कंबोडिया में चीन की बढ़ती दखलंदाजी कितनी खतरनाक है?

कंबोडिया ने अपने एक बड़े हिस्से में चीन को मिलिट्री बेस बनाने की इजाजत दे दी- सांकेतिक फोटो (Pixabay)
कंबोडिया ने अपने एक बड़े हिस्से में चीन को मिलिट्री बेस बनाने की इजाजत दे दी- सांकेतिक फोटो (Pixabay)

कंबोडिया ने अपने एक बड़े हिस्से में चीन को मिलिट्री बेस (Cambodia permits China for military base in Cambodia) बनाने की इजाजत दे दी है. इसके अलावा अब कंबोडिया के व्यापार पर भी चीन का कब्जा है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 6, 2020, 1:06 PM IST
  • Share this:
चीन पूरी दुनिया में अपने सैन्य बेस (military base of China) फैलाने की कोशिश में है. इसके लिए वो आर्थिक रूप से कमजोर देशों को कर्ज देकर उनके यहां घुसपैठ कर रहा है. अब इसी लिस्ट में कंबोडिया भी है. वहां पर चीन डारा सकोर (Dara Sakor in Cambodia) में हवाई और समुद्री पोर्ट बना रहा है, जो असल में सैन्य बेस की तरह काम करेगा. इससे चीन हवा और समुद्र दोनों की तरीके से और ज्यादा ताकतवर हो जाएगा. वैसे कंबोडिया आखिर क्यों चीन के दबाव में आया, जो उसे अपने यहां घुसपैठ की इजाजत दे दी, जानिए.

चीन ने लिया लीज पर
चीन की कंपनी तियानजिन यूनियन डिवेलपमेंट ग्रुप ने दारा सकोर के नेशनल पार्क में एयरस्ट्रिप और पास के रिजॉर्ट में पोर्ट बनाया है. विशेषज्ञों का मानना है कि ये प्रोजेक्ट चीन के विस्तारवादी रवैये पर एक और बिसात हैं. ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक चीनी कंपनी तियानजिन ने दारा सकोर को 99 सालों के लिए लीज पर लिया था. इसके लिए उसने 3.8 अरब डॉलर लगाए. इसके तहत कंबोडिया के तटीय क्षेत्र का 20% हिस्सा आता है. ये काफी बड़ा हिस्सा है.

चीनी सेना कंबोडिया के समुद्री मिलिट्री बेस का इस्तेमाल करेगी- सांकेतिक फोटो (Pixabay)

होगा सबसे बड़ा रनवे


दारा सकोर की एयरस्ट्रिप कंबोडिया का सबसे बड़ा रनवे होगी और अगर चीन सैन्य बेस की तरह इसका इस्तेमाल करे तो साउथ चाइन सी की दावेदारी का विरोध करने में वो सबसे मजबूत हो जाएगा. बता दें कि साउथ चाइना सी के लगभग 80 प्रतिशत हिस्से पर चीन अपना दावा कर रहा है, जबकि ये समुद्र 6 देशों की सीमाओं से सटता है और सभी देश इसके थोड़े-थोड़े हिस्से को अपना मानते आए हैं. ऐसे में माना जा रहा है कि चीन मिलिट्री को मजबूती देकर अपनी दावेदारी मजबूत कर रहा है.

पढ़ें: KBC सवाल: धरती की सबसे अकेली जगह, जिसका नाम भारतीय फंतासी चरित्र जैसा है

कंबोडिया में चीनी निवेश
ये जानना जरूरी है कि कंबोडिया के साथ आखिर ऐसा क्या हुआ, जो उसके अपनी इतनी बड़ी जमीन चीन को दे दी. दक्षिण-पूर्वी इस गरीब देश में चीन सबसे बड़ा निवेशक यानी इनवेस्टर है. दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंध साल 2010 से काफी तेजी से मजबूत हुए. साल 2013 में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने सिल्क रोड प्रोजेक्ट की बात की और कंबोडिया को भी इसमें शामिल कर लिया. इस प्रोजेक्ट से चीनी माल दूसरे देशों तक पहुंचने में आसानी होगी, रास्ते छोटे हो जाएंगे, जिससे समय और पैसों दोनों ही की बचत होगी. कंबोडिया में चूंकि चीन विकास ला रहा था, इसलिए उसने हामी भर दी.

