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    क्यों वैज्ञानिकों के लिए अगली चुनौती कोरोना वैक्सीन को ठंडा रखना है?

    क्लीनिकल ट्रायल के दौरान फाइजर कंपनी की वैक्सीन लगभग नब्बे फीसदी कामयाब दिख रही है (Photo-news18 English via Reuters)
    क्लीनिकल ट्रायल के दौरान फाइजर कंपनी की वैक्सीन लगभग नब्बे फीसदी कामयाब दिख रही है (Photo-news18 English via Reuters)

    कोविड-19 की वैक्सीन (Covid-19 vaccine) को - 70 डिग्री तापमान पर रखा जाए, तभी वो सुरक्षित रह सकेगी. ऐसे में वैक्सीन को दुनियाभर के देशों तक लाना- ले जाना काफी मुश्किल होने जा रहा है.

    • News18Hindi
    • Last Updated: November 17, 2020, 5:59 PM IST
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    कोरोना वैक्सीन के क्लीनिकल ट्रायल (clinical trial of coronavirus vaccine) के दौरान फाइजर कंपनी (Pfizer) की वैक्सीन लगभग नब्बे फीसदी कामयाब दिख रही है. वैक्सीन जल्द ही ब्रिटिश सरकार को सौंपी जाएगी. हालांकि इसे सुरक्षित रखना भी अपने में एक चुनौती साबित होने जा रहा है. दरअसल वैक्सीन को -70 डिग्री तापमान पर ही रखा जा सकता है. ये काम सामान्य फ्रिज नहीं कर सकता. ऐसे में जानिए, कैसे वैक्सीन को ठंडा रखा जाएगा और क्यों ये आसान नहीं है.

    किसी भी दवा की तरह ही वैक्सीन की भी एक्सपायरी होती है. लेकिन इसके अलावा भी वैक्सीन काफी जल्दी खराब हो सकती है. इसकी वजह ये है कि वैक्सीन को सेफ रखने के लिए एक निश्चित तापमान होता है. साथ ही इसे नमी और धूल-धुएं से भी बचाना होता है. ये न हो पाने पर वैक्सीन किसी काम की नहीं रहती.

    covid vaccine
    वैक्सीन को सेफ रखने के लिए एक निश्चित तापमान होता है (सांकेतिक फोटो)




    खुद वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन (WHO) का मानना है कि हर साल दुनियाभर के देशों में भेजी गई आधे से ज्यादा वैक्सीन रखरखाव में गड़बड़ी के कारण खराब हो जाती हैं. इसमें सबसे बड़ी वजह तापमान कंट्रोल न रख पाना होता है. ऐसी वैक्सीन अलग लगा भी दी जाए तो बीमारी रोकी नहीं जा सकती.
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    ऐसे में कोरोना वैक्सीन के बारे में डर जताया जा रहा है कि उसका भी ये हाल न हो. खासकर जब एक साथ पूरी दुनिया को ये वैक्सीन देने की जरूरत है, तब वैक्सीन खराब होने का खतरा नहीं लिया जा सकता. इसी बीच मॉडर्ना और फाइजर कंपनियों की वैक्सीन जल्दी से जल्दी बाजार में आने के लिए तैयार हैं. बता दें कि ट्रायल के दौरान फाइजर को लगभग 90 फीसदी कामयाबी मिली तो मॉडर्ना को 94.5 फीसदी सफलता मिली.

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    दोनों ही वैक्सीन जेनेटिक मटेरियल RNA से तैयार की गई हैं. इसे सुरक्षित रखने के लिए खास तापमान बनाए रखना जरूरी है. मॉडर्ना की वैक्सीन को अगर महीनेभर तक सेफ रखना है तो उसके लिए -20 डिग्री सेल्सियस तापमान चाहिए. दूसरी ओर फाइजर के लिए लगभग -70 डिग्री सेल्सियस तापमान की जरूरत होगी.

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    हर साल आधे से ज्यादा वैक्सीन रखरखाव में गड़बड़ी के कारण खराब हो जाती हैं (सांकेतिक फोटो)


    इसके अलावा कई दूसरी वैक्सीन भी कोल्ड टेंपरेचर पर ही टिक सकेंगी. ऐसे में सारी ही वैक्सीन को दुनिया के एक से दूसरे कोने तक ले जाने के लिए तापमान बनाए रखना एक चुनौती है. यहां पर ड्राई आइस एक समाधान है लेकिन इतनी बड़ी मात्रा में ड्राई आइस भी कहां से आ सकेगी, ये भी वैज्ञानिक समझने की कोशिश कर रहे हैं.

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    बता दें कि ड्राई आइस और कुछ नहीं, बल्कि ठोस कार्बन डाईऑक्साइड होती है. ये कूलिंग एजेंट है जो बर्फ को भी ठंडा रखने का काम करता है. ये बर्फ सामान्य फ्रिज के फ्रीजर के मुकाबले चार गुना से भी ज्यादा ठंडी होती है. यही वजह है सुपर मार्केट में लंबे समय के लिए अगर फ्रोजन उत्पाद रखने हों तो वे इसी बर्फ का उपयोग करते हैं. ऐसे में अगर सारी बर्फ वैक्सीन के लिए ले ली जाए तो फ्रोजन खाना रखना एक बड़ी समस्या हो जाएगी. ये मामूली बात नहीं, क्योंकि पश्चिम और बहुतेरे देशों में फ्रोजन खाना भी एक बड़ा जरिया है.

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    फार्मा कंपनियां काफी पैसे थर्मल स्टोरेज पर खर्च करने वाली हैं (सांकेतिक फोटो)


    इसे भी छोड़ दें तो वैक्सीन का फैक्ट्रियों से लेकर आम इंसान तक पहुंचना लंबी प्रक्रिया है. जैसे वैक्सीन फैक्ट्री से होते हुए जहाज तक जाएगी, जहां से हजारों किलोमीटर की दूरी तय करके एक से दूसरे देश पहुंचेगी. यहां से वो अस्पताल, क्लिनिक या दवा दुकानों तक पहुंचेगी और फिर लोगों तक आ सकेगी. इस पूरे दौरान उसका तापमान नियंत्रित रहना चाहिए, वरना असर खत्म हो जाएगा या कम हो जाएगा.

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    फिलहाल कोरोना एकदम नया वायरस है इसलिए किसी भी ऐसे खतरे को हल्के तौर पर नहीं लिया जा सकता. अगर तापमान के कारण या गलत रखरखाव के कारण वैक्सीन खराब हुई तो वापस भारी मात्रा में वैक्सीन बनानी होगी और इसके बाद भी हैंडलिंग आसान नहीं होगी. वॉल स्ट्रीट जर्नल के मुताबिक दोनों ही फार्मा कंपनियां काफी पैसे थर्मल स्टोरेज पर खर्च करने वाली हैं. ऐसे में जाहिर सी बात है कि इसकी कीमत भी विक्रेताओं को चुकानी होगी.
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