीकृति दी जाए.

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अब चीन पहले तो नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी को टूटने से बचाना चाहेगा और यह सूरत न मुमकिन होने पर कोशिश यह रहेगी कि कम से कम दोनों धड़े चुनाव मिलकर लड़ें ताकि वोटों का बिखराव कम हो. लेकिन चीन की इस कवायद के पीछे वजह क्या है?

अपने निवेश की चिंता में चीन?
जिनपिंग की महत्वाकांक्षी परियोजना बेल्ड एंड रोड इनिशिएटिव के चलते चीन ने नेपाल में खास तौर पर ट्रांस हिमालय मल्टी डाइमेंशनल कनेक्टिविटी नेटवर्क के निर्माण पर कई अरब डॉलर का निवेश कर रखा है. इस योजना के तहत चीन पर छोटे देशों को कर्ज़ और निवेश के जाल में फंसाए रखने के आरोप लग चुके हैं.

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यही नहीं, रक्षा के क्षेत्र में भी चीन ने नेपाल के साथ जो समझौते किए हैं, वो काफी अहम रहे हैं. चीन के लिए बहुत ज़रूरी है कि नेपाल में राजनीतिक हालात स्थिर रहें और सरकार उसके पक्ष में रहे. अब ये भी जानिए कि यह पहली बार नहीं है जब नेपाल के अंदरूनी मामलों में इस तरह दखल दे रहा है.

ओली को बचाता रहा है चीन!
जी हां, ओली की कुर्सी की चाबी एक तरह से चीन के हाथ में ही रही है. मई के महीने में जब ओली पर दबाव बढ़ रहा था कि वो प्रधानमंत्री की कुर्सी खाली करें, तब चीन की वरिष्ठ राजनयिक ने राष्ट्रपति भंडारी, पीएम ओली और प्रचंड सहित शीर्ष नेताओं से मुलाकात की थी. इसी तरह जुलाई में ओली की कुर्सी बचाने के लिए फिर टॉप नेताओं के साथ इसी तरह की मीटिंग हुई. चीन की इस कवायद को कई लोगों ने अंदरूनी मामलों में दखल मानते हुए भारी विरोध जताया था, लेकिन राजनी​ति में कोई मामला अंदरूनी होता कहां है? सारे तार तो आपस में जुड़े रहते हैं.

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केपी ओली और प्रचंड चर्चा करते हुए.


क्या है भारत का रुख?
चीन की बढ़ती दखलंदाज़ी के बीच फिलहाल भारत ने दूरी बनाए रखने की नीति ही अपनाई है. लोकतंत्र का हवाला देते हुए पिछले दिनों भारत ने साफ किया कि यह नेपाल का अंदरूनी मामला है. वहीं भारत के आधिकारिक सूत्रों के हवाले से खबरें हैं कि नेपाल में सत्तारूढ़ पार्टी के दोफाड़ होने से चूंकि भारत के प्रोजेक्ट प्रभावित नहीं होते इसलिए भारत फिलहाल नेपाल के फटे में टांग अड़ाने के मूड में नहीं है. लेकिन जानकारों के मुताबिक भारत को निगरानी और सतर्कता पूरी रखना चाहिए.
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