आखिर क्यों समय लग रहा है कोरोना का इलाज ढूंढने में

आखिर क्यों समय लग रहा है कोरोना का इलाज ढूंढने में
इंदौर में कोरोना के 5 पॉजिटिव मरीज़ मिले,

कोरोना महामारी के बीच दुनियाभर में इसकी वैक्सीन विकसित करने की कोशिश और ट्रायल भी शुरू हो चुके हैं लेकिन बाजार में इसकी दवा आने में समय लगेगा. आखिर क्या है इसकी वजह

  • News18Hindi
  • Last Updated: March 24, 2020, 5:43 PM IST
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दुनिया भर में कोरोना वायरस का कहर तेजी से फैल रहा है. तीन लाख 30 हजार से ज्यादा लोग इससे संक्रमित हो चुके हैं तो 14 हजार से ज्यादा अपनी जान गंवा चुके हैं. 31 दिसंबर को चीन के वुहान प्रांत में इससे पीड़ित कई लोगों के बारे में जानकारी सामने आई. तभी से वैज्ञानिक इसका इलाज ढूंढ रहे हैं, उन्हें इस दिशा में तेजी से काम भी किया है, लेकिन फिर भी इसका कारगर इलाज ढूंढने और उसे आम जनता तक पहुंचने में काफी समय लगेगा.

तीन महीने पहले ही शुरू हो चुका है शोध
31 दिसंबर 2019 को जब चीन ने विश्व स्वास्थ्य संगठन को इस मामले की सबसे पहले जानकारी दी तब उसने यही कहा कि उसे बहुत से असामान्य निमोनिया से पीड़ित मरीज मिले हैं. अगले दिन वुहान शहर के ही समुद्री भोजन वाले थोक बाजार को बंद कर दिया गया क्योंकि अधिकतर मरीज यहीं से आए थे. इसके बाद से अब तक यह दुनिया में हर तरफ फैल रहा है.

तब से सभी जगह वैज्ञानिक इस वायरस का तोड़ निकालने में लगे हैं. इस बीमारी इलाज अभी दूर की कौड़ी लग रहा हो लेकिन कुछ उम्मीदें भी हैं. इस मामले में वैज्ञानिक डॉक्टर और शोधकर्ता बहुत तेजी से काम कर रहे हैं.



दो तरीकों से निपटने की हो रही है कोशिश


इस बीमारी से निपटने के लिए दो तरीके से काम हो रहा है. एक तो व्यवस्थित शोध कर इसके इलाज के साथ ही इसका टीका विकसित करना और दूसरा अन्य मलेरिया जैसी बीमारियों की दवाइयों का इस बीमारी पर प्रयोग कर उनकी कारगरता जांचना.

क्या अंतर है दोनों तरीकों में
बेशक पहला तरीका एक लंबा तरीका है क्योंकि इसके नतीजे आने के बाद उसका व्पायक प्रयोग और फिर पुष्टि होने के बाद बड़े पैमाने पर उत्पादन. वैज्ञानिक इसी को लेकर लंबे समय की बात कर रहे हैं. वहीं दूसरे तरीके में निश्चितता नहीं है, वह कभी भी अचानक सामने आ सकता है. यह पूरी तरह से अंधेरे में तीर मारने जैसा तो नहीं है, लेकिन दुनिया इसके भरोसे बैठी भी नहीं रह सकती.

तो आखिर समय क्यों लग रहा है
वैज्ञानिकों के सामने एक चुनौती यह भी है कि वायरस खुद को बदल भी सकता है. वह खुद में अपने वातावरण केअनुसार बदलाव कर सकता है. उनकी खुद का कोई सेल स्ट्रक्चर नहीं होता. वह हमारे ही प्रोटीन से पोषित होता है. उसकी कमजोरी भी हमारी कमजोरी बन जाती है. इसीलिए ज्यादातर दवाइयां जो उसे नुकसान पहुंचाएंगी हमें भी नुकसान पहुंचा सकती हैं. अमेरिका की स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी की वायरोलॉजिस्ट कार्ला किर्कगार्ड (Karla Kirkegaard)  के मुताबिक ‘ऐसे में ऐसी दवाई  बनाना, जो केवल वायरस को ही खत्म करे वह भी हमें नुकसान न पहुंचाए, सबसे बड़ी चुनौती है.’ यह भी इलाज में देरी की एक और वजह है.