प्रोजेक्ट चीन के विस्तारवादी रवैये पर एक और बिसात हैं- सांकेतिक फोटो (pxhere)


स्थानीय लोगों के लिए बने खतरा
कंबोडिया के समुद्री शहर सिहानूकविले में एक टैक्स-फ्री इकनॉमिक जोन बना, जहां चीन ने हर तरफ अपनी फैक्ट्रियां बना ली हैं. साथ ही साथ वो रेलवे, सड़कों और हवाई पट्टियों पर भी निवेश कर रहा है. हालांकि इस विकास एक दूसरा पक्ष भी है, जो चीन का नजरिया बताया है. कंबोडिया में अपने कारखाने बना चुका चीन अपने ही देश से चीनी कामगारों को लाने लगा. धीरे-धीरे कंबोडिया में चीनी अप्रवासियों की आबादी सबसे ज्यादा है.

ये भी पढ़ें: आर्मेनिया-अजरबैजान की जंग में घुसपैठिया चीन क्या कर रहा है?  

कंबोडिया के गृह मंत्रालय ने इसपर चिंता जताते हुए बताया था कि चीनियों की आबादी कंबोडिया में कुल विदेशियों का 60 प्रतिशत से भी ज्यादा है. कंबोडिया में चीनी दुकानदार लीज पर दुकानें ले रहे हैं और इस तरह से वहां से स्थानीय व्यापार को भी खत्म कर रहे हैं.

ये भी पढ़ें: कितनी घातक है अमेरिकी टॉमहॉक मिसाइल, जिसे चुराकर PAK ने बनाई बाबर मिसाइल   

अगले 3 सालों में 10 बिलियन डॉलर का निवेश
कर्ज देकर कब्जा करने की रणनीति के तहत चीन कंबोडिया में भारी निवेश कर रहा है. क्वार्टज की एक रिपोर्ट बताती है कि चीन ने साल 2017 में वहां 5.8 बिलियन डॉलर का निवेश किया था. साल 2023 में चीन इसे 10 बिलियन डॉलर तक पहुंचाने की कोशिश कर रहा है. कंबोडिया की ये हालत देखते हुए दूसरे देश अनुमान लगा रहे हैं कि वो भी अब चीन के आगे कुछ नहीं कह सकेगा. हालांकि कंबोडिया के प्रधानमंत्री हुन सेन ने साल 2019 में ऐसी किसी भी बात से इनकार किया था. रॉयटर्स के मुताबिक हुन सेन के कहा कि कर्ज लेने का फैसला उनका खुद का है और उन्हें चीन से कोई खतरा नहीं.

कंबोडिया की स्थानीय जनता के पास चीनियों के चलते काम की कमी हो रही है- सांकेतिक फोटो (Pixabay)


सीक्रेट डील हुई है देशों के बीच
कंबोडियाई नेता के आश्वासन के बाद भी खतरा सामने दिख रहा है. वॉल स्ट्रीट जर्नल की एक रिपोर्ट के हवाले से यूरेशियन टाइम्स ने दावा किया कि चीन और कंबोडिया के बीच सीक्रेट डील हुई है. इस डील के तहत चीनी सेना कंबोडिया के समुद्री मिलिट्री बेस का अगले 40 सालों के लिए इस्तेमाल कर सकेगी. दारा सकोर की एयरस्ट्रिप को लीज पर देना ऐसी ही किसी डील के तहत हुआ. इसपर अमेरिका रक्षा मंत्रालय तक अपनी आपत्ति और डर दोनों जता चुका है.

देशों में घुसने के लिए क्या करता है चीन
चीन के कर्ज देने और गुलाम बनाने की नीति, अर्थव्यवस्था में काफी जानी-पहचानी है. इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट के नाम पर पहले कर्ज देना और फिर उस देश को एक तरह से कब्जा लेना, इसे डैट-ट्रैप डिप्लोमेसी (Debt-trap diplomacy) कहते हैं. दूसरी ओर चीन का कहना है कि कर्ज लेकर गरीब देश विकास कर सकें- ये उसका इरादा होता है. पहले से ही चीन ये पॉलिसी अपनाता रहा है. इसके तहत पहले वो छोटे लेकिन कम्युनिस्ट देशों को कर्ज दिया करता था. बाद में ये पूरी दुनिया में फैल गया.
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज