Explained: वैक्सीन आने के बावजूद क्यों बढ़ रहे हैं कोरोना के मामले?

वैक्सीन आने के बाद भी कोरोना का ग्राफ नीचे की बजाए ऊपर जा रहा है (Photo- news18 English via Reuters)

वैक्सीन आने के बाद भी कोरोना का ग्राफ नीचे की बजाए ऊपर जा रहा है (Photo- news18 English via Reuters)

कोरोना के दो टीके (coronavirus vaccination) आ चुके. सरकारी और निजी दोनों ही अस्पतालों में टीकाकरण चल रहा है, इसके बाद भी कोरोना का ग्राफ ऊपर जा रहा है. क्या इसकी वजह लोगों का निश्चिंत हो जाना है? यहां समझिए.

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  • Last Updated: March 23, 2021, 5:01 PM IST
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कोरोना संक्रमण रोकने के लिए टीकाकरण शुरू हुए दो महीने से ज्यादा वक्त हो गया, इसके बाद भी देश में संक्रमण के आंकड़े कम नहीं हुए, बल्कि एकाएक बढ़े ही हैं. बीते एक सप्ताह के आंकड़ों के मुताबिक, देश में दो लाख 76 हजार 965 नए केस दर्ज हुए. वहीं, 1310 लोगों की मौत इस संक्रमण से हुई. ऐसे में बार-बार सवाल उठ रहा है कि क्यों वैक्सीन आने के बाद ग्राफ नीचे की बजाए ऊपर जा रहा है.

सालभर में क्या दिखा फर्क 

देशव्यापी लॉकडाउन की घोषणा आज से ठीक सालभर पहले हुई थी, जब कोरोना के मामले कुछ सौ ही थे. मामलों पर नियंत्रण किया लेकिन वर्तमान हालात दोबारा बिगड़ते दिख रहे हैं. तुलना करें तो फरवरी 2021 के मुकाबले मार्च 2021 में संक्रमण के मामले पांच गुना रफ्तार से बढ़ रहे हैं. यहां तक कि विशेषज्ञ इसे कोरोना की दूसरी लहर का हमला बता रहे हैं. ये सब तब है जबकि हम कोरोना के बारे में कई जानकारियां जुटा चुके हैं और उससे बचाव के लिए टीका तक बनाया जा चुका.

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ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में मामले बढ़े 

कोरोना की बढ़ती दर के बीच कुछ पैटर्न भी दिख रहे हैं, जैसे इसका कोहराम कुछ खास राज्यों में ज्यादा है और वहां भी ग्रामीण और कस्बाई इलाके ज्यादा प्रभावित हैं. उदाहरण के तौर पर महाराष्ट्र की बात करें तो वहां फरवरी के दूसरे हफ्ते में कोरोना के मामले जिन इलाकों से आए, वे मिले-जुले इलाके हैं. अमरावती अपेक्षाकृत बाहरी इलाका है, जहां कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग की दर काफी कम है. यही वजह है ये जगह बीमारी का हॉटस्पॉट है. हालांकि मुंबई, थाणे और नागपुर के भी कमोबेश यही हाल हैं.

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एक बड़ी समस्या वैक्सिनेशन की धीमी रफ्तार को माना जा रहा है- (Photo- moneycontrol)




क्या डर खत्म होना भी वजह है

वैक्सिनेशन शुरू होने के बाद भी मामले बढ़ने की एक और वजह है लोगों का निश्चिंत हो जाना. पहले वैज्ञानिकों से लेकर डॉक्टरों तक के पास इस वायरस के बारे में खास जानकारी नहीं थी, इसलिए लगातार सचेत रहने की बात की जा रही थी. इलाज की जानकारी न होने के कारण लोगों में डर बना हुआ था. वहीं इटली और अमेरिका में लोगों की मौत की दर ज्यादा होने की सूचनाएं भी लगातार मीडिया में आ रही थीं, जिससे भारत की आबादी डर से ही सही, लेकिन सचेत थी.

