आधे से ज्यादा चाइनीज दूध क्यों नहीं पचा पाते?

चीन की आधी से ज्यादा आबादी लेक्टोज इनटॉलरेंट है- सांकेतिक फोटो (pxfuel)
चीन की आधी से ज्यादा आबादी लेक्टोज इनटॉलरेंट है- सांकेतिक फोटो (pxfuel)

दुनियाभर के जंगली पशु-पक्षी खाकर पचा लेने वाला चीन दूध नहीं पचा पाता (lactose intolerance in China) है. रिसर्च के अनुसार चीन की 60 प्रतिशत से ज्यादा आबादी में ये समस्या काफी गंभीर है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 20, 2020, 11:37 AM IST
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चीन की आधी से ज्यादा आबादी लेक्टोज इनटॉलरेंट (Lactose intolerant) है, यानी वो दूध नहीं पचा पाती है. खुद रिसर्च में ये बात साफ हो चुकी है. इसके मुताबिक ये समस्या चीनियों के डीएनए की वजह से होती है, जिससे उन्हें जन्म से साथ ही दूध पचाने में मुश्किल आती है. तो ऐसा क्या कारण है, जिससे सांप-चमगादड़ जैसा एग्जॉटिक मांस पचा पाने वाले चीन में दूध पचाना मुश्किल हो जाता है. जानिए.

क्या है दूध न पचा पाना
दूध या इससे बनी चीजें खाने पर अपच को लेक्टोस इनटॉलरेंस कहते हैं. यानी लेक्टोज न सह पाना. लेक्टोज दूध में पाई जाने वाली शक्कर है, जो इससे बनी चीजों जैसे पनीर, घी और बटर में भी होती है. जो लोग दूध पचा नहीं पाने की बात करते हैं, वे असल में इसमें पाई जाने वाली यही शक्कर नहीं पचा पाते. इस अपच का कारण है उनकी छोटी आंत, जिसमें लेक्टोज को पचाने के लिए जरूरी एंजाइम नहीं बन पाता.

चीन के 60 फीसदी से भी ज्यादा लोगों में ये समस्या काफी ज्यादा है- सांकेतिक फोटो (pxfuel)

कैसे पता चलता है कि कोई लेक्टोज नहीं पचा पाता


दूध पीने के 30 मिनट से 2 घंटे के भीतर ये समझा जा सकता है. इस अवधि में पेट दर्द, उल्टियां, उबकाई आना, पेट से खदबद की आवाजें आना या डायरिया जैसी समस्या भी हो सकती है. अगर हमेशा ये लक्षण दूध पीने के बाद दिखें तो समझा जा सकता है कि आप लेक्टोज नहीं पचा पाते हैं. इसके बाद इसके कई टेस्ट भी होते हैं, जो इसे पक्का कर देते हैं.

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कौन हैं इससे प्रभावित
लेक्टोज न पचा पाने वाले कई बच्चे उम्र के साथ दूध पचा पाते हैं, वहीं कई बार ये समस्या पूरी उम्र बनी रहती है. ये भी देखा गया कि भौगोलिक संरचना के आधार पर लेक्टोज इनटॉलरेंस बढ़ता-घटता रहता है. जैसे एशिया के लोगों में ये समस्या ज्यादा देखी जाती है, जबकि यूरोपियन आबादी के साथ ये परेशानी बहुत कम है. एशिया में भी चीन के लोगों में दूध न पचा पाने की समस्या सबसे ज्यादा है.

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शुरू में 90 प्रतिशत आबादी बीमार
चीन के 60 फीसदी से भी ज्यादा लोगों में ये समस्या काफी ज्यादा है. द वीक में छपी एक रिपोर्ट में दावा है कि चीन के 90 प्रतिशत लोग लेक्टोज नहीं पचा पाते, लेकिन धीरे-धीरे उनमें से कुछ लोग उम्र के साथ दूध की कुछ मात्रा पचाने लगते हैं. वे जन्म से लेकर वयस्क होने तक भी दूध नहीं पचा पाते हैं. ऐसे में कैल्शियम की जरूरत पूरी करने के लिए वे सोया से बना मिल्क और पनीर जैसी चीजें खाते हैं.