 फिर ये काम भी तो करेंगे देरी
सही दवा ढूंढने, उसका टीका बनाने में के बाद उसका परीक्षण कर बड़े पैमाने पर लोगों के लिए उपलब्ध कराने में काफी समय लगेगा. इसीलिए ज्यादातर वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इस साल के अंत तक आम जनता तक इस बीमारी का टीका पहुंचना मुश्किल ही है. वहीं इलाज को लेकर तेजी में भी चुनौतियां कम नहीं हैं. कारगर दवा का बीमारी के हर स्तर पर प्रभावी होना सबसे बड़ा मुद्दा है. जिन दवाइयों ने उम्मीद जगाई है वे हर बीमारी की हर स्टेज पर प्रभावी नहीं हैं. यानी शुरुआती लक्षणों जैसे खांसी बुखार के दौरान तो वे अच्छा प्रभाव दिखाती लग रही है, लेकिन ऐसा ही प्रभाव उन्होंने बाद  की स्टेज जिसमें निमोनिया और फेफड़ों में पानी भरने जैस लक्षण इस बीमारी को लंबा कर देते हैं.

आगे ही बढ़ रहे हैं हम
वैज्ञानिक हर तरह से इस मर्ज का इलाज ढूंढ रहे हैं, कई जगह तो वैक्सीन यानी कि टीके के परीक्षण की तैयारी भी शुरू हो गई है. आज दुनिया तकनीकी और विज्ञान में जितनी सक्षम है उतनी पहले कभी नहीं थी. यह भी सच है कि इससे पहले भी बुरे हालातों में इंसान बेहतर होकर सामने आया है.

यहां से जगी है उम्मीदें
पश्चिमी मीडिया के मुताबिक अमेरिका, रूस ब्रिटेन जैसे बड़े देशों के वैज्ञानिकों में कोरोना वायरस के टीके को सबसे पहले विकसित करने को लेकर होड़ मच गई है. इसके नतीजे भी जल्द ही सामने आने की उम्मीद है. अमेरिका ने तो कुछ टीकों का मानव परीक्षण भी शुरू कर दिया है. अगर परीक्षण के नतीजे सुरक्षित और प्रभावी हुए तो उन्हें बाकी बहुत से मरीजों पर आजमाया जाएगा. यहां भी सफलता मिलने पर ही उनका बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जाएगा.

अगर सब सही रहा तो दवाइयां बनाने वाली कम्पनियां उम्मीद कर रही हैं कि 12 से 18 महीनों में दुनिया भर में टीके उपलब्ध हो जाएंगे.

विश्व स्वास्थ्य संगठन की अपील
दूसरी ओर विश्व स्वास्थ्य संगठन ने दुनिया के देशों से अपील की है दुनिया भर में हो रहे दवाओं के परीक्षण के लिए जुटी संस्थाओं को एकजुट हो जाना चाहिए. संस्था डयरेक्टर जनरल ट्रेडस एडानोम (Tedros Adhanom) का मानना है कि ऐसे नतीजे भी जल्दी आएंगे और उनका प्रभाव भी स्थायी होने की ज्यादा संभावना है.  लेकिन इस समय दुनिया के देश एक दूसरे से कट चुके हैं जैसा कि भारत के पीएम नरेंद्र मोदी  ने कहा, दुनिया के देश चाह कर भी एक दूसरे की मदद नहीं कर पा रहे हैं.

इस समय दुनिया में इस वायरस के प्रसार को रोकने पर ही उतनी ही गंभीरता से काम करना होगा जितना की इसका इलाज ढूंढने में. वहीं दवाओं के प्रयोग का कोई भी नतीजा नहीं निकला है ऐसा भी नहीं माना जा सकता.
First published: March 24, 2020, 5:41 PM IST
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