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नियमों में ढील

अब हालात दूसरे हैं. वैक्सीन आ चुकी है और नियम के मुताबिक दी भी जाने लगी है. इसके अलावा कोरोना की वैसे कोई निश्चित दवा तो नहीं, लेकिन कई दवाएं हैं, जिनसे मरीज को राहत मिल पाती है. लॉकडाउन के दौरान अस्पतालों के इंफ्रास्ट्रक्टर में भी इस बीमारी के लिहाज से कई बदलाव हुए. लिहाजा अब बड़ी आबादी इसे लेकर निश्चिंत हो रही है और नियमों का उतनी सख्ती से पालन नहीं कर रही.

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अब बड़ी आबादी नियमों का उतनी सख्ती से पालन नहीं कर रही (Photo- news18 English via Reuters)


सार्वजनिक सभाएं और रैलियों की भीड़

चुनावों को भी एक वजह माना जा रहा है. पांच राज्यों में इस महीने के आखिर से विधानसभा चुनाव शुरू होने वाले हैं. इन्हें लेकर सार्वजनिक सभाएं और रैलियां हो रही हैं. यहां सैकड़ों-हजारों की संख्या में लोग जमा होते हैं. ज्यादातर लोग मास्क के बगैर होते हैं या पहनते भी हैं तो मास्क को ठुड्डी पर सरकाकर रखते हैं. ये जमावड़ा भी कोरोना संक्रमण की वजह हो सकता है.

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स्कूलों का खोला जाना भी कारण की तरह देखा जा रहा है

ध्यान दें तो पाएंगे कि उन सभी राज्यों में कोरोना का प्रकोप बढ़ा, जहां स्कूल खुल चुके हैं. बच्चों पर वायरस का खतरा भले ही कम हो लेकिन वे वाहक का काम करते हैं. ऐसे में घरों में साथ रहने वाले लोगों के अलावा बुजुर्गों और बीमारों पर गंभीर खतरा है. हालांकि दूसरी लहर की चेतावनी के बीच अधिकतर राज्य अपने यहां स्कूल बंद कर चुके हैं और परीक्षाएं ऑनलाइन हो रही हैं.

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वैक्सीन लेकर लोग प्रोटोकॉल छोड़ रहे

अब अगर वैक्सीन की बात करते हैं तो यहां पर लोगों का मनोविज्ञान समस्या पैदा कर रहा है. बहुत से लोग वैक्सीन की पहली डोज लेने के बाद ही निश्चिंत हो जाते हैं और कोरोना प्रोटोकॉल का पालन नहीं कर रहे. ऐसे में कई मामले दिखे हैं जिनमें वैक्सिनेशन के बाद भी लोग कोरोना संक्रमित हो गए. संक्रमित हुए ये लोग जाहिर तौर पर अपने आसपास भी संक्रमण फैलाते हैं.

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एक और मुद्दा वैक्सीन को एक सीमित समूह तक दिया जाना है- सांकेतिक फोटो


एक बड़ी समस्या वैक्सिनेशन की धीमी रफ्तार है

बता दें कि पहले चरण में हेल्थ वर्कर्स को टीका मिला. इसके बाद दूसरे चरण में शुरुआत में सरकारी अस्पताल की इसका केंद्र रहे लेकिन फिर तत्काल ही निजी अस्पतालों को भी टीकाकरण की इजाजत मिली. इसकी वजह टीकाकरण की धीमी गति ही थी.

वैक्सिनेशन प्रक्रिया को अनलॉक करने की जरूरत 

वैक्सीन को एक सीमित समूह तक दिया जाना भी मुद्दा है. फिलहाल 60 साल से ऊपर की आयु वालों या फिर क्रॉनिक बीमारी से जूझ रहे 45 साल की उम्र वालों का टीकाकरण हो रहा है. हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि कोरोना की लहर को कंट्रोल करने के लिए वैक्सिनेशन प्रक्रिया को अनलॉक कर दिया जाना चाहिए. विशेषकर उन राज्यों में हर आयुवर्ग के टीकाकरण शुरू हो जाए, जहां मामले कई गुना तेजी से बढ़े हैं. इसके बाद भी माना जा रहा है कि यही गति रही तो हर्ड इम्युनिटी लायक आबादी के टीकाकरण में ही दशकभर लग जाएगा. यानी पूरे 10 सालों तक देश कोरोना संक्रमण के खतरे में जीता रहेगा.
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