लेक्टोज न पचा पाने वाले कई बच्चे उम्र के साथ दूध पचा पाते हैं- सांकेतिक फोटो (pxfuel)


आखिर चीन में क्यों है ये परेशानी
वैज्ञानिक अभी तक इस बात का पता नहीं लगा सके कि चीन में ये समस्या इतनी ज्यादा क्यों है. हालांकि ये माना जाता है कि एशियाई देशों जैसे चीन और अफ्रीकी देशों में गरीबी के कारण दूध की उपलब्धता कम थी. ऐसे में उनके पूर्वजों के डीएनए में इस तरह का बदलाव ही नहीं आ सका, जो दूध को पचाने में मदद करें. ये समस्या अब तक चली आ रही.

शरीर में हुए बदलाव
अपनी इस बात के पक्ष में वैज्ञानिकों ने ए़डॉप्टेशन यानी अनुकूलन का प्रमाण दिया. इसके मुताबिक पाषाण युग से आगे बढ़ते हुए शरीर में कई अंदरुनी और बाहरी बदलाव हुए. इसी के साथ खानपान की आदतों में भी बदलाव दिखा. ये बदलाव चीजों की उपलब्धता के आधार पर भी हुआ. यानी खेती-किसानी में लगे लोगों को बाय-प्रोडक्ट की तरह दूध भी मिलने लगा. लिहाजा दूध पीने की आदत डली और धीरे-धीरे शरीर में उसके मुताबिक बदलाव हो गया. ये स्टडी biorxiv नाम की साइंस जर्नल में छपी थी.

इसलिए है जद में
चूंकि चीन समेत कई एशियाई देशों में दूध आसानी से उपलब्ध नहीं था, इसलिए वहां के लोगों का शरीर इसके लिए अनुकूलित नहीं हो सका. यही कारण है कि आज भी चीन की आधी से ज्यादा आबादी दूध नहीं पचा पाती है. और अगर दूध या उससे बनी चीजें खा ले तो तुरंत पेट खराब होना या उल्टियां होने जैसी समस्या होने लगती है.

चीन दूध के उत्पादन में दुनिया का तीसरा सबसे आगे खड़ा देश है -सांकेतिक फोटो


मिल्क एलर्जी अलग चीज है
लेक्टोज इनटॉलरेंस फूड एलर्जी से अलग किस्म की समस्या है. फूड एलर्जी सीधे इम्यून सिस्टम से जुड़ी परेशानी है. इसमें अगर कोई ऐसी चीज खा लेता है, जिससे उसे एलर्जी है तो समस्या काफी गंभीर और यहां तक कि जानलेवा भी हो सकती है. वहीं लेक्टोज न पचा पाना केवल कुछ घंटों के लिए रुटीन खराब करता है. वहीं दूध से एलर्जी भी एक अलग समस्या है. इसमें इम्यून सिस्टम दूध के प्रोटीन को फॉरेन पार्टिकल मान लेता है और उससे लड़ने के लिए सक्रिय हो जाता है. नतीजा ये होता है कि वो अपनी ही कोशिकाओं पर हमला करने लगता है. इस स्थिति को anaphylaxis कहते हैं जो काफी गंभीर स्थिति है. ये जानलेवा भी हो सकती है.

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दूध उत्पादन में तीसरा नंबर है चीन का
वैसे चीनियों के दूध न पचा पाने की समस्या के बीच एक दिलचस्प बात ये है कि ये देश दूध के उत्पादन में दुनिया का तीसरा सबसे आगे खड़ा देश है. UK Agriculture & Horticulture Development Board के मुताबिक सबसे आगे अमेरिका और उसके बाद भारत हैं. बीते कुछ सालों में चीन ने 37 मिलियन टन से भी ज्यादा दूध का हर साल उत्पादन किया. ये काफी बड़ूी मात्रा है. लेकिन इतने दूध के प्रोडक्शन के बाद भी चाइनीज इसे खुद पीने की बजाए निर्यात पर जोर देते हैं.
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